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 अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस (10 दिसंबर ) पर विशेष


पूनम नेगी

अन्याय के खिलाफ संघर्ष तथा मनुष्य को उसके प्रकृति प्रदत्त अधिकार दिलाने के लिए समूची दुनिया में हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस (यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स डे) मनाया जाता है। आजादी, बराबरी, सुरक्षा और सम्मान के अधिकार के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार; मसलन बाल मजदूरी, महिला उत्पीड़न, श्रमिक अधिकारों का हनन, बाल विवाह, हिरासत व मुठभेड़ के लापरवाही जनित हादसों में होने वाली मौत, अल्पसंख्यक-अनुसूचित जाति व जनजाति के अधिकार मानव अधिकारों के दायरे में आते हैं। भारतीय संविधान इन अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले के खिलाफ अदालती सजा का भी प्रावधान है।

दरअसल किसी भी उन्नत समाज की आधारशिला उस समाज में रहने वाले मनुष्यों को उसके जन्म के साथ नैसर्गिक रूप से मिलने वाले अधिकारों की बहाली पर टिकी होती है। हम मानवाधिकार को लेकर बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं लेकिन कर्त्तव्यों का प्रश्न सामने आने पर बड़ी चालाकी से दूर छिटक जाते हैं जबकि मानवाधिकार चर्चा का नहीं वरन आचरण का विषय है। मानवाधिकार दिवस प्रत्येक मनुष्य को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक होने तथा कर्त्तव्यों के प्रति सचेत होने की प्रेरणा देता है। बावजूद इसके; मानवाधिकार हनन के तमाम मामले आयेदिन अखबारों की सुर्खियां बनते रहते हैं। यदि हम अपने आस पास की दुनिया-समाज को खुली आंखों से देखें तो पता चलेगा कि कितने मानवाधिकारों का हनन आयेदिन खुलेआम किया जाता है।

कहीं बचपन भूख से बिलख रहा है तो कहीं शिक्षा से दूर जी रहा है। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में सरकारें काम नहीं कर रहीं। प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन वे अपर्याप्त हैं। इन मानवाधिकारों के हनन के पीछे हमारी संवेदनहीनता भी जिम्मेदार है। स्वार्थ के वशीभूत होकर लोग अपने घरों में काम करवाने के लिए छोटे-छोटे बच्चों को रखना पसंद करते हैं क्योंकि उनकी जरूरतें व मांग दोनों कम होती हैं। वे गरीब परिवार से होते हैं और लोग उनकी इसी मजबूरी व जरूरत का फायदा उठाते हैं। नजर दौड़ाएं फैक्ट्रियों-कारखानों में मानक के विपरीत 10 से 12 घंटे काम करने वाले नाबालिग बच्चे, अपने दुधमुहे बच्चों को जमीन पर लिटा कर काम करती महिलाएं व घरों में छोटी-छोटी बच्चियां भारी-भरकम काम करती आसानी से दिख जाएंगी। ऊपर से पैसा भी उन्हें पुस्र्षों की अपेक्षा कम मिलता है। कहां है मानवाधिकार? गरीबी है इसलिए घर में दो पैसे लाने के लिए घर वालों द्वारा छोटे छोटे बच्चों को काम पर भेज दिया जाता है। सड़क पर नशे की चीजों को बेचते छोटे-छोटे बच्चे किस दृष्टि से मानवाधिकार का उल्लंघन करते प्रतीक नहीं होते! आज दुनिया के तमाम देशों में शक्ति प्रदर्शन के नाम पर एटम और हाइड्रोजन जैसे विनाशकारी बमों का निर्माण जारी है। इन बमों का विस्फोट मानव जाति के अस्तित्व तक को तबाह कर सकता है।

राजनीतिक दुराग्रह के कारण मानव मानव के खून का प्यासा हो रहा है। हिन्दू व मुसलमान दोनों के ही धर्मग्रंथों में माता-पिता के चरणों में स्वर्ग होने की बात कहकर उनकी सेवा का संदेश दिया गया है लेकिन साफ देखा जा सकता है कि कितने लोग इस बात पर कितनी संजीदगी से अमल करते हैं! समाज में तेजी से बढ़ते वृद्धाश्रम इसी का नतीजा हैं। घर में महिलाओं के साथ होने वाली मारपीट किस श्रेणी में आती है! एक ओर हम नारी सशक्तिकरण का दंभ भरते हैं लेकिन सच अब भी कड़वा ही है। सिर्फ कुछ प्रतिशत महिलाएं ही आत्मनिर्भर होकर अपने बारे में सोचने और करने के लिए स्वतन्त्र हैं, वर्ना आम मध्यमवर्गीय महिला की कमाई भी घरखर्च के नाम पर उनसे छीन ली जाती है। कानून जरूर बने हैं लेकिन महिलाओं और बच्चियों के यौन शोषण की घटनाओं में कोई भी कमी नहीं आ रही। इन स्थितियों में हम मानवाधिकार संरक्षण की बात कैसे कर सकते हैं!

बीते दिनों एनटीपीसी (नेशनल थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन) की ऊंचाहार यूनिट में मानवाधिकार के हनन का बड़ा मामला तब चर्चा का विषय बना जब प्रबंधन की लापरवाही से आधिकारिक रूप से 30 श्रमिक असमय काल के गाल में समा गये। इस मामले में आयोग ने रिपोर्ट तलब की है। जांच में पाया गया कि ऊंचाहार के तीन इकाइयों के महाप्रबंधक (जीएम) के पद पर जिन अफसरों को बैठाया गया उनमें किसी के भी पास में थर्मल पावर सयंत्र में काम करने का अनुभव नहीं हैं। अनुभव की कमी के चलते आला हुक्ममरानों ने सरकार के फरमान को पूरा करने के लिए निश्चित समय की बंदिश तोड़कर यूनिट को बिना बंद किये उसकी सर्विसिंग का काम शुरू करा दिया।

नतीजन व्यायलर ने 30 से अधिक श्रमिकों की जान ले ली व अनेक गंभीर रूप से घायल हो गये। हादसे के बाद मुआवजे की थैली खोल कर मामले को शांत करने की कोशिश के निहितार्थ सहज ही समझे जा सकते हैं। श्रमिकों की सुरक्षा की सुरक्षा में बरती गयी इस लापरहवाही के खिलाफ आयोग कितने कारगर ढंग से कार्रवाई करता है या यह मामला भी कुछ हो हल्ला के बाद लाल फीताशाही की भेंट चढ़ जाएगा; यह देखने वाली बात होगी। इसी तरह मानव सुरक्षा के प्रति लापरवाही बरते जाने के कारण बीते सितम्बर माह में मुंबई के एलफिन्सटन रेलवे स्टेशन पर रेलवे के फुट ओवर ब्रिज पर भगदड़ मचने से 22 लोगों की मौत हो ग्यी जबकि 39 से अधिक लोगों के गंभीर रूप से घायल हो गये थे। उस मामले में भी अफवाह से मची भगदड़ को हादसे की वजह बताकर मुआवजा देकर मामले की जांच की बात कहकर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गयी जबकि 106 साल पुराने उस रेलवे पुल की जर्जर स्थिति रेल अधिकारियों के संज्ञान में थी। यहां तक कि 2016 के बजट में भी नया पुल बनाने की घोषणा की गई थी।

गौरतलब हो कि ह्यूमन राइट्स प्रैक्टिसेज इन इंडिया फॉर 2016 की रिपोर्ट में मानवाधिकार उल्लंघन, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर भारत की आलोचना की गयी है। इस रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन, गैर-सरकारी संगठनों के विदेशी चंदे पर रोक, लड़कियों के खतने, बाल विवाह और दहेज हत्या से जुड़ी समस्याओं का विस्तृत उल्लेख किया गया है। मानवाधिकार हनन के विस्र्द्ध जनमत तैयार करने वाली एक वैश्विक संस्था “एमनेस्टी इंटरनेशनल” की हाल के वर्षों में प्रकाशित रिपोर्ट में आतंकवादियों और उग्रवादियों को जहां मानवाधिकारों के हनन का दोषी माना है, वहीं पुलिस-मुठभेड़ में हुई मौतों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। आज हर देशवासी इस तथ्य से भली भांति अवगत है कि आतंकवाद और उग्रवाद भारत की एक प्रमुख समस्या है। कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवादियों का बोलबाला है। इन आतंकवादियों को पाकिस्तान का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है। भाड़े के प्रशिक्षित उग्रवादियों को कश्मीर भेजा जा रहा है जो वहां मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन करने में लगे हैं। दूसरी ओर हमारे सुरक्षा बल सामान्य स्थिति की बहाली और मानवाधिकारों की सुरक्षा हेतु संघर्षरत हैं किंतु पाकिस्तानी हुक्मरान हमारे सुरक्षाबलों को ही मानवाधिकारों के उल्लंघन का दोषी मानते हैं। उग्रवादियों द्वारा की गई निर्दोष लोगों की हत्या का उन्हें स्मरण तक नहीं आता।

मानवाधिकार की व्याख्या तथा इन्हें लागू करने के तरीकों को लेकर भारत का विचार है कि मानवाधिकारों को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भ से अलग नहीं किया जा सकता। भले ही कुछ गैर-सरकारी संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा भारत में विशेषकर कश्मीर और पूर्वोत्तर में मानवाधिकारों के कथित हनन के दुष्प्रचार किये जा रहे हों; मगर मीडिया की सजगता और सक्रियता के चलते जिस तरह मानवाधिकारों के प्रति जन-जागरूकता का नया शंखनाद फूंका गया है, उससे एक विश्वास का माहौल बना है। साथ ही पाकिस्तान तथा एमनेस्टी इंटरनेशनल के मानवाधिकार हनन के आरोपों का भारत ने जिस तरह से प्रमाणों के साथ मुंहतोड़ उत्तर दिया है, उससे भी दुनियाभर में भारत के प्रति एक सकारात्मक छवि बनी है। बावजूद इसके, इस पक्ष को कतई नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि भीतरी मोर्चे पर चुनौतियां कम नहीं हैं।

मानवाधिकार के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी वाकई काबिलेगौर है जिसमें कहा गया है कि व्यवस्थागत भ्रष्टाचार मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन है। ऐसे मामलों में अदालतें यदा-कदा ही दोषियों को दंडित कर पाती हैं। मानवाधिकारों के हनन के दृष्टिगत सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अपीलीय अदालतों को किसी सजा और दोष को निलम्बित करने में अपने अधिकारों का इस्तेमाल केवल विशेष परिस्थिति में ही करनी चाहिए और ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल बहुत सावधानी और संयम के साथ करना चाहिए। विशेष परिस्थिति में भी सजा व दोष को निलम्बित करने के अधिकार का प्रयोग उसी समय किया जाना चाहिए जब दोषी व्यक्ति न्यायालय को संतुष्ट करता हो; साथ ही अपीलीय न्यायालय को याचिकाकर्ता द्वारा पेश किए गए सभी तथ्यों पर न्यायसंगत तरीके से विचार करना चाहिए। यदि न्यायालय दोष को स्थगित करता है तो उसे हर हाल में उन कारणों को दर्ज करना चाहिए कि वह आखिर क्यों इस तरह की राहत दे रहा है।

मानवाधिकार के साथ-साथ यदि समाज का हर व्यक्ति अपने मानवोचित कर्त्तव्यों का ईमानदारी से पालन करे तभी मानवाधिकार हनन की घटनाओं अंकुश लग सकता है। हम अगर अपने लिए आदर व सुरक्षा चाहते हैं तो हमें दूसरों का भी सम्मान करना होगा। आज के अधिकांश राजनीतिक नेता अपने कर्त्तव्यों का पालन करने में उदासीन दिखते हैं, उनका सारा ध्यान सत्ता में बने रहने पर केन्द्रित रहता है, मानवाधिकार हनन के बढ़ते मामलों में इन राजनेताओं की उदासीनता एक बड़ा कारक है। हम धर्म निरपेक्ष समाज की स्थापना की बात तो करते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं कि पूरी तरह से धार्मिक हुए बिना कोई धर्म निरपेक्षता की बात नहीं कर सकता? समझना होगा कि दुनिया के सारे धर्मों का मूल मानवीयता है। अगर कोई अपने धर्म का हवाला देकर मानवीय भावना का विरोध करता है तो उसे अपने धर्म का सही ज्ञान ही नहीं है। इसके लिए शिक्षा की जरूरत है। शिक्षा के माध्यम से ही हमारा संस्कार बदल सकेगा और तभी हम एक समरस समाज की संरचना कर सकेंगे और मानवाधिकार की रक्षा और सुरक्षा हो सकेगी।

इतिहास के आइने में मानवाधिकार

“द ट्वेल्व आर्टिकल्स ऑफ ब्लैक फारेस्ट” (1525) को यूरोप में मानवाधिकारों का प्रथम दस्तावेज माना जाता है जो जर्मनी के किसानों की स्वाबियन संघ के समक्ष उठायी गयी मांगों का ही एक हिस्सा है। इसके बाद यूनाइटेड किंगडम में पेटिशन ऑफ राइट्स (1628 ईस्वी) में मानवीय अधिकारों का उल्लेख किया गया तथा वर्ष 1690  ई. में जॉन लॉक ने भी अपनी पुस्तक “स्टेट्स ऑफ नेचर” में इन अधिकारों का वर्णन किया है। वर्ष 1791 ई. में ब्रिटिश बिल ऑफ राइट्स ने यूनाइटेड किंगडम में सिलसिलेवार तरीके से सरकारी दमनकारी कार्यवाहियों को अवैध ठहराया। वर्ष 1776 ई. में संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता के बाद इन अधिकारों को अमेरिकी संविधान में स्थान दिया गया। वर्ष 1789 ई. में फ्रांस क्रांति के उपरांत फ्रांस में भी मनुष्य के मूल अधिकारों को अमली जामा पहनाया गया। 16 वीं एवं 17 वीं शताब्दी में मानव के नैसर्गिक अधिकारों के पक्ष में उठे यह स्वर मानव को उसकी मौलिक स्वतंत्रता देने का आधार बने और इन्हीं विचारों के आधार पर इस मान्यता का जन्म हुआ कि किसी भी इंसान की जिंदगी में आजादी, बराबरी, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार मानवाधिकारों की श्रेणी में आते हैं।

 

संपूर्ण विश्व में इन मानवाधिकारों के महत्व को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन स्र्जवेल्ट ने अपने एक संबोधन में चार तरह की आज़ादी का नारा बुलंद किया-अभिव्यक्ति की आज़ादी, धार्मिक आजादी, अभाव से मुक्ति और भय से मुक्ति। छह जनवरी, 1941 को अमेरिकी कांग्रेस स्र्जवेल्ट के उस संबोधन को “फोर फ्रीडम स्पीच” का नाम दिया गया। चार तरह की आजादी की यही अपेक्षा आगे चलकर मानवाधिकार संबंधी घोषणा का आधार बनी। संयुक्त राष्ट्र की आमसभा ने 10 दिसंबर 1948 को मानवाधिकार दिवस की घोषणा की। इस महत्त्वपूर्ण दिवस की नींव विश्व युद्ध की विभीषिका से झुलस रहे लोगों के दर्द को महसूस कर रखी गयी थी। भारत में 28 सितंबर 1993 को मानव अधिकार कानून अमल में आया तथा 12 अक्टूबर 1993 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया जिसका मुख्यालय राजधानी दिल्ली में है।

मानवाधिकार और भारतीय दर्शन

भारत में मानवधिकार की अवधारणा सदियों पुरानी है। वैदिक काल में “सर्वे संतु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः” के रूप जिस लोकमंगल की कामना की है, उसके मूल में मानवाधिकारों के संरक्षण की ही भावना थी। प्रारम्भिक अवस्था में मानवाधिकार का उल्लेख महाभारत तथा वाल्मीकि रामायण में मिलता है। इसी की विशद् व्याख्या यूरोप में दृष्टिगोचर होती है। महाभारत युद्ध के दौरान अपने परिजनों के मोह में फंसे अर्जुन को उपदेश देते हुए भगवान कृष्ण ने कहा, “अन्याय सहकर चुप बैठे रहना सबसे बड़ा दुष्कर्म है तथा न्यायार्थ अपने बंधु-बांधवों को भी दंड देना धर्म है। इसी तरह ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व महात्मा बुद्ध ने भी कहा था, “छोड़ा मैंने यह मनुज काय, बहुजन हिताय बहुजन सुखाय”। अशोक के आदेश पत्र आदि अनेकों प्राचीन दस्तावेजों एवं विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों में अनेक ऐसी अवधारणाएं हैं जिन्हें मानवाधिकार के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। आधुनिक युग में महात्मा गांधी ने भी मानव अधिकार एवं मानवीय कल्याण की परंपरा को आगे बढ़ाया। दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार के खिलाफ उनका आंदोलन हो या भारत की आजादी के लिए उनका असहयोग आंदोलन; मुख्य मकसद मानवाधिकार की रक्षा ही रहा।                                        

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