सिस्टम से हार गयी पहलू खान की कहानी?

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वायरल मुद्दा: पहलू खान को दिल का रोग था और हार्ट अटैक से मर गया?
तो तय हो गया कि 2017 में बहरोड़, अलवर में सड़क पर पीट पीट कर मारे गए पहलू खान को किसी ने नहीं मारा। सारे छह मुजरिम झूठे फंसाये गए थे।  देश की आज़ादी की पूर्व संध्या पर यह कानून की सरेआम पिटाई है। वे वीडियो झूठे हुए?
पहलू खान को दिल का रोग था और हार्ट अटैक से मर गया। हालांकि वह वीडियो सारे संसार में देखा गया जिसमें पहलू खान की सड़क पर पिटाई हो रही है।
एक भी गवाह नहीं मिला कि पहलू खान को पीटा गया।
मेडिकल रिपोर्ट में मौत का काऱण पिटाई से नहीं बताया गया।
पहलू का पोस्ट मार्टम कम्युनिटी हेल्थ सेंटर बहरोर के तीन डॉक्टर्स की टीम ने किया था. जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था कि पहलू की मौत सदमे के चलते हुई थी और ये सदमा उन्हें उनकी चोटों के कारण लगा था. पुलिस ने इस बात को सिरे से खारिज करते हुए अपनी जांच में कैलाश हॉस्पिटल के डॉक्टर्स के शुरूआती बयानों को ही  दिया किया और उन्हीं के मद्देनजर मामले की विवेचना की. मामला पुलिस ने कितना पेचीदा बनाया इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि पुलिस ने ये तक कह दिया था कि पहलू की मौत का कारण दिल का दौरा पड़ना था, इन बातों से ये भी साफ हो गया कि पुलिस शुरू से ही अपराधियों को संरक्षण दे रही थी और हर संभव कोशिश कर रही थी कि वो छूट जाएं.
जाहिर है कि पुलिस की जांच, प्रॉसिक्यूशन की प्रस्तुति सभी कमजोर थी।
यहां जानना जरूरी है कि राजस्थान पहला राज्य है जहां मोब लिंचिंग पर पहला कानून बना है और वहां के पहले ऐसे केस की अदालत में दुर्गति हो गयी।
पहले दिन से कमजोर था केस:
अपनी मौत से पहले पहलू खान ने साफ तौर पर 6 लोगों ओम यादव, हुकुम चंद यादव, सुधीर यादव, जगमल यादव, नवीन शर्मा और राहुल सैनी की पहचान आपने हमलावरों के रूप में की थी. दिलचस्प बात ये है कि जो एफ आई आर पुलिस ने दर्ज की उसमें पुलिस ने इन 6 आरोपियों में से किसी का भी नाम नहीं डाला. साथ ही पुलिस ने अपनी ‘जांच’ के आधार पर ये भी कहा कि जिस वक़्त घटना हुई इनमें से कोई भी व्यक्ति क्राइम सीन पर मौजूद नहीं था. कह सकते हैं कि इस वर्चुअल क्लीन चिट ने सुनिश्चित किया कि पहलू के हमलावरों को उनके जघन्य अपराध के बावजूद जमानत मिल जाए.
बात चूंकि एफआईआर की चल रही है तो ये बताना भी बेहद जरूरी है कि एफआईआर दर्ज करने में 9 घंटों से अधिक का समय लगा जबकि घटना स्थल से पुलिस स्टेशन महज 2 किलोमीटर की दूरी पर था. जब आलोचना हुई तो बाद में पुलिस ने भी इस बात को माना कि उन्हें घटना की जानकारी देरी से हुई और जैसे ही उन्हें सूचना मिली उन्होंने कार्रवाई की।
एक बात और दस महीने पहले बुलन्दशहर में शहीद हुए दरोगा सुबोध कुमार सिंह के मामले में सभी मुजरिमों की जमानत हो गयी। यह मामला 302,307, 124 ए सरीखी गम्भीर धारा में था जिनमे जमानत मुश्किल होता है। जान लें कि उस मामले में भी चार्ज शीट कमजोर है।
– पंकज चतुर्वेदी की वॉल से

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