बिजली कंपनियां अब नहीं दे सकती उपभोक्ताओं पर बोझ डालने वाला कोई प्रपोजल?

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क्योंकि एआरआर टैरिफ के आकड़े अब हो चुके है प्रकाशित, अब नहीं हो सकता उसमें कानूनन कोई भी बदलाव

लखनऊ, 01 अगस्त, 2020: उपभोक्ता परिषद का दावा है कि पावर कार्पोरेशन व प्रदेश की बिजली कंपनियां अपने बिछाए हुए जाल में खुद उलझ कर रह गयी हैं। नियमानुसार वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) व टैरिफ का जब एक बार समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित हो जाता है और उसकी सुनवाई की शुरू हो जाती है फिर उसमे कोई भी बदलाव बिजली कंपनियां नहीं कर सकती जो आकड़े अब एआरआर के प्रकाशित हो गये उसी पर आम जनता व उपभोक्ता की सुनवाई होनी है।

यह बताया कारण:

उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि अब बिजली कंपनियां चाह कर भी उपभोक्ताओं पर बोझ डालने वाला कोई भी प्रपोजल नहीं दे सकती अब नियामक आयोग को तय करना है की वह उपभोक्ताओ का जो बिजली कंपनियां पर रुपया 13337 करोड़ निकल रहा है उसकी वापसी उपभोक्ताओ को कैसे दिलाती है रेगुलेटरी लाभ देकर या बिजली दरों में कमी करके 6 प्रतिशत वितरण हानियों को बढ़ाकर बिजली कम्पनियो ने जो गैप बढ़ाकर रुपया 4500 करोड़ दिखाया है वो केवल टैरिफ जारी होने तक दिखेगा उसे कटौती होकर जीरो होना है इस बार उपभोक्ताओ की बिजली दरों को काम होने से कोई नहीं रोेक सकता।

उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष व राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा वर्ष 2017-18 में वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) व टैरिफ का एक बार जब समाचार पत्रों में विज्ञापन जारी होकर सुनवाई शुरू हो गई थीे उसी बीच पावर कार्पोरेशन ने रेट चार्ट में मिसलेनियस चार्ज में कुछ बढ़ोतरी का अतरिक्त सबमिशन दाखिल किया था जिसको उपभोक्ता परिषद के विरोध के बाद विद्युत नियामक आयोग ने उसे सज्ञान में ही लेने से मना कर दिया था, इस प्रकार के एक मामले में पहले भी नियामक आयोग नजीर स्थापित कर चुका है ऐसे में अब बिजली कंपनियां जो भी प्रपोजल देगी वह एक सुझाव की भांति ही नियामक आयोग को देखना होगा जहा तक सवाल है बिजली कम्पनियो द्वारा टैरिफ स्ट्रकचर को सरल बनाने और स्लैब को कम करने का तो बिना किसी बढ़ोतरी के कोई भी वयवस्था में सरलीकरण हो तो उपभोक्ता परिषद उसका हमेशा स्वागत करेगा लेकिन उसके सहारे हिडन तरीके से उपभोक्ताओ पर कोई बोझ डालने का प्रयास हुवा तो उसका हर स्तर पर विरोध होगा।

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