आज पूरा विश्व दुःखी है, यहाँ अनगिनत भय हैं, बढ़ रहा यम है।
खुद को बदलना पड़ेगा हमें अब, तभी मानो मानव की विजय है।।
कोविड-19 जैसे महाविषाणु के चलते पूरे विश्व में भय व्याप्त है। मानव जाति में त्राहि-त्राहि मची है। लोग जान बचाने के लिये जीविका छोड़ घर में दुबके हैं, और अगर जीविका का ही अंत हो गया तो जीवन यापन कैसे होगा? आमजन में बहुत ही असमंजस की स्थिति है। यह स्थितियाँ देश व विदेश पूरे विश्व में व्याप्त हैं। अभी जब तक इस महाविषाणु की दवा या वैक्सीन नहीं बन जाती तब तक तो स्थितियाँ अतिगंभीर हैं ही, लॉकडाउन व गाईड लाइन का पालन तो करना ही पड़ेगा। इसके बाद तो कई लोग अपने जीविकोपार्जन का साधन ही बदल सकते हैं। कोरोना की दवा आने के बावजूद भी बहुत से परिवर्तन करने पड़ सकते हैं व बहुत सी सावधानी बरतनी आवश्यक हो सकती है। हो सकता है ये परिवर्तन हमें अपनाने ही पड़ें और तभी हम ऐसे अदृश्य महाशत्रुओं से बच कर मानव जाति व सभ्यता को बचा सकें। कोरोना के बाद भारत व विश्व में क्या परिवर्तन व बदलाव हो सकते हैं या किये जाने आवश्यक हैं उस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए हमारे सीनियर कॉपी एडीटर राहुल कुमार गुप्त ने बहुत से चिंतनशील, दूरदर्शी तथा विभिन्न व्यवसायों से संबंधित लोगों से ऑनलाईन सुझाव व विचार साझा किये। इन सुझावों व विचारों से संबंधित यह दूसरी कड़ी है।
यूपी के बबेरू विधानसभा क्षेत्र के एड. सुनील पाण्डे से इस विषय में काफी विस्तृत चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि इस तरह की समस्या शायद ही मानवीय सभ्यता के इतिहास में आयी हो, हो सकता है लेकिन वो वैश्विक तो कतई न रही होगी। ग्लोबलाईजेशन के इस दौर (जब दुनिया एक मुट्ठी में है) के कारण ही इस महामारी ने वैश्विक रूप धारण कर लिया है। अतः ऐसी महामारियों से भविष्य में बचने के लिये भौमंडलीकरण के पर्याय कितने बदलेंगे अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन परिवर्तन तो जरूर होगा। विश्व के देशों में बाजार का स्वरूप स्वदेशी वस्तुओं से लबरेज हो सकता है। बाजार के मामले में या पर्यटन के मामले में ग्लोबलाईजेशन का विस्तार लोग भले ही स्वतः कम कर दें लेकिन सरकारें कुछ सख्त नियम बनाते हुए इनके बदलाव में शायद ही कोई परिवर्तन करे।

हमारे देश में गरीबी का प्रतिशत भी कम नहीं है तथा निम्न मध्यवर्गीय को जोड़ें तो यह प्रतिशत 65 पार हो जायेगा। महामारी के दौर में गाज तो गिरती सब पर है। लेकिन इसकी तीव्रता की दर निम्न मध्य वर्गीय व मध्य मध्यवर्गीय परिवारों पर भी काफी होती है। हम भी इन्हीं परिवारों से आते हैं तो आज के विपदा की स्थिति से भी भलीभाँति वाकिफ़ हैं। शायद ही इन परिवारों के लिये भविष्य में भी कोई रियायत दी जाये। सरकार को इन परिवारों की ओर भी ध्यान आकृष्ट करना होगा। क्योंकि यही मध्यवर्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। सबसे ज्यादा परिवर्तन इन्हीं के जीवन पर होने वाला है अतः सरकार को इन वर्गों के हितों के लिये जरूर कोई ठोस कदम उठाने चाहिए।
जिस प्रकार से इस महामारी से अर्थव्यवस्था की रीढ़ की टूट रही है उससे तो समय पर होने वाले चुनावों को भी टालना अतिआवश्यक हो गया है। इसके लिये राष्ट्रपति और राज्यपाल विशेष अधिकारों का प्रयोग कर अध्यादेश लागू कर सकते हैं। अगर जिन प्रदेशों में यह समय बढ़ाया जाये तो उस विधानसभा में विपक्ष के विधायकों को भी मंत्रिमंडल में स्थान देने का भी प्राविधान कर इतिहास रच देना चाहिए, जिससे विपक्ष का हित भी न टकराये। या फिर ऐसा न हो सके तो उन प्रदेशों में राष्ट्रपित शासन ही लगा दिया जाये।
उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनावों को भी एक बड़े वक्त के लिये टाल देना ही उचित है। कुछ ऐसे नियम बनायें जायें जिसमें खर्च की सीमा पिछले चुनावों की अपेक्षा काफी कम हो और प्रत्याशी अपना प्रचार-प्रसार सोशल मीडिया व पंपलेट व बैनरों के द्वारा ही करे न कि घर-घर जाकर। किसी भी प्रकार के चुनाव में रैलियों व सभाओं से भी बचा जाये। क्योंकि यह वायरस धरती पर जन्म ले चुका है और तबाही भी मचा रहा है तथा यह सदा के लिये धरती का हो भी गया है भले वो सक्रिय रूप में हो या निष्क्रिय रूप में। दवा या वैक्सीन के बाद भी काफी वक्त तक हमें सावधानियाँ बरतनी पड़ेंगी। सोशल डिस्टेंसिंग व समय-समय पर जारी गाईडलाईन का पालन जरूर करना पड़ेगा।
हम सबको अब भारतीय परंपरा की शैली नमस्कार के अभिवादन को ही अपनाने पर जोर देना पड़ेगा। गले मिलना व हाथ मिलाने की परंपरा को जितनी जल्दी त्याग सकें त्याग दें यही सबके हित में है। इसके अलावा एक बात और बता दें कि इस वायरस का भय वैक्सीन आने के बाद भी रहेगा ऐसे में दुनिया ऑनलाईन बिजनेस व डिजिटलाईजेशन की ओर तेजी से अग्रसर होगी।
जारी….!







