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    बिना बोटी वाली कोरोना ईद गरीब की रोटी का इंतजाम करेगी

    By May 24, 2020Updated:May 24, 2020 Featured No Comments6 Mins Read
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    नवेद शिकोह : 8990180256

    ईद का अर्थ है ख़ुशी। कोई भूखा हो तो खुशी कैसी ! मुल्क की समस्याओं का एहसास कर इन परेशानियों से निपटने में अपना योगदान ना दे पायें, तो ईद कैसी !

    इसलिए इस बार बिना बोटी वाली कोरोना ईद गरीबों की रोटी का ख्याल रखेगी। देश के उलमा ने एलान किया है कि कोविड 19 के मद्देनजर सरकार की गाइड लाइन और सोशल डिस्टेंसिंग का ख़्याल रखते हुए ईद मनाये। मुस्लिम स्कॉलर्स ने भी सोशल मीडिया के जरिये मुस्लिम समाज को याद दिलाया है कि इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य दान है। पड़ोसी का बच्चा भूखा हो.. फटे-पुराने कपड़े पहने हो तो ईद यानी खुशी नहीं मनायी जा सकती। ऐसे में पहला फर्ज है कि हम भूखे का पेट भर कर, गरीब बच्चों के कपड़े का इंतेजाम करके ही ईद मना सकते है। जरुरतमंदों की मदद करने की ख़ुशियों वाली ईद को मीठी ईद भी कहते हैं।

    file photo

    अल्लाह की इबादत और रोज़े जैसे त्याग की भावना वाले कठिन इम्तिहान में पास होने के इनाम की सूरत में भी इस त्योहार को देखा जाता है। मोहब्तों और गंगा जमुनी तहज़ीब के साथ दूसरे धर्मों के लोगों के साथ हंसी-खुशी मिलने जुलने और लज़ीज़ व्यजनों की दावत देना ईद की रौनक होती है। मीठी सिवइंयों के अलावा नॉनवेज की दावतें भी मुसलमानों के सबसे बड़े इस त्योहार का ज़ायका है। इस बार इस पर्व के कई रंग फीके हैं। ग़ायब रंगों में एक रंग का ना होना काफी खलेगा। कोरोना वायरस से प्रभावित ये ईद बिना बोटी वाली ईद होगी। क्योंकि नॉनवेज लज़ीज़ व्यंजन नहीं बन सकेंगे। उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम सूबों में गोश्त (मीट) की दुकाने खुलने की अभी तक इजाजत नहीं मिली है। लगभग कोरोना प्रभावित हर सूबे की सरकारों ने जरुरी सामानों और तमाम खाने-पीने की चीजों की दुकानें खोलने की इजाजत दे दी है। मॉल वगैरह को छोड़कर तमाम एहतियातों की शर्त पर बाजार खुलने लगे हैं। करीब दो महीने बाद खुले बाजारों की दुकानों के सन्नाटों को किसी हद तक ईद ने तोड़ा भी। ईद की चांद रात (पूर्व संध्या) के लिए गोश्त की बिक्री की ख़ास तैयारियां होती थीं। मुस्लिम बाहुल्य बाजारों में रात भर गोश्त की दुकानें खुलती थीं। बल्कि इस त्योहार के मद्देनजर तमाम अस्थाई मीट शॉप् खुल जाती थीं।

    Image

    इस बार कोरोना से बचने की तमाम एहतियातों के बीच उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने गोश्त की बिक्री की इजाजत नहीं दी। भीड़ लगने के अंदेशे के तहत लखनऊ के कुछ बाजार खोलने की अनुमति भी नहीं मिली। पुराने लखनऊ के नक्खास, अमीनाबाद, नजीराबाद, कैसरबाग के अलावा निशातगंज इत्यादि मे ख़ास करके ईद के बाजारों की रौनक होती थीं। जिसमें रात-रात भर सैकड़ों स्थाई और अस्थाई गोश्त की दुकानों में रात-रात भर बिक्री होती थी। ईद की तमाम खबरों में एक खबर ये भी होती थी कि एक रात में इतने बकरे-मुर्गे कटे। पुराने लखनऊ के इन तमाम बाजारों को खोलने की ख़ासकर के इजाजत ना देने का मुख्य कारण ये है कि ऐसे ज्यादातर मोहल्लों के लोग कोरोना संक्रमण का शिकार हुए हैं। और ये इलाके हॉट स्पाट घोषित हुए है।

    इस वजह के अलावा भी लखनऊ सहित उत्तर प्रदेश और अन्य कुछ राज्यों में मीट बिक्री को आम खाने पीने की चीजों में शामिल ना करके इसकी बिक्री की इजाजत अभी नहीं दी गई । हांलाकि मेडिकल विशेषज्ञों ने पका हुआ मीट खाने को कोरोना के खतरे से नहीं जोड़ा है।

    कोरोना काल में इसकी बिक्री बहाल ना होने से छोटे-बड़े मीट व्यवसाइयों का कारोबार बुरी तरह से प्रभावित हो गया। ईद इनकी सहालग होती थी,जो इस बार चौपट हो गई। लॉकडाउन से कुछ दिन पहले ही जब कोरोना का खौफ मंडराने लगा था तब से ही लोगों ने डर के मारे गोश्त खाना ख़ुद बंद कर दिया था। खासकर चिकन के बारे में तो ये अफवाह फैल गई थी कि इसे खाने से कोरोना हो सकता है। जिसकी चपेट में मटन भी आ गया था। जो चिकन दो से तीन सौ रुपये में बिकता था वो कोरोना खतरे के शुरुआती दौर में इतना सस्ता हो गया था कि पचास-साठ रुपये में बेचा गया। खबरें ये भी आयीं थी कि कई मुर्गा मीट व्यवसायी जंगलों में मुर्गे छोड़ आये थे।

    लॉकडाउन में मीट की बिक्री बंद हो गयी थी। ऐसे में कुछ कसाई तो रोजी-रोटी के लिए सब्जी बेचने लगे, और कुछ चोरी-छुपे बकरा-मुर्गा काट कर अवैध रूप से गोश्त बेच रहे हैं। इनका तरीका ये है कि वो घरों में जाकर आर्डर लेते हैं। फिर आसपास से बकरा/मुर्गा खरीद कर उसे काट कर चुपके से घरों पर गोश्त बेच देते हैं।
    लेकिन इस तरह से अवैध रूप से गोश्त की बिक्री को ज्यादातार लोग नहीं स्वीकार करेंगे।

    ईद पर इस तरह से गोश्त की खरीद पांच फीसद मुसलमान भी नहीं करेगे। सुनने मे आ रहा है कि अवैध या खतरों से भरे गोश्त के बजाय लोग शाकाहारी ईद मनाने के मूड मे हैं। इसलिए कोरोना प्रभावित ये ईद बिना बोटी वाली ही ईद होगी।

    कोरोना महामारी से फीकी पड़ी ईद इस बार अपने कई रंगों के बिना मनायी जायेगी। इस संकट काल में मुस्लिम समाज पहले ही नये कपड़े नहीं बनवाने का ऐलान कर चुका है। ईद की अहम चार और चीजें होती हैं। मस्जिदों में ईद की नमाज पढ़ना। गले मिलना। एक दूसरे के घर जाना। और ईद मिलन समारोह की गैदरिंग। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए त्योहार की ये रौनकें भी नज़र नहीं आयेंगी।

    कई बार ऐसा हो चुका है कि किसी ग़मी/दंगे/नरसंहार या बड़े धार्मिक गुर की मृत्यु के कारण ईद नहीं मनायी गयी। किंतु इस बार कोरोना वायरस के खतरे, गरीबी, बेरोजगारी, बदहाली, बंदी और प्रवासी मजदूरों की दुर्गत देखकर ईद को नयी सूरत में मनाने का फैसला किया गया है। इस बार ईद के दान में विस्तार किया जायेगा। नये कपड़ों और मीट जैसे मंहगे व्यंजनों के बजट में प्रवासी गरीब मजदूरों या अन्य गरीबों को भोजन कराने और आर्थिक सहायता देने का ऐलान इस बार ईद में इंसानित के रंगों से और भी खूबसूरत बना देंगे।
    इसलिए गरीब की रोटी का इंतजाम करने वाली बिना बोटी वाली ईद पहले की ईदों से कुछ कम हसीन नहीं होगी।

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