बात बहुत पते की है मित्रों! डिजरायली ने बहुत गूढ़ बात कही है-”दोस्त यदि तुम अपना स्वास्थ्य खराब करना चाहते हो तो नशे पर पैसा खर्च मत करो, केवल अपने को गुस्से से भरे रखो, गुस्सा तुम्हारे रक्त में इतना विकार पैदा कर देगा कि वह जहरीला हो जाएगा।”
वास्तव में कोप, दुर्भाव, ईर्ष्या, प्रतिशोध की भावना-ये व्यक्ति के विवेक को टेढ़ा कर देते हैं। शत्रुता का भाव अपने आसपास अनेक शत्रु खड़े कर देता है। इसके विपरीत मित्रता का भाव आपके चारों ओर मित्रों की जमात खड़ी कर देता है।
निषेधात्मक भावों और विचारों से बचें। इससे जीवनी शक्ति क्षीण होती है। नकारात्मक चिंतन तनाव उत्पन्न करता है। इससे अम्ल की मात्रा अधिक उत्पन्न होने से उत्तेजना बढ़ती है। इससे जीवनी शक्ति, प्राणशक्ति को क्षति पहुंचती है। क्रोध प्राणनाशक शत्रु है। यह तप, संयम, दान आदि के फल को भी नष्ट कर देता है।
ईर्ष्या की वृत्ति भी बहुत कष्टकर होती है। किसी के घर फूल भी खिलता है तो पड़ोसी को जुकाम हो जाता है। यह असहिष्णु वृत्ति है। नौकरानी अच्छी साड़ी पहनकर आ जाए तो मालकिन जल-भुन उठती है, भले ही स्वयं के पास एक से बढ़कर एक कीमती सौ साडि़यां पड़ी हैं। पड़ोसी के घर का रंगीन टीवी सिरदर्द बन जाता है, चाहे स्वयं के पास दो-दो टीवी सेट और वीसीआर हों।
एक प्रौढ़ महिला का पति क्लास वन अधिकारी है। आमदनी बढि़या है। बहू-बेटे बाहर रहते हैं। किसी प्रकार की तकलीफ नहीं, चिंता का कोई कारण नहीं, फिर भी सदा बीमार रहती हैं, निरंतर डॉक्टरों का चक्कर। कारण नेगेटिव विचार। विचारों से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा कोई डॉक्टर नहीं कर सकता। भीतर में बिलौना चलता है तो छींटे आसपास उछलते ही हैं। तनाव, चिंता, गुस्सा, चिड़चिड़ापन-इनसे शरीर की 185 मांसपेशियां एक साथ प्रभावित होती हैं। इससे बचने के लिए सकारात्मक सोच की अहं भूमिका रहती है।







