नवेद शिकोह
न्यूज़ चैंनलों की लफ्फाज़ी और अख़बारों का गंभीर संपादकीय पक्ष भी एक जैसा था। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की वजह को सबने एक नज़रिये से देखा। लॉबीबाज़ी, चाटूकारिता, कुनबेबाज़ी, जातिवाद, समझौतावाद जैसे किसी सांचे में ख़ुद को फिट कर लेते तो सुशांत को अपने ढलते कैरियर के सदमें में आत्महत्या करने पर मजबूर नहीं होना पड़ता।
फिल्म इंडस्ट्री पर कुछ इस तरह की उंगली उठाने वाली ये वही मीडिया है जहां टैलेंट की सबसे ज्यादा बेक़दरी होती है। अभिनेता सुशांत को तो मौक़े मिले भी। लेकिन उसकी ऊंची उड़ानों से घबराये बड़े प्रोडक्शन हाउसेज़ और मठाधीश सुपर स्टार्स/निर्माता-निदेशकों ने उसके हिस्से का आसमान छीन लिया। पर न्यूज़ मीडिया के मठाधीश तो किसी प्रतिभा को तब तक प्रवेश ही नहीं देते जब तक आप उनके अनैतिक किस्म के सांचे में फिट नहीं होते। सिर्फ अपने टेलेंट के दम पर मीडिया में भी अपवाद स्वरूप कुछ सुशांत प्रवेश कर भी लेते हैं पर वे भी शौषण और उत्पीड़न का शिकार होकर पैदल कर दिए जाते।
फिल्म इंडस्ट्री से ज्यादा यहां लॉबीबाज़ी, चाटूकारिता, कुनबेबाज़ी, परिवारवाद, क्षेत्रवाद, लिंगभेद, धर्म और जातिवाद का बोलबाला होता है। मीडिया के क्षेत्र में भी बड़े-बड़े प्रतिभाशाली पत्रकार खाली बैठे हैं। अवसाद मे हैं। बेरोजगारी की वजह से आर्थिक तंगी से वो टूट गये हैं।
लगभग ढाई दशक से जब से कॉरपोरेट ने मीडिया को मुट्ठी मे लिया है तब से बड़े अखबारों से लेकर न्यूज चैनलों में चंद मठाधीश मीडिया माफियाओं की तूती बोलती है। बड़े मीडिया हाउस में ठीक ठाक काम के लिए उनको साधना जरूरी है। या तो आप बरसों उनकी चाटूकारिता कर उनके विश्वास के सांचे में ढलने में कामयाब होइये, या फिर उनके हिसाब से किसी ख़ास विचारधारा या पार्टीवाद के चटक रंगों में रंग जाइये।
इस तरह के किसी मीडिया मठाधीश के रिश्तेदार हों तो नौकरी/ओहदे या बड़ी हैसियत निश्चित ही हासिल हो जायेगी। अक्सर क्षेत्रवाद भी चलता है। दलाली यानी लाइजनिंग की खूबियां हों तो भी आपको बाहों में भरने के लिए मीडिया अपने हाथ बढ़ा देता हैं। कहीं-कहीं लड़की बाजी भी चल जाती है। धर्म और जातिवाद तो कॉमन है।
जहरीला मौसम हो तो मास्क लगाना जरूरी है। और मास्क लगा हो तो मुंह बंद रखना चाहिए है। मीडिया में जातिवाद के पारंपरिक वर्चस्व के इस जहरीले मौसम में खुलकर जातिवाद का जिक्र करना मुनासिब नहीं है, वरना अपना अनुभव जरूर साझा करता। इतना कह सकता हूं कि मैंने अपने लखनऊ में एक दौर में जातिवाद को खूब करीब से देखा।
प्रिंट मीडिया के कुछ धुरंधरों को खुलकर पहाड़वाद में लिप्त देखा। क्षेत्र, पार्टी, कुंबेबाज़ी, परिवारवाद, धर्म-जाति और विचारधाराओं के खेमों की दलदल में पनपती मीडिया आज जब अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर घड़ियाली आंसू बहाते हुए फिल्म इंडस्ट्री पर ऊंगली उठा रही है तो उसकी चार उंगलियां खुद मीडिया की तरफ हैं। ये उंगलियां बता रही हैं कि मीडिया के बड़े मठाधीश और बड़े मीडिया हाउसेज किस तरह टेलेंट की बेक़द्री करते हैं।







