कलिकाई का पश्चाताप

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दंतकथाओं में यकीन रखते हैं तो चेरापूंजी से बेहतर जगह नहीं। विश्‍वास न भी होता हो तो नैसर्गिक सुंदरता के लिए तो यहां आ ही सकते हैं। हर खूबसूरत जगह के पीछे एक कहानी आपका इंतजार कर रही है। भारत का सबसे बड़ा झरना यहीं से गिरता है, नाम है नोहकलिकाई। ले. हेनरी यूल ने अपनी ‘नोट्स ऑन द कसिया हिल्‍स, एंड पीपल’ में इसके नामकरण के बारे में लिखा है।
तो प्रचलित दंतकथा के अनुसार, इस झरने के पास बसे गांव में कलिकाई नाम की एक महिला रहती थी। पति कुली का काम करता था, रोज कई मन लोहा ऊपर पहुंचाता था। एक दिन उसकी मौत हो गई और पीछे छूट गए कलिकाई और एक मासूम बेटी। कलिकाई ने और महिलाओं की तरह कुली का काम करना शुरू कर दिया। बेटी पड़ोसियों की देख-रेख में रहती।
सखियों ने कहा कि उसे कोई दूसरा मर्द ढूंढ लेना चाहिए क्‍योंकि बच्‍ची को भी तो बाप की जरूरत होगी। कलिकाई ने जिससे दूसरी शादी की, वह इंसान के भेष में शैतान निकला। उसे नहीं पसंद था कि काम से लौटकर कलिकाई उसपर कम, अपनी बेटी पर ज्‍यादा ध्‍यान दे। मां के लिए ऐसा करना स्‍वाभाविक है, मगर कलिकाई के पति को इससे जलन होने लगी और उसने कुछ भयानक करने का मन बना लिया।
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एक रोज कलिकाई अपने काम पर गई थी, घर में उसका पति और बेटी अकेले थे। ईर्ष्‍या में अंधे हो चुके पति ने बच्‍ची को मार दिया। लाश के टुकड़े-टुकड़े किए, सिर और हड्डियां फेंक दी, मांस को पकाकर रख दिया। हालांकि पान की टोकरी में बच्‍ची की उंगलियां छूट गईं। थकी-हारी कलिकाई घर लौटी तो वहां कोई नहीं था। उसने सोचा कि बेटी अपने नए पिता के पास या पड़ोसियों संग होगी। भूख से पेट में चूहे कूद रहे थे और बर्तन से मांस की सुगंध ने कलिकाई की बुद्धि कुंद कर दी। वह ऐसी अनहोनी का अंदाजा भी कैसे लगाती।
कलिकाई ने बर्तन में रखा मांस खाया, स्‍वादिष्‍ट था पर वह नहीं जानती थी कि यह मांस किसका है। खाने के बाद, वह रोज की तरह जब उसने पान खाने के लिए टोकरी उठाई तो उसमें कटी हुई उंगलियां मिलीं। किसी फिल्‍म की तरह उसके दिमाग में पूरी घटना गुजरी, वह अपनी ही बेटी को खा गई थी, इस बात का एहसास होते ही कलिकाई जैसे पागल हो गई। वह हाथ में गंडासा लेकर भागी, खूब भागी, जो रोकने आया उसे गंडासे से हटाया। कलिकाई भागती ही रही, और आखिर में झरने से सीधे छलांग लगाकर जान दे दी।
कलिकाई ‘खासी’ समुदाय से आती थी। असली नाम ‘लिकाई’ था, पर खासियों में महिलाओं के आगे ‘क’ लगाते हैं। खासी भाषा में ‘नोह’ का मतलब कूदना होता है। कलिकाई के यहां से कूदकर आत्‍महत्‍या करने की वजह से इस झरने का नाम ‘नोहकलिकाई’ पड़ा। -दीपक राज वर्मा की वॉल से

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