नहीं थमा चचा-भतीजे में आपसी विवाद, लोकसभा चुनाव में पड़ेगा फर्क

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मुलायम सिंह के दोनों ही खेमों में पांव रखने से यादव वोटरों में कन्फ्यूजन की स्थिति बनी

लखनऊ, 12 नवंबर 2018: सपा पार्टी में मची अंदरूनी कलह अभी भी थमने का नाम नहीं ले रही है। बता दें कि चाचा यानी शिवपाल यादव को भाजपा से मिली बूस्ट अप इनर्जी से अब भतीजे यानी अखिलेश यादव और भाई रामगोपाल यादव से सियासी तौर पर दो-दो हाथ करने बल मिल चुका हैं। बताया जाता है कि इसका पहला संग्राम अगले लोकसभा के चुनाव में फिरोजाबाद सीट पर देखने को मिलेगा!

मालूम हो कि आधिकारिक तौर पर अब भी सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश ने बाकी चाचा शिवपाल यादव को सपा से बाहर करने पर मुहर न लगाई है और न ही विधान सभा की सदस्यता समाप्त करने के लिए विधान सभा अध्यक्ष को आवेदन किया है। शिवपाल सभी लोकसभा सीटों पर अपनी पार्टी के उम्मीदवारी का दावा भी कर दिया है। लेकिन मैनपुरी सीट पर शिवपाल की पार्टी की दावेदारी मुलायम सिंह के रुख पर निर्भर करेगी। शिवपाल उन्हें अपने टिकट पर लडऩे और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद सौंपने का प्रस्ताव दे चुके हैं। सपा का बेस वोट यादव है और शिवपाल यादव की गतिशील समाजवादी पार्टी भी इन्हीं वोटरों पर उम्मीद टिकाए है। मुलायम दोनों ही खेमें में पांव रखे हैं इसलिए यादव वोटरों में भी एक कन्फ्यूजन की स्थिति है।

कौन किसके साथ:

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फिरोजाबाद सीट का चुनाव मुलायम परिवार में कौन किसके साथ हैं और यादवों की रहनुमाई कौन करेगा इसका भी टेस्ट साबित हो सकती है। वजह यह है कि मुलायम परिवार की अधिकतर रिश्तेदारियां भी इसी जिले में हैं। शिवपाल खेमा फिरोजाबाद को जातीय व सामाजिक समीकरण के साथ ही मुलायम कुनबे के अंदरूनी हालात की वजह से भी मुफीद मान रहा है। 1999 फिरोजाबाद पर सपा का ही कब्जा (2009 के उपचुनाव को छोडक़र) रहा है। 2009 में अखिलेश यादव यहां से लोकसभा चुनाव जीते थे। उन्होंने यह सीट अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए छोड़ दी थी। उपचुनाव में डिंपल यह सीट नहीं बचा पाई और सपाई से कांग्रेसी हुए राजबब्बर से चुनाव हार गईं। 2014 में रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय प्रताप यादव मोदी लहर में भी इस सीट से एक लाख से अधिक वोटों से चुनाव जीते।

दूसरे महागठबंधन की चर्चाओं पर जोर:

शिवपाल खेमे का मानना है कि डिंपल यादव की इस सीट से हार से साफ है कि फिरोजाबाद की यादव बेल्ट किसी बाहरी को स्वीकार नहीं करती। इस मायने में शिवपाल यादव उनके सर्वाधिक अपने हैं। पिछले महीने रोड शो की भीड़ ने इस धारणा को और मजबूत किया है। डिंपल की हार के बाद अखिलेश यादव की ओर से फिफोजाबाद के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के भी चर्चे रहे हैं। अक्षय यादव के मौजूदा सांसद होने के एक स्वाभाविक एंटीइनकंबेंसी भी रहेगी। दूसरे महागठबंधन की चर्चाओं और अखिलेश यादव की अगुआई वाली सपा में अक्षय यादव की दावेदारी बनी रहेगी यह भी अहम सवाल है इसलिए शिवपाल खेमे ने इसे सर्वाधिक सुरक्षित सीट मान तैयारी झोंक दी है।

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