ख़ेमों के बाहर वाली संतुलित पत्रकारिता का स्पेस खाली

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नवेद शिकोह

देश की मौजूदा पत्रकारिता के तीन वर्गों में तीन किस्म के स्टार पत्रकार उभरे हैं। एक सिर्फ सरकार के कसीदे पढ़ने और सरकार के एजेंडे पर चलने वाले स्टार पत्रकार। जैसे अर्नब, सुधीर, रजत, अमीश, श्वेता.. इत्यादि।

एक वर्ग ऐसा है जो टीवी पर पर कम और वेब मीडिया पर ज्यादा है, जो स्वतंत्र मीडिया का दायरा फैला कर सरकार की आलोचना का झंडा उठा बुलंद किये है। इसमें रवीश कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद दुआ, अजीत अंजुम और अभिसार शर्मा.. इत्यादि शामिल हैं।

दो वर्गों में बंटे ये सुपर स्टार जर्नलिस्ट पत्रकारिता की आत्मा ‘संतुलन’ से दूर हट कर अपने-अपने खेमों में रहकर अलग-अलग विचारधारा के हीरो बने हैं। ये चाह कर भी खेमों से बाहर नहीं निकलना चाहते। जबकि ये लोग बखूबी जानते हैं कि इन खेमों के बाहर ही पत्रकारिता है, पर मौजूदा माहौल में खेमाबाजी वाली एजेंडाधारी पत्रकारिता में ही बड़ी फॉलोइंग, स्टारडम, हीरोइज्म और ग्लैमर है। जबकि अस्ली यानी संतुलित और निष्पक्ष पत्रकारकारिता का स्कोप कम है। इसमें नीरसता, उबाऊपन और अव्यवसायिकता है।

जो बिकता है वही दिखता है। सिद्धांतों, मूल्यों और जनहित के मूल उद्देश्यों वाली निष्पक्ष और संतिलुत पत्रकारिता को लोगों ने पसंद करना कम कर दिया इसलिए ऐसी पत्रकारिता दिखना कम हो गयी।

खेमों से बाहर संतुलित पत्रकारों का तीसरा स्पेस सन्नाटे मे है। यहां ये लगभग खाली है। यहां स्टार बनना और व्यवसायिकता क़ायम रख पाना बेहद कठिन है। इस वर्ग मे कौन स्टार पत्रकार हैं और कौन गुमनाम हैं, आप खुद बताइये। कोई नाम लिखुंगा तो लगेगा कि ये लेख किसी की प्रमोशन या चाटूकारिता के लिए लिखा गया है।

अनुमान है कि इस वर्ग में बमुश्किल दस प्रतिशत पत्रकार हैं। जिसमें ज्यादातर गुमनाम हैं। जो सिर्फ सरकार के प्रमोशन या खिलाफत नहीं बल्कि जनता की आवाज बनते हैं। जिम्मेदार विपक्ष की तरह सरकार की खामियों को उजागर करते हैं। यदि सरकार ने जनहित में कोई काम किया है तो उस सकारात्मक खबर को भी अपने क़लम का हिस्सा बनाते हैं। इस तरह के चंद पत्रकारों में फिलहाल के माहौल में हीरो बन कर उभरने की कम गुंजाइश है। लेकिनन यहां स्पेस खूब खाली है।
कुल पत्रकारिता में सरकारी, दरबारी, या गोदी मीडिया की करीब सत्तर प्रतिशत की भागीदारी है। आज के स्टार जर्नलिस्ट में इस खेमें के पत्रकार अधिक है।

सिर्फ सरकार विरोधी और जनहित खबरों वाले पत्रकारों की कुल मीडिया में बीस फीसद हिस्सेदारी है। यहां भी खूब स्टार हैं। मोदी या सरकार विरोधी पत्रकारों को बहुत जल्द सरकार विरोधी जनता की गोद में जगह मिल जाती है। विपक्ष उनकी खबरों को वायरल करता है।

इन संभावित आकड़ों को सच मानिये तो दस प्रतिशत से भी कम में सिमटी निष्पक्ष मीडिया की मौजूदा सेहत ठीक नहीं है।

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को ढहने से बचाना है तो देश की जनता को अपनी सोच को भी संतुलित रखना पड़ेगा। आंखे खोलनी पड़ेंगी। किसी भी सरकार की अंधभक्ति या अंधविरोध की अति त्यागना होगी। चाटूकार गोदी मीडिया को नकारना होगा। संतुलन के पाठ को भुलाकर सिर्फ विरोध, नकारात्मकता और आलोचना का पहाड़ा पढ़ने वालों को भी विचार करना होगा।

चार मुट्ठी दाल-चावल में एक चुटकी नमक ना पड़े तो खिचड़ी स्वाद से महरूम हो जायेगी। सौ फीसद नकारात्मक ख़बरें विरोध का एजंडा चलाने का शक पैदा करती हैं। बुरी से बुरी और बद्तर से बद्तर सरकार भी यदि 99% प्रतिशत खराब काम करती है तो एक प्रतिशत अच्छा काम भी किया ही होगा। इसलिए पत्रकारिता का फर्ज निभाइये। जिम्मेदार विपक्ष की तरह 99% प्रतिशत खबरें आलोचनात्मक लिखिए।

सरकार की नहीं जनता की आवाज बनकर पत्रकारिता कीजिए। लेकिन सरकार ने यदि एक भी काम जनहित में किया है तो उसे भी दिखाकर अपने कलम को सकारात्मक से भी सजाइये। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और जनता के बीच सेतु की भूमिका भी मीडियों को निभाना चाहिए है।

नहीं तो आपकी पत्रकारकारिता उस खिचड़ी की तरह स्वादहीन होगी जिसमें सबकुछ तो है लेकिन एक चुटकी नमक ही नहीं है। और ऐसे में सत्तापक्ष को ये कहने का आधार मिल जायेगा कि आप विपक्षी दलों द्वारा बिक कर सरकार के खिलाफ एजंडा चला रहे हैं।

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