जरुरत है देश के लोगों के लिए सुरक्षा कवच की

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जी के चक्रवर्ती

हमारे भारतीय समाज मे प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा अवश्य होना चाहिये और इसके लिये राष्ट्रीय स्तर पर एक सुरक्षा कोष का होना बहुत आवश्यक है। और इसको बनाने को लेकर जितनी तेजी की जरूरत हो या तेजी लाया जा सके उतना ही अच्छा होगा जिससे देश के सबसे गरीब और कमजोर तबके के लोगों में एक वित्तीय सुरक्षा की भावना पैदा किया जा सके।

अभी लॉकडाउन के दौरान लाखों लोगों को अपने नौकरी या अपने रोजी-रोटी से हाथ धोना पड़ा है ऐसी अवस्था में बहुत से लोग भूख से मरने के कगार पर आ गए या बहुत से लोगों ने आत्महत्या कर ली जो बेहद गंभीर विषय है। आखिर इन दिहाड़ीदार मजदूरों या फिर कोरोनाकाल में नौकरी गवां चुके मध्यम वर्ग के लिए कौन जिम्मेदार है ?

वास्तव में देश के लोगों के लिये सामाजिक सुरक्षा कोष बनाने के काम में तेजी से काम करने की आवश्यकता है, जिससे देश के सबसे गरीब और कमजोर तबके के लोगों के परिवारों में एक वित्तीय सुरक्षा की भावना पैदा की जा सके, क्योंकि एक मजदूर किसी भी देश की उन्नति एवं निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाता है। सम्पूर्ण विश्व में किसी भी देश की संस्थानों एवं उद्योग धंधों में काम करने वाले श्रमिकों की एक अहम भूमिका होती है जिसकी अहमियत को किसी से भी कमतर नहीं आंका जा सकता है। उनके श्रम के बिना औद्योगिक ढांचे से लेकर निर्माण क्षेत्रों में होने वाले तरक्की की हम कल्पना ही नहीं कर सकते है।

आजकल कोरोना वायरस के हमले से पैदा हुई आपदा के कारण हमारे देश के सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगों में मध्यम वर्ग के लोग और यही दिहाड़ी मजदूर हैं। शायद जिनके के विषय मे हमारे देश में नाममात्र की चर्चा हुई या जिम्मेदारों का ध्यान गया हो जिसके कारण इनकी डामा- डोल हुई आर्थिक स्थिति को संभालने के लिये और उन्हें राहत पहुंचाने के लिए देश की सरकार से लेकर जिम्मेदारों ने कुछ भी नहीं सोचा जबकि यह मेहनत कस मजदूर जहां काम करते हैं वहां पर भी अपने मुहँ में ताला लगा कर लगातार काम करते चले जाते हैं अपने जान माल से लेकर परिवार के बीबी बच्चों तक की परवाह किये बिना ही बेहतर कामों को अंजाम देते रहते हैं।

इसमे कोई संदेह नहीं कि देश के मजदूर वर्ग के लोग ही सबसे अधिक शोषण के शिकार हुये है। कोरोना वायरस के कारण हुये लाकडाउन की स्थिति में देश के इन दिहाड़ीदार मजदूरों और मध्यम वर्ग लोगों के सामने अपने भरण-पोषण से लेकर परिवार तक का संचालन करने का संकट खड़ा हो गया है। प्रति दिन दूर दराज जगहों और गांवों से शहरों में पहुंच कर रोजी-रोटी कमाने की तलाश में भटकने वाले इन मजदूर को अपने-अपने घरों में बंद रहने के लिये मजबूर होना पड़ा हैं, तो दूसरी तरफ खेती-बाड़ी के कामों में उनके लिए रोजगार पहले भी नहीं था और न आज है ऐसे में भूखे मरने वाले दिहाड़ी मजदूरों के लिये कौन जिम्मेदार है ?

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