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    भारतीय सेना ने पेश की मानवता की मिसाल: थार रेगिस्तान में वन्यजीवों के लिए बना दी कृत्रिम झील

    ShagunBy ShagunJune 23, 2025 ज़रा हटके No Comments5 Mins Read
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    दिलीप राय शर्मा

    भारतीय सेना ने पोकरण में प्यासे वन्यजीवों के लिए बनाई कृत्रिम झील

    भारतीय सेना ने राजस्थान के थार रेगिस्तान के पोकरण क्षेत्र में तपती गर्मी में प्यासे वन्यजीवों और पक्षियों के लिए एक कृत्रिम झील का निर्माण किया है। यह पहल सेना की ओर से पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के प्रति मानवीय संवेदना का एक अनुकरणीय उदाहरण है।

    थार रेगिस्तान, जिसे ग्रेट इंडियन डेजर्ट के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, और जोधपुर जैसे जिलों में फैला हुआ है। यह क्षेत्र अपनी भीषण गर्मी और पानी की कमी के लिए जाना जाता है, जहां गर्मियों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। पोकरण, जो जैसलमेर जिले में स्थित है, भारतीय सेना का एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण और परीक्षण क्षेत्र है, विशेष रूप से परमाणु परीक्षणों के लिए प्रसिद्ध। इस शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्र में वन्यजीवों, जैसे चिंकारा, काला हिरण, गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड), और विभिन्न प्रवासी पक्षियों, के लिए पानी की उपलब्धता एक गंभीर चुनौती है।

    अनुकरणीय भारतीय सेना की पहल:

    भारतीय सेना, जो न केवल देश की सीमाओं की रक्षा करती है, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को भी निभाती है, ने पोकरण के रेगिस्तानी इलाके में एक कृत्रिम झील बनाई। यह झील विशेष रूप से वन्यजीवों और पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए डिज़ाइन की गई है।

    प्लानिंग के बाद दिया मूर्तरूप :

    सेना ने स्थानीय भू-संरचना का अध्ययन कर एक ऐसी जगह चुनी जहां पानी को संग्रहित किया जा सकता है। खोदाई के बाद, झील को पानी से भरने के लिए टैंकरों और अन्य संसाधनों का उपयोग किया गया। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, यह झील वर्षा जल संचयन के लिए भी उपयुक्त बनाई गई है, ताकि मानसून के दौरान इसे प्राकृतिक रूप से भरा जा सके।

    उद्देश्य: इस पहल का मुख्य उद्देश्य गर्मियों में पानी की कमी से जूझ रहे वन्यजीवों, जैसे चिंकारा, काले हिरण, लोमड़ी, और दुर्लभ पक्षी प्रजातियों, विशेष रूप से गोडावण, को जीवन रक्षा का सहारा देना है। गोडावण, जो राजस्थान का राजकीय पक्षी है, विलुप्तप्राय प्रजाति है और इस क्षेत्र में इसकी आबादी संरक्षण की मोहताज है।

    जैव-विविधता को मिलेगा बढ़ावा : इस कृत्रिम झील ने न केवल वन्यजीवों को पानी उपलब्ध कराया, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी समृद्ध किया। पक्षियों और छोटे स्तनधारियों की मौजूदगी बढ़ने से क्षेत्र की जैव-विविधता को बढ़ावा मिला है।

    वन्यजीवों के लिए पानी सबसे जरुरी :

    थार रेगिस्तान में पानी की कमी के कारण हर साल सैकड़ों जानवर और पक्षी निर्जलीकरण। से मर जाते हैं। यह कृत्रिम झील निम्नलिखित तरीकों से वन्यजीवों के लिए वरदान साबित हो रही है:

    1. पानी की उपलब्धता: चिंकारा, काला हिरण, और रेगिस्तानी लोमड़ी जैसे जानवरों को अब दूर तक पानी की तलाश में भटकना नहीं पड़ता।
    2. पक्षी संरक्षण: गोडावण, सोहन चिड़िया, और अन्य प्रवासी पक्षियों के लिए यह झील एक महत्वपूर्ण जल स्रोत बन गई है। राजस्थान में गोडावण की आबादी केवल 100-150 के आसपास बची है, और यह पहल उनके संरक्षण में मददगार हो सकती है।
    3. पारिस्थितिकी संतुलन: पानी की उपलब्धता से छोटे कीटों और वनस्पतियों को भी सहारा मिलता है, जो खाद्य श्रृंखला का आधार हैं।
    4. स्थानीय समुदाय: यह झील अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय पशुपालकों और ग्रामीणों को भी लाभ पहुंचा रही है, जिनके पशु कभी-कभी इस पानी का उपयोग करते हैं।

    भारतीय सेना की अन्य पर्यावरणीय पहलें:

    यह पहली बार नहीं है जब भारतीय सेना ने पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं। कुछ अन्य उल्लेखनीय प्रयास:
    लद्दाख में वृक्षारोपण: सेना ने लद्दाख के शुष्क क्षेत्रों में लाखों पेड़ लगाए हैं, जिससे मरुस्थलीकरण को रोकने में मदद मिली है।

    • गंगा सफाई: सेना ने नमामि गंगे परियोजना में योगदान दिया है।
    • आपदा प्रबंधन: बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सेना ने वन्यजीवों और स्थानीय लोगों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    सोशल मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया:

    सोशल मीड डडिया पर इस पहल की जमकर सराहना हो रही है। कई यूजर्स ने इसे “सेना की मानवता” और “जीवन रचने की ताकत” करार दिया। एक पोस्‍ट में कहा गया, “जहां जिहादी बम बोते हैं, वहां भारतीय सेना जीवन उगाती है।”। यह पहल न केवल वन्यजीवों के लिए, बल्कि सेना की छवि को एक संरक्षक और रचनात्मक शक्ति के रूप में मजबूत करती है।

    भविष्य में और संसाधनों की आवश्यकता:

    1. रखरखाव: इस झील को गर्मियों में पानी से भरे रखने के लिए नियमित निगरानी और संसाधनों की आवश्यकता होगी।
    2. विस्तार: ऐसी और झीलें अन्य रेगिस्तानी क्षेत्रों में बनाई जा सकती हैं, जैसे बाड़मेर और बीकानेर, जहां वन्यजीवों की स्थिति समान है।
    3. सहभागिता: स्थानीय समुदाय और गैर-सरकारी संगठनों को इस पहल से जोड़ा जा सकता है ताकि इसका दीर्घकालिक प्रभाव हो।

    भारतीय सेना की यह पहल न केवल थार रेगिस्तान के प्यासे वन्यजीवों के लिए जीवनदायिनी है, बल्कि यह मानवता, करुणा, और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक है। यह कृत्रिम झील हजारों जानवरों और पक्षियों को जीवन जीने का सहारा दे रही है, विशेष रूप से दुर्लभ गोडावण जैसे प्रजातियों को, जो विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह कहानी उस सेना की है, जो न केवल सीमाओं की रक्षा करती है, बल्कि प्रकृति और उसके प्राणियों के लिए भी उतनी ही संवेदनशील है।

    हम भी अपने आसपास के जीवों के लिए जीवन की बूंद बनें

    इतना बड़ा कार्य होने के बाद हमें भारतीय सेना की इस नेक पहल को नमन करना चाहिए और खुद भी पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए छोटे-छोटे कदम उठाने की प्रेरणा लेनी चाहिए। आइए, इस रेगिस्तान में बनी झील की तरह, हम भी अपने आसपास के जीवों के लिए जीवन की बूंद बनें।

    Shagun

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