पाकिस्तान के परमाणु हथियारों तक पहुंच गया था भारत, पाक का एयर डिफेंस सिस्टम ट्रैक करने में रहा पूरी तरह नाकाम
नई दिल्ली, 13 मई 2025: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को 26 पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले ने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया। इस जघन्य हमले का जवाब देने के लिए भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया, जिसके तहत 7 मई से पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सिलसिलेवार कार्रवाइयां की गईं। इस अभियान का सबसे चौंकाने वाला और निर्णायक क्षण था 10 मई को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर भारत का सटीक मिसाइल हमला। इस हमले ने न केवल पाकिस्तान की सैन्य ताकत को झकझोर दिया, बल्कि उसके परमाणु हथियारों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उसी दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच सीजफायर की घोषणा हुई, लेकिन इसके पीछे नूर खान की तबाही और पाकिस्तान के परमाणु कमांड सेंटर पर मंडराते खतरे की कहानी छिपी है।
नूर खान एयरबेस: पाकिस्तान का सामरिक केंद्र
नूर खान एयरबेस, जिसे पहले चकला एयरबेस के नाम से जाना जाता था, पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से मात्र 10 किलोमीटर दूर रावलपिंडी में स्थित है। यह पाकिस्तान वायुसेना का प्रमुख लॉजिस्टिक हब है, जो वीआईपी मूवमेंट, टोही मिशन और लंबी दूरी की मिसाइलों के संचालन का केंद्र है। सबसे अहम, यह एयरबेस पाकिस्तान के स्ट्रैटेजिक प्लान्स डिविजन (एसपीडी) और नेशनल कमांड अथॉरिटी (एनसीए) के मुख्यालय के बेहद करीब है, जो देश के करीब 170 परमाणु हथियारों की सुरक्षा और संचालन की जिम्मेदारी संभालता है।
भारत का घातक हमला: ब्रह्मोस, हैमर और स्कैल्प का कमाल
10 मई की सुबह भारत ने ब्रह्मोस, हैमर और स्कैल्प मिसाइलों के जरिए नूर खान एयरबेस पर सटीक हमला किया। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह हमला इतना प्रभावी था कि पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम इसे ट्रैक करने में पूरी तरह नाकाम रहा। हमले में एयरबेस का महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा तबाह हो गया, जिससे पाकिस्तानी सेना में खलबली मच गई। इस कार्रवाई ने पाकिस्तान को साफ संदेश दिया कि भारत की मिसाइलें उसके सबसे संवेदनशील सैन्य ठिकानों तक पहुंच सकती हैं।
परमाणु कमांड सेंटर पर खतरा
नूर खान एयरबेस से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित पाकिस्तान का परमाणु कमांड सेंटर इस हमले की जद में आ गया था। न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत का यह हमला एक रणनीतिक संदेश था कि वह पाकिस्तान के परमाणु कमांड को ‘डिकैपिटेट’ (निष्क्रिय) करने की क्षमता रखता है। एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने कहा, “पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि भारत उसकी परमाणु कमान को नष्ट न कर दे। नूर खान पर हमला इसी दिशा में पहला कदम हो सकता था।”
रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि यदि भारत की ब्रह्मोस मिसाइल 1-2 किलोमीटर और सटीक निशाना लगाती, तो पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के जखीरे में विस्फोट और रेडिएशन की स्थिति पैदा हो सकती थी। हालांकि, ये दावे स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुए हैं, और भारत ने भी इस तरह की किसी संभावना की आधिकारिक पुष्टि नहीं की। फिर भी, इस हमले ने पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व में दहशत पैदा कर दी। खबरों के अनुसार, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तत्काल एनसीए की आपात बैठक की, जो परमाणु हथियारों के उपयोग पर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है।
सीजफायर का राज: अमेरिकी हस्तक्षेप
नूर खान एयरबेस पर हमले के बाद पाकिस्तान को अपनी परमाणु क्षमता पर बढ़ते खतरे का अहसास हुआ। इस स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर अमेरिका को तत्काल हस्तक्षेप के लिए मजबूर किया। 10 मई की शाम को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान ने सीजफायर की घोषणा की। यह सीजफायर न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए जरूरी था, बल्कि एक बड़े परमाणु संकट को टालने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम था।
नूर खान एयरबेस पर भारत का हमला न केवल एक सैन्य सफलता थी, बल्कि एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक भी था, जिसने पाकिस्तान को उसकी कमजोरियों का अहसास कराया। इस कार्रवाई ने भारत की सैन्य ताकत और उसकी सामरिक रणनीति को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित किया। हालांकि, इस हमले ने परमाणु हथियारों की सुरक्षा और दक्षिण एशिया में परमाणु युद्ध के खतरों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।







