एक राजा था। वह बड़ा पुरुषार्थी था। अपने पुरुषार्थ से उसने राज्य को दूर-दूर तक फैला दिया। राज्ये में उसकी प्रजा बड़ी सुखी थी। धीरे-धीरे राजा पर बुढ़ापा छाने लगा, उसे चिंता होने लगे कि उसके राज्य को चलाने के लिए योग्य उत्तराधिकारी न हुआ तो उसके किए कराए पर पानी फिर जाएगा!
उसके एक लड़का था। उसी को गद्दी पर बैठना था लेकिन वह बड़ा आलसी था हाथ पैर हिलाना, उसे पसंद ना था। बहुत सोच- विचार के बाद राजा उसे लेकर एक साधु के पास गया और उसे सारी बात बता कर लड़के को आश्रम में छोड़ दिया।
साधु बड़े तेजस्वी थे, उन्होंने राजकुमार से कहा यहां चार कोस दूर एक जंगल है तुम सवेरे सवेरे ही वहां जाओ और फूलों के पौधे लाकर आश्रम के अहाते में लगाओ।
यह सुनकर राजकुमार को बड़ा बुरा लगा। अरे यह काम तो नौकरों के करने का है उसका नहीं वह तो यहां राज व्यवस्था के बारे में शिक्षा लेने आया है लेकिन उसके पिता कह गए थे कि साधु जो कहे वह करना मना मत करना।
अगले दिन से वह उस काम में लग गया। उसने जंगल से लाकर पौधे लगाएं। साधु के आदेश पर उन्हें सींचा और जानवरों से बचाने के लिए उनकी रात दिन रखवाली की।
फिर क्या था कुछ ही दिनों में सारा आश्रम तरह-तरह के रंग- बिरंगे फूलों से लहलहा उठा। राजकुमार की खुशी का ठिकाना ना रहा। साधु ने उसे शाबाशी दी और कहा लाखों की एक बात हमेशा याद रखना, जो सोता है उसका भाग्य सोता है जो बैठता है उसका भाग्य बैठता है और जो चलता है, उसका भाग्य चलता है। इसलिए हमारे धर्म ग्रंथों ने कहा है कि चलते रहो- चलते रहो।
उन्होंने कहा कि देखो तुम्हारी सक्रियता से आश्रम का रुप ही बदल गया। इस प्रकार राजकुमार को शासन की ही नहीं जीवन की कुंजी मिल गई थी।







