मुद्दा : मुझे इंसाफ चाहिए
चार साल पहले कानपुर देहात के विकास भवन में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के कार्यक्रम में गौरव त्रिपाठी ने 500 लंच पैकेट सप्लाई किए। राशि मात्र ₹52,900 थी। अफसरों ने लंच, डिनर, ब्रेकफास्ट सब कुछ खा लिया, लेकिन भुगतान आज तक नहीं हुआ। थक-हारकर जब गौरव विकास भवन पहुंचा, पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह करने को तैयार हो गया, तब जाकर पूरे जिले में हड़कंप मचा। पुलिस पहुंची, समझाया-बुझाया गया और श्रम आयुक्त कार्यालय ने दो सप्ताह में भुगतान का आश्वासन दिया। वीडियो में गौरव फफक-फफक कर रो रहा है। बात सिर्फ पैसे की नहीं, अपमान और व्यवस्था की उदासीनता की है।
यह घटना किसी एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है। यह उस अफसरशाही की मानसिकता का जीता-जागता प्रमाण है जो छोटे ठेकेदारों, ढाबा संचालकों और आम नागरिकों को वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर कटवाती है, फाइलें दबाए रखती है और जवाबदेही से बचती रहती है। गौरव त्रिपाठी भाजपा सरकार के मातृ संगठन RSS के कार्यकर्ता भी हैं, फिर भी उन्हें इंसाफ के लिए यह कदम उठाना पड़ा। इससे साफ है कि समस्या किसी एक पार्टी या सरकार तक सीमित नहीं – यह पूरे सिस्टम की बीमारी है।

पुलिस का बयान आ गया: “तत्काल मौके पर पहुंचकर समझाया गया, दो सप्ताह में भुगतान का आश्वासन।” शांति है, कानून-व्यवस्था सामान्य है। लेकिन क्या वाकई भुगतान होगा? या फिर यह एक और आश्वासन होगा जो समय के साथ भुला दिया जाएगा? गौरव ने बताया कि उन्होंने चक्कर लगाते हुए पेट्रोल पर ही एक लाख रुपये खर्च कर दिए। परिवार का ताना, समाज का उपहास और आर्थिक तंगी -ये सब एक छोटे व्यवसायी को आत्महत्या के रास्ते पर धकेल देते हैं।
देश में पहले राजतंत्र था, फिर गणतंत्र आया। अब “अफसरतंत्र” हावी है, जैसा एक यूजर ने सही लिखा। अफसरों को फ्री में VIP ट्रीटमेंट मिलता है, लेकिन जब भुगतान का सवाल आता है तो “प्रक्रिया” का बहाना। छोटे सप्लायर्स की मजबूरी का फायदा उठाया जाता है क्योंकि उनके पास राजनीतिक पहुंच या वकील नहीं होते। बड़े ठेकेदार पैसे वसूल लेते हैं, छोटे रोते रह जाते हैं।
समाधान क्या है?
- सरकारी विभागों में बकाया भुगतान के लिए सख्त समय-सीमा हो – 30-45 दिन से अधिक नहीं।
- देरी पर ब्याज के साथ पेनाल्टी लगे और जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हो।
- डिजिटल पोर्टल पर हर बिल की ट्रैकिंग सार्वजनिक हो।
- छोटे ठेकेदारों के लिए फास्ट-ट्रैक शिकायत निवारण तंत्र बने।
बता दें कि गौरव त्रिपाठी की पीड़ा पूरे उत्तर प्रदेश और देश के लाखों छोटे उद्यमियों की आवाज है। अगर इस मामले में तत्काल भुगतान नहीं होता और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होती, तो यह सिर्फ एक और वायरल वीडियो बनकर रह जाएगा।
वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – https://x.com/i/status/2061042367483040159
https://x.com/i/status/2061042367483040159
व्यवस्था को बदलना होगा। अफसरों को याद रखना चाहिए -वे जनता के सेवक हैं, मालिक नहीं। “हराम की खाने की लत” अगर जारी रही तो गौरव जैसे और लोग आत्मदाह की राह चुनेंगे। समय आ गया है कि गणतंत्र वाकई “जनता का” बने, न कि “अफसरों का”।
भुगतान हो, और दोषियों पर कार्रवाई भी हो- ये न्यूनतम अपेक्षा है।






