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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    क्या अब अरावली सुरक्षित है?

    ShagunBy ShagunDecember 27, 2025 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    Revoke the Bill. Don’t Gaslight Us. Save the Aravalli.
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    प्राचीन पहाड़ों की सुरक्षा: संदेह से स्पष्टता तक का सफर

    अरावली पर्वतमाला , भारत की सबसे प्राचीन भूगर्भीय विरासत, जो दिल्ली से गुजरात तक फैली है न केवल एक प्राकृतिक दीवार है, बल्कि थार मरुस्थल के पूर्व की ओर बढ़ते रेगिस्तान को रोकने वाली ढाल, भूजल का प्रमुख स्रोत और जैव-विविधता का खजाना भी है।

    इन पहाड़ों का संरक्षण हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। इसलिए जब नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली की एक समान परिभाषा को मंजूरी दी, जिसमें आसपास की जमीन से 100 मीटर या अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को ही अरावली पहाड़ी माना गया – तो पर्यावरण प्रेमियों में हड़कंप मच गया।

    यहाँ अरावली की हरी-भरी सुंदरता देखिए, जो NCR और आसपास के क्षेत्रों के लिए जीवनरेखा है:

    Save the Aravallis: A symbol of unity and a call for environmental protection.
    अरावली बचाओ: एकता की मिसाल और पर्यावरण की पुकार

    विवाद का केंद्र: 100 मीटर का मानदंड पर्यावरणविदों का तर्क था कि यह नियम कई छोटी पहाड़ियों और झाड़ी-ढकी ढलानों को संरक्षण से बाहर कर सकता है, जिससे खनन और निर्माण की राह खुल जाएगी। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आंकड़ों के अनुसार, 12,000 से अधिक पहाड़ियों में से केवल 8-9% ही 100 मीटर की ऊंचाई तक पहुँचती हैं – यानी 90% से अधिक क्षेत्र संरक्षण से बाहर होने का खतरा।
    प्रदर्शन हुए, सोशल मीडिया पर #SaveAravalli ट्रेंड किया, और सवाल उठे: क्या यह परिभाषा खनन को बढ़ावा देने के लिए लाई गई है?

    Revoke the Bill. Don’t Gaslight Us. Save the Aravalli.
    बिल रद्द करो। हमें गुमराह मत करो। अरावली को बचाओ।

    सरकार और न्यायालय की स्पष्टता

    लेकिन सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया कि नई परिभाषा से 90% से अधिक क्षेत्र संरक्षित रहता है।
    सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल नई खनन पट्टों पर पूर्ण रोक लगा दी (जब तक सतत खनन प्रबंधन योजना तैयार नहीं हो जाती), बल्कि अतिरिक्त संरक्षित जोन की पहचान का निर्देश भी दिया। मौजूदा खदानों पर कड़े नियम, निगरानी और पर्यावरणीय अनुपालन अनिवार्य कर दिया गया।यहाँ खनन से क्षतिग्रस्त अरावली के दृश्य देखिए, जो बताते हैं कि अवैध गतिविधियों ने कितना नुकसान पहुँचाया है:

    आगे क्या है विकल्प : संतुलन और सतर्कता

    सरकार का दावा है कि यह कदम वैज्ञानिक और पारदर्शी है , राजस्थान में 2006 से यही मानदंड लागू था। साथ ही अरावली ग्रीन वॉल जैसी परियोजनाएँ चल रही हैं, जो हरे क्षेत्र को बढ़ा रही हैं।
    फिर भी, पर्यावरणविदों की चिंता जायज है: छोटी पहाड़ियाँ भी पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं। भूजल, वायु प्रदूषण रोकथाम और जैव-विविधता पर असर पड़ सकता है।

    वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें – https://x.com/i/status/2002754906822959168

    अरावली की रक्षा के लिए जरूरी है:

    • पारदर्शी मैपिंग और निगरानी
    • अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई
    • सभी पक्षों का संवाद

    अंततः, अरावली सुरक्षित तभी रहेगी जब संरक्षण को राजनीति से ऊपर रखा जाए। यह प्राचीन पहाड़ हमें याद दिलाते हैं – प्रकृति की रक्षा हमारी अपनी रक्षा है।
    क्या हम इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचा पाएँगे? समय और कार्रवाई ही जवाब देगी।

    Shagun

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