इतिहास के आईने से
18वीं सदी के आखिरी दशक में मैसूर के सिंहासन पर बैठे टीपू सुल्तान ने खुद को ‘शेर-ए-मैसूर’ कहा—बाघ उनका प्रतीक था। उनके महलों, हथियारों, सैनिकों की वर्दी और यहां तक कि मुद्रा पर भी बाघ की आकृति छाई रहती थी। लेकिन उन्होंने एक ऐसा बाघ बनवाया जो महज़ प्रतीक नहीं, बल्कि जीवंत गुस्सा था टीपू का मैकेनिकल टाइगर।

लकड़ी से तराशा गया यह लगभग असली आकार का ऑटोमेटन एक यूरोपीय सैनिक को दबोचे हुए दिखता है। क्रैंक घुमाओ तो बाघ गुर्राता है, उसकी आंखें चमकती हैं, और बेचारा अंग्रेज दर्द से चीखता-कराहता है और उसका हाथ छटपटाता है। और सबसे हैरान करने वाली बात? बाघ के पेट में छिपा 18 नोटों वाला छोटा पाइप ऑर्गन! एक तरफ मौत का शोर, दूसरी तरफ शानदार संगीत जो यह टीपू के अंग्रेज-विरोधी जज्बे का जीता-जागता बयान था।
कहा जाता है कि यह विचार 1792 में एक ब्रिटिश अधिकारी ह्यू मुनरो की बाघ के हमले में मौत से प्रेरित हो सकता है, जिसके पिता ने टीपू के पिता हैदर अली को हराया था। यह सिर्फ खिलौना नहीं, बल्कि बदले और आजादी की पुकार था।
1799 में श्रीरंगपट्टनम की निर्णायक जंग में टीपू शहीद हो गए। अंग्रेजों ने उनके महल को लूटा और इस अनमोल कृति को लंदन ले गए। 1800 में ब्रिटेन पहुंचकर यह पहले ईस्ट इंडिया हाउस में प्रदर्शित हुआ, फिर 1880 में विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम का हिस्सा बना है जहां आज भी यह सबसे लोकप्रिय प्रदर्शनियों में शुमार है।
यह मैकेनिकल चमत्कार फ्रांसीसी मैकेनिक्स और भारतीय कारीगरों की मिली-जुली कला है जो जैकवुड की लकड़ी पर उकेरी गई बारीक नक्काशी, चटकीले रंग और अंदर की जटिल मशीनरी। आज भी जब पर्यटक इसे देखते हैं, तो सोचते हैं कि उस दौर में हिंदुस्तान के हुनरमंद कितने आगे थे!
टीपू का यह बाघ अब भी गुर्रा रहा है जो केवल लंदन की दीवारों में, लेकिन उसकी आवाज़ आजादी के संघर्ष की गूंज बनकर गूंजती रहती है।






