देशी पान… और गुस्ताख़ चूना

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जरूरी नहीं कि आप लखनऊ या बनारस में हों तभी पान खाएं। पान रायबरेली में भी खाया जा सकता है। पान कानपुर में भी खाया जा सकता है, रामपुर और मुरादाबाद में भी। गालिब की दिल्ली में तो पान की शान ही कुछ और है।

बड़ी-बड़ी दुकानों में पान खाना और गाँव-गंवई में देशी अंदाज में पान खाना, दोनों के अपने मजे हैं। हमने तो पान दोनों जगह खाए हैं। नवाबों के शहर लखनऊ के नक्खास, चौक और हजरतगंज में मीठे मसालेदार पान खाए हैं तो दिल्ली के चाँदनी चौक में ज़र्दा वाली गिलौरी का भी मजा लिया है।
बनारस में अस्सी घाट पर भीगी सुपारी व भीगी तंबाकू का पान खाकर मदहोश भी हुए हैं। इतने मदहोश कि दिमाग ही एकदम नाच गया था। संगी-साथियों के सहारे अपने लॉज तक आना पड़ा। वह तजुर्बा आज भी जब पाना खाता हूँ तो जेहन में ताजा हो उठता है।


खैर, अपने गाँव में जमीन पर लगी चौरसिया की दुकान का सादा पान बनारस, लखनऊ और दिल्ली के पान से कम दिलकश नहीं। पान खाकर बाजार में घूमते हुए, बिना कुछ खरीदे भी निकाल आइये तो कोई फर्क नहीं पड़ता। शान तो बन ही जाती है। दाम सिर्फ पाँच रुपैया। आप सिर्फ पाँच रुपए लेकर भी बाजार जा सकते हैं और चौरसिया का पान खाकर शान से घंटों टहल सकते हैं। बीच-बीच में किसी परिचित के मिलने पर मुंह उठाकर ‘राम जोहार’ करना भी चलता रहता है। पान खाने का एक कायदा यह भी है।

वैसे रायबरेली में पान काफी खाया जाता है। गाँव-गाँव, नगर-नगर यहाँ पान की दुकानें मिल जाएंगी। घरों में भी लोग पान का पूरा सामान रखते हैं। यहाँ पान खाने को लेकर कई कहावतें भी प्रचलित हैं। एक तो सबसे चर्चित है-

हाथ में सोटा बगल में थैली
तब जानो कि रायबरेली।

यह वही थैली है, जिसमें पान, सुपारी, कत्था, चूना, ज़र्दा वगैरह रखा जाता है।
बहरहाल, खाना खाने के बाद पान खाने का अपना ही मजा है। मीठा पान भोजन का लुत्फ और बढ़ा देता है। ज़र्दा वाला पान मुंह का माहौल बना देता है।

पान के भीगे पत्ते, कत्थे का चटख रंग, गुस्ताख़ चूना, इलायची की भीनी महक, केसर या जाफरान का जायका और गुलकंद की मिठास के साथ तैयार पान किसी को भी दीवाना बना दे। पान लखनऊवा हो तो कहने ही क्या? यहां का इंसान तो क्या पान भी तहजीब और नफासत में ढला है। एक बीड़ा मुंह में दबाकर हज़रतगंज से चलते हुए पैदल ही चारबाग तक आया जा सकता है।
यूं तो पान खाने की शुरुआत मुगलों के जमाने से मानी जाती है। उस वक्त सिर्फ चूने के पान खाए जाते थे। कहते हैं पान में कत्थे को नूरजहां ने शामिल किया। लखनऊ में पान के साथ मसाले भी जुड़ गए। पान के पत्ते पर बिझा हुआ चूना, कत्था, सुपारी के टुकड़े, सौंफ, जाफरान, खुशबू के लिए किमाम, ब्रास आदि व अन्य कुछ मसाले लगाये जाते हैं। खुशबूदार मसालों और चांदी के वर्क में पान लपेटने की कला लखनऊ की ही देन है।

लखनऊवा पान मुंह में डालते ही घुल जाता है और जरा भी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। देर तक मुंह में इसका स्वाद और महक बनी रहती है।

यहाँ पान खाने के साथ-साथ पान लगाने और खिलाने के अंदाज पर भी खास ध्यान दिया गया। नवाबी दौर में शाही महलों और बेगमों के यहां पानवालियां होती थीं जो खास तनख्वाह पर रखी जाती थीं। उनका काम पान लगाना और खिलाना होता था। उस जमाने में पान सजाने और पान खिलाने की रवायत पर भी जोर दिया गया। पान रखने के लिए खासदान होते थे, उसमें पान की गिलौरियां रखी जाती थीं। पान खाने वाला पास में पीकदान भी रखता था, जिसमें वह पीक थूकता जाता था। आज भी कहीं-कहीं मिट्टी के बर्तन में राख़ भरकर उसे पीकदान के रूप में प्रयोग किया जाता है।

अवध के नवाब वाजिद अली शाह पान खाने के बहुत शौकीन थे और खाना खाने के बाद वह पान खाते थे। कहा जाता है कि हकीमों ने उनको पान न खाने की सलाह दी थी, मगर जब नवाब साहब को पान की तलब लगती तो वह खुद को रोक नहीं पाते थे। नवाब होते ही ऐसे थे।
जहां लखनऊवा पान मुंह में डालते ही घुल जाता है वहीं बनारसी पान खाने के लिए थोड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। हालांकि बनारस के पान की शोहरत तो दुनिया भर में है। यहाँ खास तरह से पान का व्यवहार होता है। बनारसी पत्ता पहले पकाया जाता है और उसे पीला किया जाता है। यहाँ तंबाकू वाला पान ज्यादा पसंद किए जाते हैं जबकि लखनऊ में मीठे और सादे पान ज्यादा डिमांड में रहते हैं।

एक खास बात और, बनारसी पान में चूना अलग से दिया जाता है ताकि पान के साथ चूने को हल्के से चाटते रहें जबकि लखनवी तहजीब में चूने को पान में ही लगाना बेहतर समझा जाता है। अलग से चूना बहुत कम लोग ही खाना पसंद करते हैं। वैसे भी चूना बड़ी गुस्ताख़ चीज है। ज्यादा मुंह लगा लो तो काट देता है। कुछ लोग पान की पीक निगल जाते हैं और कुछ नामुराद जगह जगह पीक से चित्रकारी करते रहते हैं। दोनों ही रवायतें मशाअल्लाह हैं।

पान उत्तर भारत का शौक है और लोक संस्कृति का हिस्सा भी है। ये कई किस्म के होते हैं- देशी, कलकतिया, मगही। लोग शौकिया तौर पर इसे खाते हैं। पर इसमें इस्तेमाल होने वाले मटेरियल में कई तरह के औषधीय गुण भी हैं। पान के पत्तों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह, आयोडीन और पोटैशियम जैसे तत्व पाए जाते हैं। सर्दी खांसी और जुकाम होने पर सेंकी हुई हल्दी का टुकड़ा पान में डालकर खाने से आराम मिलता है। जिन्हें पायरिया है वे पान के एक पत्ते में छोटा कपूर का टुकड़ा डालकर चबाएं और पीक को थूकते जाएं। यह पाचन क्रिया को भी दुरुस्त बनाए रखता है।

यह एक माउथ फ्रेशनर तो है ही, शरीर के लिए बहुत उपयोगी है। हर उम्र के लोग इसका सेवन कर सकते हैं। यह एक बहुवर्षीय बेल है। हमारे देश में पूजा-पाठ में भी इसका इस्तेमाल होता है। इसके अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम हैं। संस्कृत में नागबल्ली, ताम्बूल हिन्दी में पान, मराठी में पान/नागुरबेली, गुजराती में पान/नागुरबेली, तमिल में बेट्टीलई, तेलगू में तमलपाकु, किल्ली, कन्नड़ में विलयादेली और मलयालम में बेटीलई नाम से पुकारा जाता है।

आखिर में अकबर इलाहाबादी के इस शेर के साथ पान की दास्तान खत्म करते हैं-
लगावट की अदा से उनका कहना पान हाजिर है, कयामत है, सितम है, दिल फिदा है, जान हाजिर है। -विनायक राजहंस

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