झांसी एनकाउंटर: चाचा-भतीजे की आपसी विवाद का नतीजा है राजनीतिकरण

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  • एक खास बिरादरी को जोड़ना चाहते हैं शिवपाल, अखिलेश को नहीं आ रहा रास
  • आदित्य पहुंचे पुष्पेन्द्र के घर तो अखिलेश ने भी बना दिया कार्यक्रम

उपेन्द्र नाथ राय

लखनऊ, 10 अक्टूबर 2019: एनकाउंटर में मारे गये झांसी के पुष्पेन्द्र यादव के मामले सियासी हलचल का आना कोई नई बात नहीं है। यह चाचा-भतीजा के घरेलू राजनीति का नतीजा है। इसका कारण है, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश किसी भी हालत में नहीं चाहते कि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी एक खास बिरादरी में कभी आगे निकल जायं और उसके नेता की भूमिका निभाने लगें, जबकि शिवपाल यादव का बार-बार यह प्रयास रहता है कि वे बिरादरी के नेता के रूप में अपनी पहचान बना लें। इसी का नतीजा रहा कि जब 08 अक्टूबर को शिवपाल यादव के लड़के आदित्य झांसी जाकर पुष्पेन्द्र के परिवार से मिला तो सपा को रास नहीं आया। उसके तुरंत बाद उसी रात को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी झांसी जाने का कार्यक्रम बना लिया।

यूपी में कई घटनाएं हुईं, कहीं नहीं पहुंचे अखिलेश:

सोनभद्र के उम्भा गांव में एक दर्जन से अधिक लोगों के आपसी रंजिश में मारे जाने के बावजूद अखिलेश यादव नहीं गये। वहां पार्टी का प्रतिनिधि मंडल भेजा गया। यही नहीं लोकसभा चुनाव के बाद कई ऐसी घटनाएं हुईं, जहां सपा के लोग खुद कहते हुए सुने गये कि वहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव को जाना चाहिए लेकिन वे कहीं नहीं गये। सपा भी बसपा की तर्ज पर अपना प्रतिनिधि मंडल और जांच कमेटी भेजने की औपचारिकता निभाती रही।

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कार्यकर्ताओं से अखिलेश की बढ़ती रही दूरी:

इसको लेकर राजनीति के गलियारे में यह भी चर्चा चलती रही कि सपा प्रमुख अब एसी वाली राजनीति करने लगे हैं। बसपा प्रमुख की तरह ही वह भी कहीं जाना नहीं चाहते। इससे कार्यकर्ताओं की भी दूरी बढ़ती गयी। मुलायम सिंह का जो कार्यकर्ताओं ने दिली लगाव रहा, वह अखिलेश यादव के जमाने में समाप्त होता रहा। अब कार्यकर्ता अपने नेता के लिए मरने-मारने वाले न के बराबर बचे।

शिवपाल के पुत्र की राजनीति से घबड़ाये अखिलेश:

झांसी के पुष्पेन्द्र यादव का एनकाउंटर में मारा जाना शिवपाल के लिए अपने लिए राजनीति चमकाने का मौका दिखा, लेकिन उनसे पहले ही भाजपा के खिलाफ अखिलेश यादव का बयान आ गया। अब शिवपाल ने उनसे आगे बढ़ने की होड़ में अपने बेटे आदित्य को अगले दिन ही पुष्पेन्द्र यादव के परिजनों से मिलने के लिए भेज दिया। इससे घबड़ाये अखिलेश ने भी अपना कार्यक्रम तय कर वहां पहुंचे।

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सपा में दबंग नेताओं का रहा बोलबाला:

दरअसल, सपा की राजनीति पर नजर दौड़ाएं तो इसमें दबंग नेताओं का बोलबाला ज्यादा रहा है। सबको याद होगा कि जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे तो उनके कार्यकर्ताओं ने एक प्रमुख दैनिक अखबार पर हल्ला बोल दिया था और कानपुर, बनारस आदि में उसके आफिसों में जमकर तोड़ फोड़ की थी। मुलायम सिंह यादव एक-एक कार्यकर्ता को हमेशा तवज्जो देते रहे और वह कुछ भी करके आये तो राजनीतिक संरक्षण भी मिलता रहा लेकिन अखिलेश के कार्यकाल में वह तवज्जो मिलना बंद हो गया।

सपाई चाहते हैं, सिर्फ सांस लेती रहे पार्टी:

अचानक किसी दल द्वारा विचारधारा बदलना कठिन कार्य है। उसमें उसको काफी हानि भी उठानी पड़ जाती है। यही हुआ सपा के साथ। जो उसके साथ थे, वे दूरी बना लिए, इस गर्दिश में कोई नया उससे जुड़ने को तैयार नहीं है। ऐसे में सपा सिर्फ एक खास बिरादरी को जोड़े रखना चाहती है, जिससे उसकी राजनीतिक मौत न हो और धीरे-धीरे सांस लेती रहे। इससे भविष्य में समय देखकर फिर पार्टी को मजबूत किया जा सकेगा। इसी का नतीजा है, पुष्पेन्द्र यादव के एनकाउंटर को फर्जी बताकर राजनीतिक हो-हल्ला मचाना।

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