दफन हो गया वो रिपोर्टर 

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नवेद शिकोह
उसके हिस्से में कम से कम आधा पन्ना आता था। सत्ता के खिलाफ आवाज को अल्फाज देने वाले इस पन्ने पर अब सरकारों की सच्ची-झूठी उपलब्धियों वाले डिस्प्ले विज्ञापनों ने कब्जा कर लिया है।
धरना-प्रदर्शन, क्रमिक-अनशन बीट वाला रिपोर्टर जाने कहाँ चला गया। इसकी सीट पर विज्ञापन के लाइजनर को रिपोर्टर का मुखौटा लगाकर बैठा दिया जाता हैं। इसके पेज पर अब खूब जारी होने वाले सरकारी विज्ञापन छपते हैं और इन विज्ञापनों के इर्द-गिर्द सरकार की मनमाफिक यानी चाटुकारिता वाली खबरें नजर आती हैं।  विज्ञापन कम मिलते हैं तो चाटुकारिता ब्लैकमेलिंग का रूप भी इख्तियार कर लेती है।
     मुझे याद है 22-23 बरस पुराना वो दौर जब अखबार कार्पोरेट या हुकुमतों की गुलामी में पूरी तरह से नहीं आये थे। विज्ञापन प्रतिनिधि और पत्रकार का सौत जैसा रिश्ता होता था।
  पन्ने कम होते थे और खबरें ज्यादा।  जरुरी खबरों को जगह देना जरूरी समझकर विज्ञापन लौटा दिये जाते थे।कम ही ऐसा होता था जब ज्यादा विज्ञापन की वजह से कोई खबर कट जाती थी ओर रिपोर्टर विज्ञापन डिपार्टमेंट और विज्ञापन प्रतिनिधि पर अपनी खीज निकालता था।
  हर अखबार में धरना-प्रदर्शन, क्रमिक-अनशन की महत्वपूर्ण बीट होती थी। इस बीट का एक लिखाड़(खूब लिखने वाला) रिपोर्टर होता था। इस रिपोर्टर के विकल्प के तौर पर भी एक रिपोर्टर होता था। 1996 में मैने भी कुछ वक्त “धरना-प्रदर्शन” बीट देखी। मुझे याद है उस दौर और उससे पहले के दौर में  नवजीवन, अमृत प्रभात, नव भारत टाइम और उसके ” सांध्य समाचार सेवा, दैनिक जागरण,  आज, स्वतंत्र भारत और राष्टीय सहारा  इत्यादि में धरना-प्रदर्शन का लगभग आधा पन्ना फिक्स रहता था। हर रोज धरने-प्रदर्शन की खबरें प्रमुखता से छापी जाती थीं। इनकी तस्वीरें का असाइनमेंट फोटोग्राफर सुबह की मीटिंग के बाद सबसे पहले करता था।
 सरकार के विरोध में 10-20 लोग भी बैठते थे तो इसकी खबर बनती थी, फोटो लगता था। यहां तक की कोशिश ये भी की जाती थी कि हर आम प्रदर्शनकारी के नाम को भी खबर में जगह दे दी जाये।
अब अखबारों में न फरियादियों की खबरों का स्थान रहा न प्रदर्शनकारियों का। न अब पहले जैसी धरने की बीट रही, न धरना-प्रदर्शन की बीट का रिपोर्टर रहा और न विधानसभा के सामने वाला एतिहासिक धरना स्थल रहा।
धरना स्थल का वो एतिहासिक स्थान जहां प्रदेश के फरियादी राजा और उसकी सल्तनत की खामियों का बखान करते थे।  अपनी मांगों की आवाज बुलंद करते थे अपने हक की लड़ाई लड़ते थे, आज पुराने धरना स्थल की खाक जदा जमीन पर संगमरमर का दरबार बन गया है। लोकभवन में वजीरे आला की कुर्सी के नीचे शायद लोकतंत्र में आवाज उठाने की जुबान भी दब गयी है। हक मांगने के लिये हकदार का तना सीना भी हुकूमत की  कुर्सी के पाँव के नीचे दबा गया है। कोप भवन(धरना स्थल) की खाक पर बसे अरबों के शाही लोकभवन को लोक चिंताओं से दूर रखने के लिये ऊंचाई दी गयी है। ऊंचाई देने के लिए हुकूमत की कुर्सी के नीचे चौथे खंभे का उपयोग हुआ होगा। इस खंभे के नीचे ही शायद धरना-प्रदर्शन का रिपोर्टर दफन है। अखबार की खबरों में तो अब वो नहीं दिखता।

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