व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
मुझे चुनौती मिली है। किसी और से नहीं। खुद की बीवी से। चुनौती में कहा गया है- ‘एक दिन लेखन छोड़ मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े होकर पकौड़े बेचकर दिखा दो। तुम्हें मान जाऊंगी।’
बात लेखन से चलकर पकौड़े बेचने तक न आती अगर मैंने उसे बजट की मोटी-मोटी बातें बता दी होतीं। किंतु, मेरी समस्या यह है कि बजट मुझे बचपन से ही कभी समझ न आया। क्या सस्ता हुआ। क्या महंगा। ये तो चलो अखबार में पढ़कर जान लेता लूं। पर टैक्स आदि से जुड़ी बड़ी-बड़ी बातें मैं नहीं समझ पाता।
अच्छा, बीवी का सारा जोर टैक्स पर रहता है। वो मुझसे पूछती है, ‘वित्तमंत्री जी ने किस पर कितना और क्यों टैक्स लगाया? आय में छूट की सीमा कितनी रही? खेती-किसानों को क्या दिया? क्या छीना? ईएमई का क्या रहा?’ और भी ऐसी जटिलतम बातें।
हर दफा बीवी को मैं यही बोलता हूं- ‘प्रिये, मैं सिर्फ लेखक हूं। अर्थशास्त्री नहीं। बजट को समझ पाने में मेरा दिमाग कतई ‘जीरो’ है।’
बीवी इतने पर ही मुझ पर भड़कती हुई कहती है- ‘तुम्हें समझ है किस बात की? अभी पिछले दिनों तुमसे जीएसटी के बारे में पूछा था तो तुमने साफ मना कर दिया, मैं इस बारे कुछ नहीं जानता। राशन और दूध वाले का बिल जोड़ने को दिया तो तुम जोड़ न पाए। पता नहीं, लेखक कैसे बन बैठे?’
‘देखो प्रिये, लेखक बनना और बजट को समझकर समझाने में बहुत फर्क है। लेखक बनना इतना आसान न होता जितना तुम समझती हो। बजट तो फिर भी अखबारों में पढ़कर या किसी अर्थशास्त्री को पकड़कर समझा जा सकता है लेकिन लेखक तो खुद की वैचारिकता के दम पर ही बनता है।’ मैंने समझाने की हल्की-सी कोशिश की।
‘लेखक कैसे बनते हैं यह भाषण मुझे न दो। मुझे भीतर की सारी हकीकत मालूम है। लेखक बनकर तुम खुद को इतना ही महान मानते हो तो- बजट को छोड़ो- जरा नुक्कड़ पर पकौड़े बेचकर ही दिखा दो तो मान जाऊंगी तुम्हें।’ बीवी का पलटवार।
अब बस यही सुनना बाकी रह गया था। लेखक बनकर नुक्कड़ पर पकौड़े बेचने से तो बेहतर यही रहेगा कि मैं लिखना ही क्यों न छोड़ दूँ। न रहेगा सांप। न टूटेगी लाठी।







