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    महाराष्ट्र सरकार का श्रम कानूनों में संशोधन: प्राइवेट सेक्टर में काम के घंटे 9 से बढ़ाकर 10 करने का फैसला

    ShagunBy ShagunSeptember 4, 2025 अलर्ट No Comments5 Mins Read
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    तकनीक के युग में 'लंबे कार्य घंटे' क्यों हैं पुरातन और हानिकारक
    सांकेतिक फोटो
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    मुंबई : महाराष्ट्र सरकार ने 3 सितंबर 2025 को कैबिनेट बैठक में महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जिसमें प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए दैनिक काम की अधिकतम अवधि को 9 घंटे से बढ़ाकर 10 घंटे करने का प्रावधान किया गया है। यह बदलाव फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 और महाराष्ट्र शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट्स (रेगुलेशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट, 2017 में संशोधन के माध्यम से लागू होगा। सरकार का कहना है कि यह कदम निवेश आकर्षित करने, रोजगार सृजन करने और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    यह फैसला केंद्रीय टास्क फोर्स की सिफारिशों पर आधारित है और कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश तथा त्रिपुरा जैसे राज्यों के समान है, जहां पहले ही ऐसे सुधार लागू हो चुके हैं।प्रमुख बदलाव क्या हैं?दैनिक काम के घंटे: प्राइवेट सेक्टर (दुकानें, होटल, मनोरंजन स्थल आदि) में अब अधिकतम 10 घंटे काम की अनुमति। फैक्ट्रीज में यह सीमा 9 से बढ़ाकर 12 घंटे हो गई है।

    1. विश्रांति ब्रेक: 5 घंटे के बाद ब्रेक की जगह अब 6 घंटे के बाद अनुमति, जिसमें 30 मिनट का ब्रेक शामिल होगा।
    2. ओवरटाइम सीमा: तिमाही में ओवरटाइम की अधिकतम सीमा 125 घंटे से बढ़ाकर 144 घंटे। इमरजेंसी में ड्यूटी 12 घंटे तक बढ़ाई जा सकती है।
    3. कवरेज का विस्तार: 20 या अधिक कर्मचारियों वाली स्थापनाओं पर लागू। 20 से कम वाले व्यवसायों को रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं, लेकिन सूचना देनी होगी।
    4. महिलाओं के लिए प्रावधान: नए श्रम कोड लागू होने पर महिलाओं को देर रात शिफ्ट करने की अनुमति, जो रोजगार के अवसर बढ़ाएगा।

    ये बदलाव तत्काल प्रभावी नहीं होंगे :

    सरकार जल्द ही अध्यादेश जारी करेगी, जिसके बाद विधानसभा में पेश किया जाएगा।श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे हो रही है? (सरकारी नजरिया)सरकार के अनुसार, यह सुधार श्रमिकों के हितों की पूरी तरह रक्षा करते हुए व्यवसायों को लचीलापन प्रदान करते हैं।

    श्रम मंत्री आकाश फुंडकर ने स्पष्ट किया है कि कई प्राइवेट कंपनियों में पहले से ही कर्मचारी निर्धारित घंटों से अधिक काम करते हैं, लेकिन उचित मुआवजा नहीं मिलता। अब कानूनी रूप से 10 घंटे की सीमा तय करने से अवैध ओवरटाइम रुकेगा और श्रमिकों को निम्नलिखित लाभ मिलेंगे: –

    1. ओवरटाइम के लिए डबल वेतन: 9वें घंटे के बाद का हर अतिरिक्त घंटा ओवरटाइम माना जाएगा, जिसके लिए बेसिक वेतन और भत्तों का दोगुना भुगतान अनिवार्य होगा। इससे श्रमिकों की आय बढ़ेगी, खासकर उन लोगों के लिए जो अतिरिक्त कमाई चाहते हैं।
    2. लिखित सहमति अनिवार्य: ओवरटाइम के लिए कर्मचारी की लिखित अनुमति जरूरी है। कोई जबरदस्ती नहीं; असहमति पर कोई दंड नहीं। यदि साप्ताहिक 48 घंटे की सीमा पार हो जाती है, तो कर्मचारी को 2 दिन की पेड लीव मिलेगी।
    3. बेहतर कार्य वातावरण: ब्रेक और विश्रांति के नए नियम थकान कम करेंगे। महिलाओं के लिए सुरक्षित रात्री शिफ्ट्स से रोजगार के नए अवसर खुलेंगे, जो समावेशी विकास को बढ़ावा देगा।
    4. निवेश और रोजगार सृजन: व्यवसायों को लचीलापन मिलने से पीक डिमांड या श्रमिक कमी के दौरान संचालन सुगम होगा, जिससे नए निवेश आएंगे और नौकरियां बढ़ेंगी। इससे श्रमिकों को स्थिर आय और बेहतर सुविधाएं मिलेंगी।
    5. पारदर्शिता और निगरानी: सरकार बिना अनुमति के बदलाव पर सख्ती करेगी। छोटे व्यवसायों के लिए सरलीकृत प्रक्रिया से अधिक श्रमिक कानूनी सुरक्षा के दायरे में आएंगे।

    फुंडकर ने कहा, –

    “यह बदलाव श्रमिकों और उद्योग दोनों के लिए संतुलित हैं। अवैध काम को वैध बनाकर हम श्रमिकों को उचित मुआवजा सुनिश्चित कर रहे हैं, जो पहले नहीं मिलता था।” सरकार का दावा है कि इससे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ बढ़ेगा, लेकिन श्रमिक हित प्राथमिकता रहेगी।क्या सैलरी बढ़ाने का अनुपात भी निर्धारित है?नहीं, बेसिक सैलरी बढ़ाने का कोई सीधा आदेश या अनुपात नहीं है। लेकिन ओवरटाइम के लिए डबल पे अनिवार्य है, जो अतिरिक्त घंटों के लिए आय बढ़ाएगा। यदि कोई कर्मचारी रोज 1 घंटा ओवरटाइम करता है, तो उसकी मासिक आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। हालांकि, यह वैकल्पिक है और सहमति पर निर्भर। सरकार का कहना है कि बढ़ी आय से श्रमिकों का आर्थिक सशक्तिकरण होगा, लेकिन बेसिक वेतन न्यूनतम मजदूरी नियमों के अनुसार ही रहेगा।

    सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं और विवाद

    यह फैसला सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गया है। कई यूजर्स ने इसे श्रमिक शोषण बताया है, जबकि कुछ ने सरकारी दावों का समर्थन किया। यहां कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं हैं:आशीष रंजन का सवाल: “इसमें श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे हो रही है? क्या इसी अनुपात में सैलरी बढ़ाने का भी आदेश है?” (यह सवाल वैध है, लेकिन जैसा ऊपर बताया, ओवरटाइम से आय बढ़ेगी, बेसिक सैलरी नहीं।)
    अशोक सहरावत की टिप्पणी: “सरकारी कार्यालयों में काम कर रहे कर्मचारियों पर यह श्रम कानून लागू क्यों नहीं किया गया? श्रम कानूनों में भेदभाव क्यों हो रहा है? यह कानून प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे कर्मचारियों की अनुमति से लागू नहीं किया गया है। यह कर्मचारियों के साथ अन्याय है।” (सरकार ने स्पष्ट किया कि यह केवल प्राइवेट सेक्टर के लिए है, सरकारी कर्मचारियों पर केंद्रीय नियम लागू हैं। सहमति अनिवार्य है, लेकिन असमान शक्ति संतुलन पर सवाल बने रहेंगे।)

    त्यागी जी का विचार: “इंसान को कभी गुलाम बनाना हो तो उसे कभी आनंदित मत होने देना क्योंकि एक दुखी इंसान ही गुलामी कर सकता है इसलिए जितना भी हो सके इंसान को दुखी रखो ताकि वह आपकी गुलामी करता रहे सब आयोजन करो आदमी को दुखी परेशान रखने के लिए प्रताड़ित करते रहो दुखी रहेगी तो आपकी गुलामी करता रहेगा।” (यह दार्शनिक टिप्पणी शोषण की आशंका जताती है, लेकिन सरकार इसे आर्थिक अवसर के रूप में देख रही है।)

    X (पूर्व ट्विटर) पर अन्य पोस्ट्स से: एक यूजर ने लिखा: “अब इंसान को मशीन बनाने की कोशिश है।”
    सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुम्भार ने कहा: “गुंतवणूक आकर्षित करण्याच्या नावाखाली कामगारांना यंत्रासारखे पिळून काढण्याचा निर्णय।”
    विपक्षी आवाज: कई यूजर्स ने वर्क-लाइफ बैलेंस पर सवाल उठाए, जैसे “Who is behind this stupid idea???”

    Shagun

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