नेतन्याहू की क्रूर नीतियों ने बिखेरी तबाही, क्या वैश्विक समुदाय मूकदर्शक बनकर रहेगा?
गाजा में इंसानियत कराह रही है। हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर इजरायली सेना (आईडीएफ) की बमबारी ने लाखों फिलिस्तीनियों की जिंदगी को नर्क बना दिया है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की नीतियों ने गाजा को तबाही के कगार पर ला खड़ा किया है, जहां अस्पताल, शरणार्थी शिविर, और रिहायशी इलाके बमों की चपेट में हैं। इन हमलों ने न सिर्फ बुनियादी ढांचे को नेस्तनाबूद किया, बल्कि खाने, पानी, दवाओं और ईंधन की आपूर्ति को भी पूरी तरह ठप कर दिया।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पौने दो साल से चल रहे इस युद्ध में लगभग 62,000 से अधिक लोग अपनी जान गवां चुके हैं, और यह मृत्यु का आंकड़ा हर रोज बढ़ रहा है। इजरायल ने गाजा में बिजली, पानी, ईंधन और खाद्य आपूर्ति को पूरी तरह रोक दिया है। दवाओं की कमी और बुनियादी ढांचे का विनाश लाखों लोगों को भुखमरी और बीमारियों के मुहाने पर ले आया है। पत्रकार, जो इन अत्याचारों की सच्चाई उजागर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें भी निशाना बनाया जा रहा है। युद्ध के अंतरराष्ट्रीय कानून, जो नागरिकों, अस्पतालों और रिहायशी इलाकों पर हमलों को युद्ध अपराध करार देते हैं, नेतन्याहू की नीतियों के सामने बौने साबित हो रहे हैं।

नेतन्याहू का दावा है कि यह अभियान हमास को खत्म करने और बंधकों को छुड़ाने के लिए है। लेकिन उनके हालिया बयानों से साफ है कि उनका मकसद गाजा को तबाह करना है। यह रणनीति न केवल फिलिस्तीनियों के लिए, बल्कि इजरायल के भविष्य के लिए भी घातक है। इजरायल में ही कई नागरिक, पूर्व मंत्री और रक्षा अधिकारी इस नीति का विरोध कर रहे हैं। वे चेतावनी दे रहे हैं कि यह हिंसा इजरायल को वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर देगी और दीर्घकालिक शांति की संभावनाओं को चोट पहुंचाएगी।
इस त्रासदी की सबसे बड़ी विडंबना है वैश्विक समुदाय की खामोशी। संयुक्त राष्ट्र और तमाम शक्तिशाली देश इस नरसंहार को रोकने में नाकाम रहे हैं। मानवता के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली दुनिया गाजा के मासूमों की चीखों के सामने बेबस क्यों है? यह चुप्पी न केवल नैतिक पतन का प्रतीक है, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि क्या हम वाकई एक सभ्य और शांतिप्रिय विश्व में जी रहे हैं?
बता दें कि गाजा का संकट सिर्फ एक क्षेत्रीय मसला नहीं, बल्कि पूरी मानवता की अग्नि परीक्षा है। अगर आज इस खोनी संघर्ष को रोका नहीं गया, तो यह न केवल फिलिस्तीन ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक खतरा बन जायेगा। समय आ गया है कि वैश्विक समुदाय अपनी जिम्मेदारी निभाए, नेतन्याहू की नीतियों पर लगाम लगाए और गाजा में शांति व इंसानियत की बहाली के लिए ठोस कदम उठाए। क्या हम इस चुनौती को स्वीकार करेंगे, या इतिहास हमें मूकदर्शक के रूप में दर्ज करेगा?







