राजभाषा पत्रिकाओं के महत्त्व एवं प्रासंगिकता पर हुयी चर्चा
नई दिल्ली, 21 मई 2025: साहित्य अकादमी ने आज राजभाषा मंच के तत्वावधान में ‘राजभाषा पत्रिकाओं के महत्त्व और प्रासंगिकता’ विषय पर एक प्रेरक परिचर्चा का आयोजन किया। इस अवसर पर साहित्य अकादमी की राजभाषा पत्रिका ‘आलोक’ के नवीन अंक का लोकार्पण भी किया गया, जिसने उपस्थित साहित्य प्रेमियों और हिंदी अधिकारियों में उत्साह का संचार किया।
परिचर्चा में मुख्य वक्ता जयप्रकाश कर्दम ने राजभाषा पत्रिकाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा, “ये पत्रिकाएँ राजभाषा के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम हैं। संपादकों का दायित्व है कि वे इन्हें प्रासंगिक और आकर्षक बनाएँ, विशेषकर हिंदीतर भाषी लेखकों की रचनाओं को प्रोत्साहित करके।” उन्होंने जोर दिया कि उपयोगी और रोचक सामग्री से ये पत्रिकाएँ अधिक लोगों को लेखन के लिए प्रेरित कर सकती हैं।
‘आलोक’ के प्रथम संपादक रणजीत साहा ने अपने विचार साझा करते हुए कहा, “भले ही इन पत्रिकाओं में सृजनात्मकता की कमी हो, लेकिन ये हिंदी के विकास के लिए व्यावहारिक और नवीन दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।” परिचर्चा में राजेश कुमार और वरुण कुमार ने भी राजभाषा पत्रिकाओं के उन्नयन पर अपने सुझाव रखे।
कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने अतिथियों का अंगवस्त्र से स्वागत किया। उन्होंने विभिन्न संस्थाओं से पधारे हिंदी अधिकारियों की उत्साहजनक उपस्थिति की सराहना करते हुए कहा, “ऐसी परिचर्चाएँ राजभाषा पत्रिकाओं के स्तर को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती हैं।”
कार्यक्रम में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, आकाशवाणी, दूरदर्शन, केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान, कृषि खाद एवं जलसंसाधन योजना, वास्तुकला विद्यालय, संसदीय कार्य मंत्रालय, राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, संगीत नाटक अकादमी, वैमानिक गुणवत्ता आश्वासन महानिदेशालय, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, शिक्षा विभाग, इफको आदि संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का कुशल संचालन और अंत में धन्यवाद ज्ञापन अकादेमी के उपसचिव देवेंद्र कुमार देवेश ने किया। यह आयोजन राजभाषा के प्रचार-प्रसार और पत्रिकाओं की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम साबित हुआ।







