पत्रकार बेचेंगे पकौड़े, प्रकाशक दूसरा बड़ा व्यापार कर लेगा!
नवेद शिकोह
लखनऊ, 11 मार्च। न्यूज प्रिंट पर GST लागू होने के साथ ही अखबारों की बंदी और पत्रकारों की बेरोजगारी तय हो गयी थी। उम्मीद के वेंटिलेटर पर लेटे प्रकाशक और पत्रकारों की निगाहें आज GST कौंसिल की मीटिंग पर थी। संभावना जताई जा रही थी कि सीमित संसाधनों और कम प्रसार वाले लघु समाचार पत्रों के लिए न्यूज प्रिंट पर से GST हटा लिया जायेये। या फिर हर वर्ग के (लघु, मध्यम और बड़े) समाचार पत्रों के न्यूज प्रिंट और छपाई के खर्च पर 5% GST घटाकर डेढ़ दो प्रतिशत कर दिया जायेगा। इस आखिरी उम्मीद पर निगाहें लगाये अखबार कर्मी/ पत्रकार और प्रकाशक GST मीटिंग के फैसले का बेसब्री से इंतजार करते रहे। लेकिन उम्मीदों पर पानी फिर गया। वित्त मंत्री अरूण जेटली की अध्यक्षता में जीएसटी कौंसिल की विशेष बैठक में अखबारों को राहत मिलने की उम्मीद निराशा में तब्दील हो गयी।
ज्ञातव्य हो कि उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक अखबार हैं। जिनके बंद होने से यहां सबसे अधिक यानी हजारों पत्रकार/अखबार कर्मी बेरोजगार हो सकते हैं।
लोकसभा चुनाव का चुनावी वर्ष शुरु होने जा रहा है। इसके अतिरिक्त अरुण जेटली उत्तर प्रदेश से राज्य सभा भेजे जा रहे हैं। इन राजनीति कारणों से भी अखबारों को जीएसटी से मुक्ति मिलने की संभावना जताई जा रही थी।
उम्मीद की शमा बुझ गयी। आने वाले कुछ ही महीनों में देश के 80% अखबार इतिहास बन जायेंगे और हजारों अखबार कर्मी/पत्रकार बेरोजगारी का शिकार होकर पकौड़े बेचने जैसा कोई धंधा तलाशेंगे।
छोटे से लेकर बड़े अखबार के प्रकाशक प्रसार की झूठी संख्या बताकर भी झूठे नहीं हैं। क्योकि वो झूठ नहीं बोलना चाहते लेकिन डीएवीपी की गलत नीतियां इन्हें झूठा प्रसार बताने के लिए मजबूर करती हैं। जो ब्रांड अखबार अपने 15-20 संस्करणों का प्रसार 20-30 लाख बताते हैं वो वो दो-तीन लाख ही प्रतियां छापते हैं। जो छोटे अखबार 20-25 हजार प्रसार का प्रसार की डीएवीपी मान्यता लिये हैं वो भी इतनी प्रतियां नहीं छपवाते। अब ये छोटे-बड़े प्रकाशक न्यूज प्रिंट का जीएसटी कैसे साबित करेंगे?
90% अखबार पूरी तरह से सरकारी विज्ञापन पर ही निर्भर हैं। जबकि 10 % ब्रांड /बड़े अखबारों का लगभग आधा खर्च सरकारी अखबारों पर निर्भर है।
यदि ये अपना वास्तविक प्रसार बताकर सरकारी दरें लें तो वो सरकारी दरें इतनी कम होंगी कि इन दरों के विज्ञापनों पर निर्भर रहकर कतई तौर पर अखबार नही निकाला जा सकता है।
यदि कम प्रसार पर ही सरकारी विज्ञापन की अच्छी दरें सरकार दे तो प्रकाशक प्रसार की दावेदारी में इतना बड़ा झूठ क्यों बोलें।
झूठ और सच की इस नूराकश्ती में GST देश के करीब 80 अखबार बंद कराकर पत्रकारों और अखबार कर्मियों को बेरोजगार कर ही देगा। जबकि इस सच और झूठ से पत्रकारों का कोई मतलब नहीं है।
इस सच से भयभीत अखबार कर्मियों और हजारों पत्रकारों को आज जिन्दा रहने की एक आखिरी उम्मीद थी। लेकिन वित्त मंत्री की अध्यक्षता में जीएसटी कौंसिल की बैठक में अखबारों को कोई राहत नहीं मिली।
प्रकाशक व्यापारी होता है। अखबार के प्रकाशन को घाटे और खतरे का सौदा मानकर अखबार बंद कर देंगे। इस दौरान देश के लाखों पत्रकार /अखबार कर्मी बेरोजगार हो जायेंगे।







