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    Home»मीडिया

    .. पत्रकारों ने इस तरह वित्त मंत्री तक पहुंचाया अपना दर्द

    By March 12, 2018 मीडिया 1 Comment3 Mins Read
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    Post Views: 537

    अलख जलाओ तो सब साथ चले आयेंगे, 
    अंधेरे में किसी को भी कभी अच्छा नहीं लग।

    नवेद शिकोह

    लखनऊ, 12 मार्च। अलग-थलग ही सही पर अपने मकसद में सब साथ हो लिए। कामयाबी मिले ना मिले पर पत्रकार साथियों और संगठनों ने अपने हक की लड़ाई शुरू कर दी है। डीएवीपी की सख्त नीतियों से लेकर न्यूज प्रिंट पर जानलेवा जीएसटी के मसले पर लगातार इतना लिखा कि ये दर्द एक किताब की शक्ल ले सकता है। (इस मसले पर ही 50 से अधिक लेख गूगल पर देखे जा सकते हैं।)

    मसला अखबार के प्रसार की गड़बड़ियों या प्रकाशकों की अनियमितताओं का नहीं है, समस्या ये है कि जब देश के 90%अखबार बंद हो जायेंगे तो देश के लाखों अखबारकर्मी/पत्रकारों के रोजगार का क्या होगा? कार्पोरेट घरानों के बचे-खुचे 5-10%अखबारों में लाखों अखबार कर्मियों/पत्रकारों को रोजगार नहीं मिल सकता है।

    पिछले दो वर्ष पहले डीएवीपी की सख्त नीति से देश के लघु और मध्यम अखबारों को बंद करके प्रकाशक तो हंसी खुशी दूसरे व्यवसायों में अपना धंधा पानी चलाने लगे। लेकिन बेरोजगार हो रहे अखबार कर्मी /पत्रकार बेरोजगारी के श्राप में रोजगार की तलाश में भटकतने लगे। इस मुश्किल दौर में पत्रकारों को रोजगार का विकल्प कहीं नहीं मिला। लगातार रोजी-रोटी की मुश्किलों में जी रहे कुछ पत्रकार तनाव में हृदयघात का शिकार होकर मौत के मुंह में चले गये।

    इन हालात में आश्चर्यजनक बात ये रही कि पत्रकारों के हितों के बात करने वाले पत्रकार संगठनों ने डीएवीपी की सख्त नीतियों और उसके बाद न्यूज प्रिंट पर जीएसटी से बेरोजगार हो रहे पत्रकारों के मसले पर एक बार भी फिक्र जाहिर नहीं की।

    पत्रकार संगठनों की इस उदासीनता और गैरजिम्मेदाराना रवैये पर मैंने दो वर्षों के दौरान इतना लिखा कि मेरी आंखे कमजोर होती गयीं। दो साल में मेरे चार चश्में बदले।

    इसी क्रम में मैंने तीन दिन पहले अपने लेख में पत्रकारों और तमाम पत्रकार संगठनों से आह्वान किया कि लखनऊ आ रहे वित्त मंत्री अरूण जेटली से पत्रकारों के जाते रोजगार पर पत्रकार संगठन और लखनऊ के पत्रकार बात करें।
    देश में कुल जितने अखबार हैं उसमें 50% अखबार लखनऊ सहित पूरे उत्तर प्रदेश में हैं। इस सूबे के अखबारों से लाखों अखबार कर्मियों और पत्रकारों का रोजगार जुड़ा है।

    इसलिए यहां के छोटे-बड़े पत्रकार संगठनों को न्यूज प्रिंट के मसले पर अरूण जेटली जी से गुहार लगानी ही चाहिए है।

    खैर ये इल्तिजा रंग लायी। आज वित्त मंत्री अरुण जेटली जी राज्य सभा के लिए पर्चा दाखिल करने के लिए जब लखनऊ आये तो पत्रकारों और पत्रकार संगठनों ने जगह-जगह पर पत्रकारों के रोजगार के मसले पर उन्हें ज्ञापन सौंपा। जिसमें अखबारों के बंद होने पर पत्रकारों के रोजगार जाने की फिक्र करते हुए इस बात से वाकिफ किया गया कि न्यूज प्रिंट पर जीएसटी लागू होने से अखबार बंद हो रहे हैं। जिसका खामियाजा पत्रकारों के रोजगार को उठाना पड़ रहा है।

    वित्त मंत्री जी का आज का शैड्यूल बहुत तंग था। उनके पास नपातुला सीमित समय था। जिसके कारण पत्रकार और पत्रकार संगठनों के पत्रकार नेता आज सुबह से ही हर उस जगह पर डेरा डाले रहे जहां से जेटली जी को गुजरना था। कोई पत्रकार संगठन ज्ञापन देने उस होटल पंहुच गया जहां वित्त मंत्री ठहरे थे। संगठनों के एक दल ने उस वक्त ज्ञापन दिया जब वो विधानसभा से राज्य सभा सदस्य की दावेदारी का पर्चा भर कर निकल रहे थे। यहां तक कि भाजपा कार्यालय से लेकर लखनऊ हवाई अड्डे तक में पत्रकारों और पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी वित्त मंत्री से न्यूज प्रिंट पर जीएसटी के साइड इफेक्ट से पत्रकारों की दुर्गति का दर्द बयां करने की कोशिश में लगे रहे।

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    1 Comment

    1. sanjog walter on March 12, 2018 3:19 pm

      आपकी कोशिश को सलाम

      Reply
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