प्रभात त्रिपाठी बने मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष 

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मनमोहन सचिव और दिलीप सिंह –

शशिनाथ दुबे उपाध्यक्ष पद के लिए चुने गये

लखनऊ, 28 फरवरी। दोनों मान्यता प्राप्त संवाददाता समितियों की संयुक्त बैठक में लिए गये निर्णय के बाद आनन-फानन में चुनावी प्रक्रिया को अंजाम देकर नये पदाधिकारियों का चयन कर लिया गया। प्रभात त्रिपाठी अध्यक्ष पद के लिए चुने गये और सचिव बने मनमोहन। जबकि दिलीप सिंह और शशिनाथ दुबे समिति के दो उपाध्यक्ष पदों की दावेदारी में विजयी हुए।
दो दिन की गुपचुप गतिविधियों में दोनो समितियों के पदाधिकारियों ने एक संयुक्त बैठक में सर्वसम्मति से एक हो जाने का ऐलान किया।
 एक समिति हो जाने के बाद दूसरे ही दिन जी बी एम बुलाने की औपचारिकता भी कर ली गयी। जी बी एम में तय हुआ कि अगले दिन चुनाव के लिए नामांकन होगा। नतीजतन  पत्रकारों तक सूचना ना पहुंचने के कारण नामांकन करने वाले चंद दावेदार निर्विरोध चुन लिए गये।
ये खबर सुनकर पत्रकारों ने इस चुनाव को असंवैधानिक करार देते हुए इसका विरोध करना शुरू कर दिया । पत्रकारों का कहना था कि चंद लोगों को ही जी बी एम की सूचना दी गयी। इसी तरह गुपचुप तरीके से चुनाव और नामांकन की तारीखों की इत्तेला पत्रकारों तक नहीं पहुंची। नतीजतन चंद दावेदारों के नामांकन में एक पद के लिए एक पत्रकार ही दावेदार था, इसलिए बिना चुनाव के ही पर्चा भरने वाला हर दावेदार निर्विरोध चुन लिया गया।
इन बिन्दुओं पर चर्चा करने के लिए एकजुट हुए पत्रकारों ने पुनः चुनाव कराये जाने की मांग रखी है। पत्रकारों का कहना है कि बाकायदा सभी मान्यता प्राप्त पत्रकारों को सूचित करके जनरल बाडी मीटिंग बुलाई जाये। जिसमे सबकी सहमति से चुनावी प्रक्रिया की रुपरेखा तय हों।
इधर निर्विरोध चुने गये पदाधिकारियों का कहना है कि दोनों समितियों के पूर्व पदाधिकारी आपसी मिलीभगत से गुपचुप तरीके से निर्विरोध चुने जाने का दावा करके पुनः समिति के पदों पर काबिज होने की योजना बनाये थे।
ये आपस में मिलकर विधानसभा प्रेस रूम में नामांकन का ड्रामा रचकर सुबूत स्वरूप फोटोग्राफी करवा रहे थे।  इस बीच इत्तेफाक से हम लोग विधानसभा के प्रेस रूम पहुंच गये।  ये देखकर दोनों गुटों के(जो अब एक हो चुके हैं) पूर्व पदाधिकारी हड़बड़ा गये।  इस बीच हम लोगों ने बड़े पदों के लिए पर्चा भर दिया।  मजबूरी में इन्हें हमें निर्विरोध प्रत्याशी के तौर पर चुन्ना पड़ा।
  इन नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने ये किस्सा सुनाते हुए इस साइलेंट इलेक्शन का विरोध कर रहे पत्रकारों से अनुरोध किया कि वे उन्हें समिति का पदाधिकारी स्वीकार कर लें।
 इन नये नवेली पदाधिकारियों ने भी पुरानी समितियों पर आरोप लगाया कि पहले के तमाम चुनावों में वो बरसों से चुनाव लड़ते रहे हैं। सबसे अधिक वोट पाने के बाद भी चुनावी प्रक्रिया की बेईमानी के कारण उन्हें कभी भी विजय घोषित नहीं किया गया।
क्योंकि इस बार इत्तेफाक, किस्मत, तुक्के या झटके से ये निर्विरोध चुन लिए गये हैं। इसलिए उन्हें बतौर पदाधिकारी स्वीकार कर लिया जाये।

” होली बुलेटिन “ की अगली खबर:

राव-हेमंत गले मिले। Ifwj भी हुआ एक। विवादों की गुत्थी को सुलझाकर जय-वीरू ने बंटवारे के गब्बर को मारने का किया फैसला। द्वेष को त्यागकर पुरानी दोस्ती के सुलझे धागों से Ifwj के दो टुकड़ों को सिल कर किया एक।
(खबर विस्तार से बुलेटिन की अगली कड़ी में)
बुरा ना मानों होली है..
(बुरा मान भी गये तब भी क्या कर लोगे )
-नवेद शिकोह