- सरकारी दस्तावेजों में जिन पत्रकारों का वेतन 17000 से कम है उससे 17000 से ज्यादा मकान का किराया मांग रहा राज्य सम्पत्ति विभाग
- दलाल नहीं है पत्रकार, जो वेतन से ज्यादा दलाली में कमा लें
नवेद शिकोह
लखनऊ, 17 मार्च। आरोप हर पेशेवर पर लगते हैं। सरकारी कर्मचारियों/अफसरों पर रिश्वत लेने के आरोप लगते हैं। सरकारी डाक्टरों पर प्राइवेट प्रैक्टिस के आरोप लगते हैं। सरकारी शिक्षकों पर ट्यूशन के आरोप लगते हैं। धार्मिक गुरुओं पर धर्म की ठेकेदारी के आरोप लगते हैं।.. इसी तरह हर पेशे के हर पेशेवर पर आरोप लगते हैं।
पत्रकारों पर दलाली के आरोप लगते हैं। पत्रकारों पर ऐसे आरोप लगना कोई नयी बात नहीं है। नयी और आश्चर्यजनक बात ये है कि पत्रकार दलाली करते हैं, इस बेबुनियाद और वाहियात बात पर शायद सरकार ने यक़ीन कर लिया है। पत्रकार दलाल होते हैं इस बात पर सरकार ने खासतौर से सरकार के राज्य सम्पत्ति विभाग ने एक तरह से मोहर लगा दी है।
ऐसा मैंने क्यों कहा जरा जानिये :
जिन पत्रकारों के निजी मकान नहीं हैं और जो बाजार के मंहगे किराये वाले मकानों का किराया वहन नहीं कर सकते हैं ऐसे पत्रकारों को सरकार रियायती किराये पर राज्य सम्पत्ति विभाग के मकान मोहय्या कराती हैं।
नियमानुसार मकानों की सुविधा उन्हीं पत्रकारों को दी जाती है जिनकी राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता हैं। ये प्रेस मान्यता उन्हीं पत्रकारों को मिलती है जो फुल टाइमर /श्रमजीवी /पूर्णकालिक पत्रकार है। मतलब ये कि पत्रकारिता के सिवा जो दूसरा कोई काम नहीं करता हों। जो सिर्फ बतौर पत्रकार मिलने वाले वेतन पर ही निर्भर है।
राज्य मुख्यालय प्रेस मान्यता मिलते समय या मान्यता नवीनीकरण के समय पत्रकारों ने अपनी जो वेतन पर्ची सूचना विभाग को सौंपी है उस हिसाब से 80% पत्रकारों का वेतन 17000 से कम है।
ऐसे में राज्य सम्पत्ति विभाग ने क्या सोचकर ऐसे पत्रकारों के मकान का किराया 17000 से ज्यादा कर दिया जिनका वेतन ही 17000 से कम है?
हम दलाली नहीं करते। क्या इस बात का भी शपथ पत्र दें !
पत्रकार और पत्रकार संगठन सरकार से यही सवाल करने जा रहे हैं।







