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    मान्यताप्राप्त पत्रकारों का इलेक्शन: पत्रकारों में विनम्रता की होड़!

    By April 8, 2018 मीडिया No Comments6 Mins Read
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    श्याम कुमार 

    लखनऊ में राज्य-मुख्यालय से मान्यताप्राप्त पत्रकारों में इन दिनों विनम्रता का जबरदस्त ‘कम्पटीशन’ चल रहा है। उन्हें देखकर किसी कोने से नहीं लगता कि वे पत्रकार हैं। पत्रकार तो किसी भी जमात में बैठा हो, देखने से पता लग जाता है कि वह पत्रकार है। जिन पत्रकारों की गर्दन हमेशा ऐंठी हुई रहती थी तथा लालू यादव की तरह जिनका शरीर पीसा की मीनार की भांति पीछे की ओर झुकी मुद्रा में रहता था, आज उनके शरीर ने चोला बदल लिया है। अब वे हर समय सामने की ओर झुके हुए दिखाई देते हैं। वे इतनी विनम्र मुद्रा में दिखाई देते हैं कि आश्चर्य होता है। इस चमत्कारपूर्ण परिवर्तन का कारण है राज्य-मुख्यालय से मान्यताप्राप्त पत्रकार समिति का चुनाव। वैसे तो मान्यताप्राप्त पत्रकारों के कई तरह के संगठन हैं, जिनमें राज्य-मुख्यालय से मान्यताप्राप्त वरिष्ठ एवं स्वतंत्र पत्रकारों का प्रतिष्ठापूर्ण संगठन भी है। लेकिन जिस मान्यताप्राप्त पत्रकार समिति का चुनाव हो रहा है, वह अनोखी कही जा सकती है। वह प्रदेश सरकार की कभी दुलारी हो जाती है तो कभी नहीं। मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में वह पूरी तरह तिरस्कृत थी।

    अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में उसके दो फाड़ हो गए, जिनमें एक का नेतृत्व अध्यक्ष के रूप में हेमंत तिवारी ने किया तो दूसरी का नेतृत्व प्रांशु मिश्र ने। इस विभाजन का अखिलेश यादव ने खूब फायदा उठाया तथा अपना व अपने पिट्ठू पत्रकारों का जमकर उल्लू सीधा किया। उस समय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने प्रिय पत्रकारों को जमकर नवाजा, लेकिन शेष पत्रकार बिरादरी का भीषण नुकसान किया। इस समय यह समिति प्रमुख सचिव अवनीश अवस्थी की प्रिय बताई जाती है।

    राज्य-मुख्यालय से मान्यताप्राप्त पत्रकार समिति का नया चुनाव 15 अप्रैल को-

    इस समय दो तरह के पत्रकार नजर आ रहे हैं, जिन्हें ‘घराती’ एवं ‘बराती’ का दर्जा दिया जा सकता है। शादियों में घराती पक्ष हमेशा विनम्रतम मुद्रा में रहता है तथा बराती पक्ष की मुद्रा अकड़वाली होती है। राज्य-मुख्यालय से मान्यताप्राप्त पत्रकार समिति का नया चुनाव 15 अप्रैल को होने वाला है। इसमें जो पत्रकार विभिन्न पदों के लिए खड़े हैं, वे ‘घराती’ मुद्रा में हैं तथा मतदाता पत्रकार ‘बराती’ की मुद्रा में हैं। विनम्रता के ये दृश्य देखकर मुझे वरिष्ठ समाजवादी नेता मोहन सिंह का स्मरण हो रहा है। मैं जिस समय इलाहाबाद में प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक ‘भारत’ में स्थानीय समाचार सम्पादक एवं मुख्य संवाददाता था, उस समय मोहन सिंह प्रयाग विश्वविद्यालय में विद्यार्थी थे और प्रयाग विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए खड़े थे। उस समय यह चमत्कारिक घटना हुई थी कि मोहन सिंह ने अधिक धनराशि खर्च किए बिना अपने ‘गोड़े गिरे’ फारमूले से अध्यक्ष पद का चुनाव जीत लिया था। वह पूरे चुनाव-अभियान के दौरान बड़े विनम्रभाव से सबके चरणस्पर्श किया करते थे और इस प्रकार उन्होंने सबका मन मोह लिया था।

    इस समय उम्मीदवारों में विनम्रता का जो दौर चल रहा है, पिछले चुनावों का अनुभव बताता है कि वह सदा की तरह पूर्णरूप से अस्थायी है। इस समय ऐसे-ऐसे लोग अपनापन दिखा रहे हैं, जो किसी से सीधे मुंह बात नहीं करते थे। मुझे भी पूर्व में ऐसे दो अनुभव हो चुके हैं। पिछले चुनाव में एक फाड़ के अध्यक्ष प्रांशु चुने गए थे। प्रांशु ने चुनाव से पहले कभी मुझे नमस्कार तक नहीं किया था, किन्तु चुनाव के समय वह बड़े अदब से मुझसे जब वोट मांगने आए तो उस समय मैंने कह दिया था- ‘चलो, इस बहाने तुम मुझसे बोले तो।’ दूसरे फाड़ के मुखिया हेमंत तिवारी से मेरा बहुत पुराना सम्बंध रहा है। वह जब दैनिक जागरण में थे, तब से मेरा बहुत अधिक सम्मान किया करते थे और मिलने पर मेरे चरण छूते थे। उस समय उन्होंने एक सज्जन की ‘जूता’ शीर्षक कविता मुझे सुनाई थी, जो बड़ी रोचक थी। लेकिन वही हेमंत तिवारी जब बहुत अधिक शक्तिमान एवं वैभवशाली हो गए तो उनकी वह विनम्रता घटती गई। पहले वह बात के बड़े पक्के हुआ करते थे, लेकिन बाद में उनकी भिन्न छवि हो गई।

    जहां तक राज्य-मुख्यालय मान्यताप्राप्त समिति का प्रश्न है, मैं तो इस समिति को कायम रखने के पक्ष में ही नहीं हूं। मेरे-जैसे तमाम पत्रकारों का यह मत है कि यह समिति पत्रकारों का कल्याण करने के बजाय कुछ दबंग लोगों की स्वार्थसिद्धि का जरिया बनी हुई है। पत्रकारों का हित करने के मामले में उक्त समिति पूरी तरह फिसड्डी सिद्ध हुई है। जिस प्रकार हमारे सांसद व विधायक चुनाव के समय जनता को मालिक एवं अपने को जनता का सेवक कहते हुए नहीं थकते तथा चुनाव के बाद अपने को मालिक व जनता को अपना तुच्छ सेवक समझते हुए आचरण करने लगते है, बिलकुल वही स्थिति यहां भी दिखाई दिया करती है। चुनाव जीतते ही विजेता प्रायः पत्रकारों का हित भूलकर अपने हित में लिप्त हो जाते हैं। चुनाव में खड़े उम्मीदवारों द्वारा इस समय बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं, किन्तु देखना है कि विजयी होने पर कौन अपने वादों पर कितना टिकता है तथा पत्रकारों के हित के लिए कौन कितना संघर्ष करता है!

    पिछले एक चुनाव में जब एक दबंग उम्मीदवार विजयी हुआ था तो उसने बाद में यह कहा था कि चुनाव की मजबूरी में उसने अपने स्वभाव के विपरीत पिछले दो महीने लोगों के बडे नाज-नखरे व कष्ट सहे। उसके उस कथन पर मैंने एक कविता लिखी थी, जो यहां प्रस्तुत हैः-

    दो महीने!
    हाय, ये दो महीने
    कैसे गुजरे !
    जैसे, जलती हुई भट्ठी पर
    शरीर जा पसरे।

    खाना-पीना,
    सोना-जागना
    हराम हो गया
    गली-गली घूमना
    एकमात्र काम हो गया।

    हर जगह रुकना पड़ा,
    हर समय झुकना पड़ा,
    चरणों को पकड़े रहना पड़ा।

    अलाय-बलाय-सलाय,
    आंय-बांय-सांय,
    सब सुनते रहना पड़ा,
    दो कौड़ी की नसीहतें
    गुनते रहना पड़ा,
    झूठे वादों के अम्बार
    खड़े करते रहना पड़ा।

    लेकिन बच्चू!
    वह दौर बीत गया है,
    कष्टों का घड़ा रीत गया है,
    बन्दा अब जीत गया है।
    अब तो मनमानी राह चलूंगा,
    किसी से बात नहीं करूंगा।
    कान में रुई पड़ी रहेगी,
    कोई फरियाद नहीं सुनूंगा।
    प्यारे!
    अब तुम अपनी औकात जान लो,
    मेरी औकात मान लो।
    दुनिया उलट गई है,
    धारा पलट गई है।

    रात गई, बात गई,
    सपनों की सौगात गई,
    कैसा वादा?
    कैसा नाता?
    कैसी वरिष्ठता?
    कैसी योग्यता ?

    मत भूलो —
    मैं नेता हूं,
    तुम जनता हो।
    मैं राजा हूं,
    तुम प्रजा हो।
    मैं कुआं हूं,
    तुम प्यासा हो।

    अहम् ब्रम्हास्मि,
    मैं ब्रह्म हूं !
    त्वम् कूड़ास्मि,
    तुम कूड़ा हो !

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