- प्रसव के बाद 24 घण्टे नवजात शिशु के लिए महत्वपूर्ण
- होम बेस्ड न्यू बोर्न केयर कार्यक्रम के तहत आशा घर-घर जा कर देती हैं जानकारी।
- शरीर में दिखने वाले मामूली लक्षण नवजात के लिए बन सकते है घातक
लखनऊ, 07 मई। लखनऊ के काकोरी ब्लॉक के शेख्पुरवा गाँव की महिला उज़मा बताती हैं कि उनका बच्चा 14 दिन का था, घर-घर भ्रमण के दौरान जब आशा दीदी घर आई तो उन्होंने देखा कि बच्चे को बहुत तेज़ बुखार है, वो ऐठन भी ले रहा है साथ ही उसके शरीर पर छोटे छोटे दाने भी हो रहे थे। आशा ने बच्चे को देखने के बाद बताया कि बच्चे को वेक्टीरियल इन्फेक्शन हो गया है, इसके बाद आशा हमे आंगनवाडी केंद्र ले गयी। वहां ए.एन.एम दीदी ने उसे देखा और काकोरी सी.एच.सी समीक्षक, विकास से बात की। समीक्षक विकास ने बच्चे को काकोरी सी.एच.सी पर दिखवाने के लिए बुलाया। वह उसको जेंटा इंजेक्शन लगाये, जिससे उसका बुखार उतरा और इन्फेक्शन भी कम हुआ। उज़मा ने कहा कि आज अगर आशा दीदी नहीं होती तो आज वह अपने बच्चे को शायद खो ही दी होती।
आशा परवीन सिद्दकी को उज़मा और उसका परिवार बच्चे को काकोरी सी.एच.सी ले जाने के काफी ज्यादा प्रयास करने पड़े व परिवार को समझाना पड़ा। आशा ने परिवार के जीवन यापन की जानकारी देते हुए बताया कि पहले उज़मा के पति कलाम रिक्शा चलाते हैं। परिवार की मन में सरकारी विभाग के बारे में काफी भ्रांतियां थी, पहले वह अपने बच्चे को सी.एच.सी ले जाने के लिए तैयार ही नहीं थे। परिवार को लगा उनके बच्चे को मामूली बुखार है, एक-दो दिन में वह ठीक हो जायेगा। फिर जब बच्चे का बुखार नहीं उतरा और उसके शरीर पर दाने भी होने लगे तो आशा ने उसको बार बार समझया कि यह जानलेवा भी हो सकता है। जानलेवा शब्द सुनते ही परिवार वाले सी.एच.सी ले जाने को तैयार हो गए।
प्रसव के बाद महिलाएं और तीमारदार प्रसव के ज्यादा समय तक अस्पताल में नहीं रहना चाहते। इस दौरान नवजात को किसी तरह शुरू के 24 घंटों की सुरक्षा तो मिल जाती है, लेकिन उसके बाद भी नवजात को पहले सप्ताह और पहले महिने तक विशेष देखभाल की जरूरत होती है। आगर प्रसव आस्पताल में न होकर घर पर हुआ हो तो और अधिक विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। एक सप्ताह से एक माह के दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही नवजात के लिए घातक हो सकती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से नवजात शिशु की मृत्यु दर में कमी लाने के लिए प्रदेश में माँ और नवजात शिशु की देखभाल के लिए होम बेस्ड न्यू बोर्न केयर (HBNC) कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम में आशा प्रसव के बाद 42 दिन तक 6-7 बार घर-घर जाकर भ्रमण कर नवजात शिशुओं व धात्री माताओं की घरेलू देखभाल करने के तरीके बताती है। साथ ही स्वस्थ्य रहने के लिए क्या क्या क्या करना है यह भी बताती है।
होम बेस्ड न्यू बोर्न केयर (HBNC) या नवजात की घर पर देखभाल, कार्यक्रम में शिशु को उसके जन्म से शुरू के 6 सप्ताह में सुरक्षित रखने के लिए आशा विशेष प्रयास करती हैं। कुछ मुख्य स्वास्थ्य व्यवहारों जिनपर विशेष रूप से जोर दिया जाता है जिनमें शीघ्र स्तनपान, नाल की देखभाल, शरीर का तापमान नियंत्रण, संक्रमण की पहचान, साफ़ सफाई का ध्यान इत्यादि शामिल हैं।
संस्थागत प्रसव के मामले में आशा एचबीएनसी के तहत 6 बार गृह भ्रमण पहले, सातवें, चौदहवें, इक्कीसवें, अट्ठाईसवें तथा तेतालीसवें दिन करती है। घरेलू प्रसव के मामले में आशा सात बार गृह भ्रमण पहले, तीसरे, सातवें, चौदहवें, इक्कीसवें, अट्ठाईसवें तथा छियालिसवें दिन करती है।
लेंसेट 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, शिशु मृत्यु दर के अनेक कारण है जिनमें समय से पहले जन्म एवं कम वजन का होना प्रमुख कारण है। इसकी वजह से 35 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु हो जाती है। इसी तरह 20 प्रतिशत निमोनिया, नवजात की सांस अवरुद्ध होने से मृत्यु होती है वहीं 16 प्रतिशत घाव का सड़ना या सेप्सिस एवं 9 प्रतिशत विकलांगता से मृत्यु हो जाती है।
हाल ही में प्रकाशित की गयी एसआरएस (सेम्पल रजिस्ट्रेशन सर्वे) 2016 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में शिशु मृत्यु की कुल दर 43 प्रति हजार जीवित जन्म में है जो कि 2014 से 5 प्रति हजार जीवित जन्म में कम है।
जिला कम्युनिटी प्रोसैस मैनेजर, विष्णुप्रताप ने बताया, होम बेस्ड न्यू बोर्न केयर के तहत लखनऊ में अप्रैल,2017 से फरवरी,2018 तक 1339 आशाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है तथा आशाओं द्वारा 23785 बच्चे देखे जा चुके हैं जिनमें 4039 बच्चे 2.5 किलोग्राम से कम वजन के पाए गए तथा 1527 बच्चों को संदर्भित किया गया।
बीरंगना अवंतीबाई महिला अस्पताल के बालरोग विशेषग्य, डॉ सलमान का कहना है कि ’नवजात में होने वाले कुछ खतरे के लक्षणों की जानकारी सभी अभिभावकों को होनी चाहिए जिनमें 1800 ग्राम से कम वजन का होना, तेज़ साँसे (60/प्रति मिनट से अधिक), पसली चलना, कुछ ना खाना-पीना, सुस्त रहना, शारीरिक तापमान का कम या अधिक होना, शरीर के किसी भी अंग से रक्तस्राव, 24 से ऊपर होने पर मूत्र एवं मलत्याग ना करना एवं लगातार उल्टी करना प्रमुख हैं। इनमें से कोई भी लक्षण दिखने पर अभिभावकों को बिना देर किये चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।”
प्रद्ध्युम्न, काकोरी ब्लॉक कम्युनिटी प्रोसैस मैनेजर (बीसीपीएम) का कहना है कि एचबीएनसी के कार्यक्रम की वजह से बहुत सी भ्रान्तिया खत्म हुयी है। क्योंकि जब एक आशा किसी के बार बार जाकर मदद करती है तो स्वयं लाभार्थी सभी को बताते है कि इन बहन जी ने इस तरीके से उनकी मदद की है।







