रक्तदान का लगातार बढ रहा है ग्राफ, खून के बदले खून की बात हुई पुरानी
लखनऊ, 06 अप्रैल। रक्तदान को लेकर युवाओं ने दिखाया दम। जी हां, 40 प्रतिशत से अधिक युवा वर्ग रक्तदान के लिए स्वतः लगातार आगे आ रहा है। वहीं इनके मुकाबले महिला वर्ग भी पहले की तुलना में बहुत जागरूक हो चली है। रक्तदान में अन्य राज्यों के मुकाबले यूपी का ग्राफ जहां नीचे था वहीं काफी तेजी से बढ़ा है। यह कहना है किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय लखनऊ के ट्रांसफयूजन मेडिशन विभागाध्यक्ष डाॅक्टर तूलिका चंद्रा का।
डाॅक्टर तूलिका के अनुसार बीते पांच वर्षों में रक्तदान को लेकर काफी जागरूकता बढ़ी है। ऐसे में जहां एक प्रतिशत से भी कम महिलाएं रक्तदान कर रही थीं वहीं अब प्रतिवर्ष 5 प्रतिशत से ऊपर महिलाएं इस मुहिम की गवाह बन रही हैं। महिला वर्ग में एनसीसी छात्राओं की भूमिका सराहनीय है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2004 में मात्र 431 लोगों ने रक्तदान किया वहीं 2010 में 19,510 और वर्ष 2017 के दौरान 70 हजार लोगों ने रक्तदान किया है। रक्तदान करने वालों में पुरूषों के मुकाबले महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है लेकिन जहां वर्ष 2004 में एक प्रतिशत से भी कम महिलाएं रक्तदान करती थीं वहीं अब इनका आकंड़ा पांच प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुका है। गांव की तुलना में शहरी आबादी में रक्तदान के प्रतिशत अधिक है। हालांकि ग्रामीण इलाकों में रक्तदान के प्रति भ्रांतियों में काफी कमी आई है। गांवों में जहां 30 प्रतिशत रक्तदाता पाये जा रहे हैं वहीं शहरी आबादी में इनकी संख्या 60 प्रतिशत से भी ऊपर है।
केजीएमयू में वर्ष के अनुसार रक्तदाता
- वर्ष 2004 431
- वर्ष 2005 2254
- वर्ष 2006 5366
- वर्ष 2007 7134
- वर्ष 2008 7811
- वर्ष 2009 9960
- वर्ष 2010 19510
- वर्ष 2011 31991
- वर्ष 2012 37504
- वर्ष 2013 45465
- वर्ष 2014 46837
- वर्ष 2015 54658
- वर्ष 2016 59736
- वर्ष 2017 70000
अब आया ब्लड कंपोनेंट का जमाना
अब खून के बदले खून देने की बात मत कहिए जनाब, क्योंकि यह तकनीक बदल चुकी है। डाॅक्टर तूलिका चंद्रा के अनुसार रक्त को पहले तो नैट विधि से जांचा जाता है। फिर उसको चार अवयवों यानी कंपोनेंट में विभाजित किया जाता है। रक्त से चार कंपोनेंट यानी कि लाल रक्त कोशिकाएं, प्लाज्मा, प्लेटलेटस और क्रायोप्रेसीपिटेट बनता है। ऐसे में आपके एक यूनिट रक्त से सैकड़ों मरीजों में जिस मरीज को जिस कंपोनेंट की आवश्यकता होती है दिया जा सकता है। आपका एक यूनिट ब्लड यानी मात्र 350 मिलीलीटर रक्त से 300 से भी अधिक लोगों की जान बचाई जा सकती है।
यह भी जानें
- रक्तदान 18 वर्ष से 65 वर्ष का कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति कर सकता है।
- रक्तदान के दौरान सामान्यतः 350 मिली लीटर लिया जाता है।
- रक्तदान में करीब 10 मिनट का समय लगता है और हर तीन माह में रक्तदान किया जा सकता है।
- रक्तदान से शरीर में किसी प्रकार की कमजोरी नहीं आती है।
- रक्तदाता का हीमोग्लोबिन 12-5 ग्राम प्रतिशत से कम नहीं होना चाहिए।
- रक्तदाता का वजन कम से कम 50 किलोग्राम होना चाहिए।
- रक्त चार प्रकार का होता है। ए, बी, ओ और एबी। इसे आरएच पाॅजिटिव और आरएच निगेटिव में बांट दिया जाता है।
रक्तदान के लाभ
- रक्तदान के तुरन्त बाद ही नई लाल कोेशिकाएं बनने से शरीर में स्फूर्ति पैदा होती है।
- रक्तदान करते रहने से दिल की बीमारी में पांच प्रतिशत कमी आती है। साथ ही अस्थिमज्जा लगातार क्रियाशील रहती है।
- रक्त द्वारा संक्रमित होने वाली बीमारियां की नैट विधि द्वारा स्वतः जांच हो जाती है।
- आवश्यकता पड.ने पर रक्तदाता कार्ड के बदले रक्तकोष से रक्त मिल जाता है।
होप ब्लड डोनर
झाँसी में पिछले दो साल से व्हाट्सएप ग्रुप होप ब्लड डोनर चल रहा हैं. इस ग्रुप में अभी 60 लोग जुड़े हैं। जिसमें दो लड़कियां भी हैं। झाँसी में इस ग्रुप के माध्यम से करीब 40 लोगों को रक्त मुहैया कराया जा चुका हैं। इसके अलावा इस ग्रुप की शुरुआत करने वाले 28 वर्षीय जीशान अख्तर खुद बताते हैं कि वो अभी तक 13 बार रक्तदान कर चुके हैं। वो कोशिश करते हैं कि हर 3 महीने में उन्हे कोई न कोई मिल जाए जिसे खून की जरूरत हों। इसी के साथ उनका कहना है कि सिर्फ झाँसी में इस ग्रुप से जुड़े लोगों के इतर भी बहुत से ऐसे लोग है जिन्होंने उनके कहने पर रक्त दिया हैं। साथ ही लखनऊ और भोपाल में भी बहुत बार खून की जरूरत वाले लोगों को इन्होंने अपने परिचितों के जरिए खून मुहैया कराया हैं।
मुश्किलों भरी राह
रक्तदान के प्रति महिलाओं के रूझान कम होने के कई कारण हैं। महिलाएं मां बनने से पहले और कुछ वर्ष बाद तक सिर्फ इसलिए रक्तदान नहीं कर पाती हैं। क्योंकि उनका मानना हैं रक्तदान करने से बच्चे की परवरिश में कमी आ जाएगी। इस दौरान अधिकांश महिलाओं में खून की कमी या फिर अन्य कई तरह की समस्याएं रहती हैं। वहीं डाॅक्टर तूलिका ने बताया कि 40 वर्ष के बाद की अधिकांश महिलाओं में खून की कमी होती है। इस कारण वे रक्तदान नहीं कर पाती हैं। वहीं कई बार रक्तदान के लिए विभाग की सारी कोशिशें बेकार साबित होती हैं।
एक आशा बहु ने बताया कि जब वह एनीमिक मरीज लेकर अस्पताल पहुंची तो मरीज को खून देने के लिए परिजन नहीं तैयार थे। न ही डाॅक्टर परिवार वालों को परामर्श दे रहे थे। आशा बहु ने बताया कि जब उसने डाॅक्टर से इस रक्तदान के संबंध में बात की तो डाॅक्टर उल्टा आशा बहु पर ही रक्तदान करने के लिए दबाव बनाने लगे। आशा बहु ने बताया कि डाॅक्टर ने बोला कि या तो आशा बहु रक्तदान करे नहीं तो उसके पति रक्तदान करें। इन परस्थितियों में एक सवाल वाजिब है कि एक आशा बहु कितने मरीजों को रक्तदान कर सकती है।
वहीं एक आशा बहु ने बताया कि एक महिला का गर्भावस्था के दौरान आठवें माह मात्र 4 ग्राम हीमोग्लोबिन था। महिला के परिवार में कोई भी अन्य सदस्य नहीं है। पति सुदूर नौकरी कर रहा था। गर्भवती महिला आर्थिक रूप से काफी कमजोर थी। वहीं आशा बहु ने महिला को हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए कुछ देसी खाद्य पदार्थ बताए। महिला का हीमोग्लोबिन मात्र एक माह में 4 से 9 हो गया। महिला ने 9वें बच्चे को जन्म दिया। और प्रसव के अगले 24 घंटे में अपनी जिद से तीन किलोमीटर दूर अपने घर पैदल चली गई। महिला और उसका पति आज भी आशा बहु का अहसानमंद है।







