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    अस्पताल या उद्योग धंधे!

    By December 14, 2017Updated:December 14, 2017 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    जीके चक्रवर्ती

    भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में की जाती है जहां पर स्वास्थ्य सेवा जैसे महत्त्व पूर्ण सेवाओं पर सरकारी खर्च बहुत ही कम किया जाता है। भारत के स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिवर्ष होने वाले खर्चे मात्र डेढ़ फीसदी से भी कम है, वही पर हमारे पडोसी देश चीन में यह तीन फीसदी से भी अधिक है। इसलिए भारत की सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था हमेशा संसाधनों और कर्मियों की कमी जैसी परेशानियों से जूझते रहते हैं इनके अलावा सरकारी सेवाओं जैसे जननी सुरक्षा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाओं में पर्याप्त आवंटन न मिलने एवं भ्रस्टाचार के दंशों को झेलती रहती हैं बदइंतजामी और कर्मचारियों के लापरवाही की मार ऊपर से, इनके अतिरिक्त हम भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र की एक और बड़ी त्रासदी से ग्रसित है और वह कुपोषण के शिकार होने होने की संवेदनहीनता।

     यह मुख्यतः सरकारी अस्पतालों में तो दिखती ही रहती है इसके अतिरिक्त वर्त्तमान समय में निजी अस्पतालों तक में भी दिखाई देने लगी है सरकारी अस्पताल की निष्ठुरता, लापरवाही एवं अमानवीय चेहरे का एक बड़ा उदाहरण गोरखपुर में जापानी बुखार से पीड़ित सैकड़ों बच्चों की मौत के रूप में हम देख चुके है। निजी अस्पताल भी कम संवेदनहीन नहीं होते है, इसके उदाहरण स्वरूप अभी अभी हुए दो ताजा मामलों ने सभी को स्तब्ध कर दिया है। अभी कुछ दिनों पहले ही एक निजी अस्पताल ने डेंगू से पीड़ित एक बच्चे के इलाज का सोलह लाख रुपये का बिल उसके माता-पिता को पकड़ा दिया। उस बच्चे की मौत भी हो गई थी। इस् तरह की खबरें जब प्रकाश में आई तो उस वक्त निजी अस्पतालों में होने वाली लूटखसोट की खबरें बहुत दिनों तक चर्चा का विषय बनी रही। इससे पहले निजी अस्पतालों एवं निजी स्वस्थ केंद्रों पर नाजायज तरीकों से बिल वसूले जाने की घटनाएं अक्सर सुनाई देती रहती है लेकिन इन सब बातों को शासन प्रसाशन में कहीं कोई सुनवाई नहीं होती।

    हमारे देश में अस्पताल या चिकित्यसालय एवं जन औषधालय जैसे संस्थानों का निर्माण मानव सभ्यता के शरुआती दौर से ही बनते चले मानव कल्याण के लिए निर्मित होते रहे हैं वही पर मानव सभ्यता को विकास के वर्तमान स्तर तक आते आते चिकित्सा शास्त्र या विज्ञान में अनेको परिवर्तन होते रहने से हमारे देश की मृत्युं दर कम होती चली गई लेकिन वहीं पर अनेक तरह के नये रोगों के जन्म ले लेने से हम उसके अनुसार अपने यहाँ के अस्पतालों एवं अस्पतालों द्वारा मरीजों को दिए जाने वाले सेवाओं को चुस्त दुरुस्त नहीं कर पाने से इसमें सुधार होने की बजाए के और बिगड़ती चले जाने से दुर्व्यवहारों जैसी हरकतें बढ़ते चले जाने के क्रम में मरीजों से येनकेन प्रकारेण मोटि धनराशि उगाही किये जाने की घटनाएं अधिक सुनाई देने लगी। तो यह कहना पड़ता हैं कि हमारे देश की लगभग सभी अस्पतालों का बहुत बुरा हाल है खास तौर पर निजी अस्पतालों की अपेक्षा सरकारी अस्पतालों के हाल और भी बत्तर है।
    हमारे देश की केंद्र सरकारों से लेकर राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य सेवाओं के लिये अनेकों नीतिया भी बनाई लेकिन वे नीतियां आज दिन तक धरातल पर न आने की वजह से कारगर सिद्ध नहीं हो पाई। देश के लगभग सभी सरकारी अस्पतालों में निशुल्क दवाइयों से लेकर देन महँगे जांचें भी बहुत कम शुल्क पर जनता को उपलब्ध कराए जाने जैसा प्राविधान हैं लेकिन इन अस्पतालों में निशुल्क दिए जाने वाले दवाइयों के नाम पर कुछ ही दवाइयों को उपलब्ध कराया जाता हैं बाकी के सभी दवाइयों को बहार निजी दुकानों से खरीदनी पड़ती हैं जो विदेशी कम्पनियों के होने अतरिक्त मरीज के द्वारा प्रत्येक खरीद पर डॉक्टरों को मोटा कमीसन दिए जाने की वजह से इन दवाइयों के दाम अधिक हो जाने से साधारण व्यक्तियों की इन दवाइयों तक पहुँच अत्यंत कठिन हो जाता है वही पर डॉंक्टरों द्वारा वही दवाइयां मरीजों को लिखी जाती हैं जिन दवाईयों पर उनको मोटा कमीशन मिलना तय होता है।
     
    कभी कभी तो डॉक्टरों द्वारा मरीजों को यह हिदायत भी दी जाती है कि दवा लेने के बाद डॉक्टर यदि अपनी सीट पर उपलब्ध न हो तो इन दवाइयों को डॉक्टर के घर पर दिखाना पड़ता है। डॉंक्टर उन दवाइयों में से कुछ अपने पास रख कर वाकी के दवाइयों को मरीज को वापस कर देते हैं। विशेषकर हमें उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे राज्यों के सरकारी अस्पतालों में सरकार द्वारा जिन मशीनों को मरीजों के इलाजों में होने वाले जाँचों के लिए लगवाए गए हैं, वे मशीने हमेशा सुचारू रूप से नही चलती पाती हैं इसके लिए वहां के डॉक्टर एवं कर्मचारियों की मिलीभगत से धन उगाही का जरिया बना लेते हैं इसलिए कुछ न कुछ कमी वास्तव में न होते हुए भी कृतंम रूप से पैदा कर दी जाती है इन सबों के अलावा सरकारी रखरखाव के घोर लापरवाही के चलते गरीबों को जो जांचें निशुल्क उपलब्ध कराने का दावा सरकारों द्वारा समय समय पर किया जाता ऐसी महंगी जांचे डॉक्टर द्वारा बताये गए उन सार्वजानिक पैथोलॉजी, एक्सरे या अल्ट्रासाउंड सेंटरों में मज़बूरी में न चाहते हुए भी मरीजों को करना पड़ता है।
    इन निजी जाँच संस्थानों से भी डाँक्टरों द्वारा एक मोटी धन राशि कमीशन के तौर पर वसूले जाने की बाते समय समय पर आती रही हैं वही पर वर्तमान समय तक देश को आजाद हुए सत्तर दशकों से अधिक का समय गुजर चुके है फिर भी आज दिन तक देश के सभी गांवों में खास कर उत्तर प्रदेश एवं बिहार के गांवों में दूर दर्ज तक डिस्पेंसरियां भी उपलब्ध नही है शहर के बड़े हॉस्पिटलों में अत्यधिक दबाब होने के कारण उनको बेड भी उपलब्ध नही हो पाते है जिसके कारण  मरीज़ों में सक्रमण का खतरा अधिक हो जाता है वहीँ पर ऐसे हालातों पर काबू पाने के लिए अस्पतालों में संसाधनों के अतिरिक्त विस्तारों की संख्या में इजाफा नहीं हो सकी।
    वर्त्तमान समय में जिस तेजी के साथ जनसँख्या में बढ़ोत्तरी हुई है उसके अनुपात में हॉस्पिटलों ओर डिस्पेंसरियों की संख्या बढ़ाने में हमारी सरकारें ना कामियाब रहीं। वही पर हमें देश की असप्तलों में दवाईयों एवं उपकरणों की आपूर्ति निरंतर बनाये रखने जैसी बातों के साथ ही साथ सरकारों को अपनी नीतियों में भी बदलाव लाना होगा गरीब जनता का भला हो सके इसी आधार पर नीतिया भी बनाई जानी चाहिए जिससे गरीब लोगों की बेसकीमती जिंदगी को बचाई जा सके।
    शहरों के अस्पताल जो मौजूद समय में सुबह 9 से दोपहर 2 बजे और शाम को 5 बजे से 7 बजे तक खुले रहते हैं और बड़े अस्पताल दूरी पर होते हैं इन अस्पतालों में रात की कोई सुविधा उपलब्ध नही होने के कारण आपातकाल में मरीज को निजी अस्पतालों में ले जाने के लिए बाध्य हैं मजबूरी में प्रत्येक बीमार व्यक्ति का परिजन यह सोचता है कि बीमार को जल्द से जल्द इलाज़ मिले क्योकि डॉक्टर के सिवाय कोई भी व्यक्ति यह नही जानता है कि बीमारी क्या है इसलिये जल्दी से जल्दी इलाज की सोचता है क्योंकि सरकारी अस्पताल में नम्बर भी देरी से आता है और जब तक डॉक्टर को घर नही दिखाया जाता डॉक्टर बाहर की जांच लिखता है प्राइवेट अस्पतालों में तो वर्त्तमान समय में प्रति बेड चार्ज भी कम से कम 1000 रु है इसलिये गरीब लोग ही पिस्तें है सहरों में तो इतनी भीड़ है की कई बार सरकारी अस्पताल तक जाने में जाम में फँस जाने से बीमार व्यक्ति की मौत तक हो जाती है यही हाल प्रसूता के साथ भी होता है।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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