सर्दियों में दुधवा में भयंकर ठंड पड़ती है । शायद 11 वर्ष पहले की बात है जनवरी के महीने में मैं सुबह दुधवा टाइगर रिज़र्व के किनारे स्तिथ अपने कैंप से टहलने के लिए निकला तो बाहर घना कोहरा था। हम लोग टहलते हुए मगरमच्छ और चिडियों को देखते हुए काफी दूर निकल गए थे। धीरे धीरे कोहरा खत्म होकर सूरज भी निकल आया था।
ज्यादा ठंड होने की वजह से मुझे पानी साथ ले जाने का ध्यान ही नहीं रहा था और लगातार पैदल चलने से अब प्यास जोर पकड़ने लगी तो मुझे उस गन्ने के चौकीदार घुम्मन की याद आ गयी जो अब इस दुनिया में नहीं है।
घुम्मन की झोपडी जंगल के एकदम किनारे स्थित गन्ने के खेत के पास थी । झोपडी के पास ही एक नल लगा था। हम लोग अक्सर टहलते हुए घुम्मन के पास जाकर बैठते थे और वो अपने किस्से कहानिया और अनुभव हमसे सेयर करता।
…उसने पूरी जिन्दगी जंगले के किनारे फसलो की रखवाली करते हुए बिता दी थी। उसका एक वाक्या मुझे आज भी याद है। वो हमेशा गर्मी में सोते वक़्त अपनी झोपड़ी के पास लगे नल पर बाल्टी भर कर रख देता था जिस पर गन्ने के खेतो में रहने वाले जानवर अक्सर पानी पीते और जब कभी टाइगर उधर से गुजरता तो वह भी वही पर बाल्टी में पानी पीता। जब बाघ द्वारा चपर चपर कर पानी पीने की आवाज़ आती तो घुम्मन टोर्च जलाता….. बाघ धीरे से गुर्राता और जब वो टॉर्च बंद कर देता तो बाघ फिर पानी पीने लग जाता और पानी पी कर फिर अपने रास्ते चला जाता और घुम्मन भी चैन से सो जाता क्योकि जहा बाघ होता है वहाँ पर फसलो को नुक्सान पहुचाने वाले जानवर जैसे सूअर और हिरन वहा से भाग जाते है.
यह घटना याद करते हुए मै उसकी झोपड़ी की ओर गया और वहां लगे नल से पानी पिया। आज भी जब मैं उस झोपड़ी के पास से गुजरता हूँ तो मुझे उस नेक इंसान की याद आ जाती है. पर्यावरण संरक्षण में ऐसे कई साधारण लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। -अनुराग







