रमेश शर्मा
बाबा नीब करौरी महाराज का बचपन से ही आशीर्वाद पाने वाले डा. श्यामलाल कपूर की याददाश्त में बाबा महाराज से जुड़े अनेक संस्मरण हैं। जब यादों का पिटारा खुलता है तो सुनने और सुनाने वाला दोनों महाराज की श्रद्धा में लीन हो जाते हैं। महाराज जी से जुड़ी बातों का सिलसिला एक के बाद एक चलता रहता है।
कपूर जी बताते हैं कि उनकी राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) में नौकरी के दौरान जंगली प्लांट्स के नमूने इकट्ठा करके रिसर्च के लिए अक्सर पहाड़ी हिस्सों (अब के उत्तराखंड) में अपनी टीम के साथ जाना पड़ता था। एक बार इसी रिसर्च के काम से नैनीताल गए थे। रिसर्च का काम भवाली के आसपास कई दिनों का था। वह भवाली के एक सरकारी गेस्ट हाउस पहुंचे। गेस्ट हाउस की देखरेख कर रहे व्यक्ति से मुलाकात की। उन्होंने पूछा परमिशन कहां है। कपूर जी ने अपने विभाग का परमिशन संबंधी पत्र उन्हें दिखाया।
वह बोले कि यहां यह नहीं चलेगा। उन्होंने कहा यहां पर परमिशन केवल नीब करौरी महाराज की ही चलती है। कपूर जी ने उन्हें बताया कि वह तो महाराज जी के भक्त हैं। उन्हें पता नहीं था, नहीं तो आदेश ले आते। तभी अचानक वहां के डीएफओ आ पहुंचे। जब कपूर जी ने महाराज जी से अपने जुड़ाव और आत्मीयता के बारे में बताया तो वे अधिकारी बोले कि हम कैंची जा रहे हैं चलो मेरे साथ। कपूर जी तुरंत उनके साथ महाराज जी के दर्शन के लिए कैंची धाम जाने के लिए तैयार हो गए। जैसे ही हम लोग कैंची महाराज जी के पास पहुंचे महाराज जी सामने ही खड़े थे। बोले, तू कहां से आ गया। डीएफओ भी धीरे-धीरे नीचे आ गए और महाराज जी को प्रणाम कर सब लोग बरामदे में बैठ गए। जब मैंने बाबा महाराज को गेस्ट हाउस वाली बात बताई कि गेस्ट हाउस वाला आपका परमिशन मांग रहा था तो महाराज जी जोर से हंसे और डीएफओ से कहा इसको परमिट दे दे।
फिर हम टीम के साथ चार पांच दिन भवाली को सेंटर बनाकर वहां रुके और रिसर्च का काम किया। भवाली में काम पूरा होने पर फिर कैंची गया। वापसी में महाराज जी ने मुझे प्रसाद देने के लिए कहा। प्रसाद की कम मात्रा देखकर महाराज जी बोले इतने में क्या होगा। लखनऊ से जो आम की टोकरी आयी है उसमें ठीकठाक पूड़ी, अचार बांध दे। मुझे भी लगा कि इतना ज्यादा प्रसाद क्या होगा। महाराज जी बोले तू नहीं जानता, पहाड़ पर बहुत भूख लगती है। रिसर्च के कार्य से नैनीताल भी कई दिन रुकना पड़ा और यह प्रसाद ही भोजन के रूप में काम आया। जिस दिन रिसर्च पूरा हुआ उसी दिन प्रसाद की पूड़ियाँ समाप्त हुईं। महाराज जी को सब पहले ही पता चल जाता था। ऐसी थी उनकी कृपा ।
डा. श्यामलाल कपूर जी बताते हैं कि आज़ाद भारत के उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत थे, जिन्हें उस समय प्रीमीयर कहा जाता था। उनके विश्वसनीय अधिकारी आईसीएस (अब आईएएस) चौधरी भगवान सहाय थे। मुख्यमंत्री पंत जी ने सहाय जी से जमींदारी उन्मूलन की स्कीम गुप्त रूप से बनाने के लिए कहा। हिदायत दी इसे आप खुद बनाइये, टाइप कीजिये । बिना किसी को दिखाए मुझे सीधे फ़ाइल दीजिए। सहाय जी स्कीम को लेकर काफी दुविधा में थे। उन्होंने अपने किसी संबंधी से कहा सोंच विचार में हूँ। उन्होंने कहा आप बाबा नीब करोरी के दर्शन कीजिये दुविधा दूर हो जाएगी। वे लाटूश रोड वाले घर पर बाबा से मिलने आये। महाराज जी बिना उनके बताए ही उनकी दुविधा समझ गए। महाराज जी ने उनका हाथ पकड़ा और ड्राइंग रूम में ले गए । कुछ देर बाद महाराज जी बाहर निकले और तख्त पर बैठ गए। सहाय जी आश्वस्त होकर चुपचाप वहां से चले गए। बहुत दिनों बाद कपूर जी को पता चला कि सहाय जी जमींदारी उन्मूलन स्कीम की सफलता को लेकर महाराज जी का आशीर्वाद लेने आये थे ।
जब एक नास्तिक व्यक्ति पूरी तरह से आस्तिक बन गया:
श्यामलाल कपूर जी के मामा सूरज नारायण मेहरोत्रा के एक घनिष्ठ मित्र थे कानपुर निवासी श्याम बिहारी टंडन । टंडन जी लखनऊ से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार के रिपोर्टर थे। घोर नास्तिक थे। अक्सर वह मामा से कहा करते कि तुम कहां बाबा टाबा के चक्कर में पड़े हो। कहां का ईश्वर है, कैसा ईश्वर है, सब झूठ है। अपने कामकाज पर ध्यान दो। बिना मतलब इनके चक्कर में न पड़ो। मामा जी उन्हें समझाते हुए कहते तुम एक बार बाबा से मिल लो किंतु वह टस से मस नहीं होते। मामा जी और टंडन जी की बड़ी गहरी मित्रता थी। सिवाय धार्मिक मुद्दे के बाकी हर मामले में दोनों के विचार एक रहते थे। एक दिन टंडन जी मामा से मिलने लाटूश रोड घर आये थे। संयोगवश उसी समय नीब करौरी बाबा घर में आये हुए थे। महाराज जी ने मुझसे कहा श्याम नीचे से पानी ले आ। नीचे टंडन जी आते दिखे। मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मुझसे पूछा सूरज कहां है। मैंने ऊपर की तरफ इशारा कर दिया। बाहर का दरवाजा खुला था। वह सीढ़ी से ऊपर दनदनाते चढ़ गए।
जैसे देखा महाराज जी बैठे हैं, पलट पड़े। अचानक महाराज जी झटके से उठे, उनका हाथ पकड़ा और ड्राइंग रूम के अंदर ले गए। कुछ देर बाद दोनों लोग बाहर निकले। बाबा हंसते हुए अपने स्थान पर बैठ गए। टंडन जी बाहर निकले तो भाव विह्वल होकर लगातार रोते रहे। वह रुके नहीं। फौरन नीचे उतर कर कानपुर लौट गए। आखिर महाराज ने क्या कृपा की कि उसके बाद टंडन जी और उनका पूरा परिवार महाराज जी का अनन्य भक्त बन गया। एक नास्तिक व्यक्ति पूरी तरह से आस्तिक बन गया ।
लखनऊ के हनुमान सेतु मंदिर का किस्सा जानकार दंग रह जायेंगे आप :
डा. श्यामलाल कपूर जी ने पूछने पर बताया कि महाराज जी ने अपना शरीर छोड़ने के बाद कभी अपने होने का एहसास आपको दिलाया कि नहीं। उन्होंने बताया हनुमान सेतु मंदिर के सचिव के रूप में जब मैं मंदिर में था । एक दिन एक लंबे चौड़े कद के बाबा मंदिर आये बोले- कौन देखभाल करता है। खाना खाना चाहता हूँ। कैंटीन बंद ही गयी थी। एक बजे के बाद का समय था। मैंने कहा बाबा कैंटीन बंद हो गयी है। मिठाई खा लेंगे। मैंने एक किलो मिठाई बाबा जी को दी। देखकर मन तृप्त हो गया। उन्होंने भोग लगाया और मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा हमेशा प्रसन्न रहिएगा। मेरे हाथ में कुछ दिया। मैंने देखा एक रुद्राक्ष था। यह प्रसंग मैंने कैंचीधाम में महाराज जी के अनन्य भक्त और उनके साथ रहे चौधरी केहर सिंह को सुनाया। उन्होंने कहा बाबा स्वयं आये थे।
डा. श्यामलाल कपूर ने बताया कि एक बार हनुमान सेतु मंदिर में काफी भीड़ थी । मंदिर के सेवक भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे। अचानक एक लंबे चौड़े व्यक्तित्व के संत दर्शन करने घुस आए। सेवकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन वह दर्शन करके बोले सब ठीक ठाक चल रहा है? उस दिन भी मुझे एहसास हुआ जैसे महाराज जी स्वयं आये हों। बाबा महाराज कपूर जी से कहा करते थे -तू कहीं रह तेरी सुध मुझे बनी रहती है। जब भी मुझे तेरी जरूरत होगी तुझे पकड़ लूंगा। उन्होंने बताया कि 1991 में राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान से रिटायर होने के कुछ वर्ष बाद हनुमान सेतु मंदिर में सचिव के रूप में जुड़कर सेवा करने का मौका मिला। मुझे लगा महाराज जी ने ही मुझे यह सेवा का अवसर दिया है। 81 वर्ष की आयु पूरी कर सचिव के दायित्व से मुक्त हुआ। 94 वर्ष की आयु में आज भी कपूर जी बिना किसी के सहयोग के प्रतिदिन हनुमान सेतु मंदिर जाकर विधिवत दर्शन पूजन करते हैं। अनेक भक्त उनका आशीर्वाद पाकर धन्य होते हैं।
तो प्रेम से बोलिए बाबा नीब करोरी महाराज जी की जय







