नीब करोरी बाबा की महिमा न्यारी है। भक्तजनों की माने तो बाबा की कृपा से सभी बिगड़े काम बन जाते हैं। यही कारण है कि बाबा के बनाए सारे मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।
नीब करोरी धाम को बनाने के संबंध में कई रोचक कथायें प्रचलित हैं। बताया जाता है कि 1962 में जब बाबा ने यहां की जमीन पर अपने कदम रखे तो जनमानस को हतप्रभ कर दिया। एक कथा के अनुसार माता सिद्धि और तुला राम के साथ बाबा किसी काम से रानीखेत से नैनीताल जा रहे थे, अचानक कैंची धाम के पास उतर गए। इसी बीच उन्होंने तुलाराम को बताया कि श्यामलाल अच्छा आदमी था, तुलाराम को यह बात अच्छी नहीं लगी, क्योंकि श्यामलाल उनके समधी थे। भाषा में ज्येष्ठ के प्रयोग से वे बहुत बेरुखे हो गए और गंतव्य स्थान की और चल दिए। कुछ समय के बाद ही उन्हें जानकारी मिली कि उनके समधी का निधन हो गया। यह चमत्कार ही था कि बाबा ने पहले ही जान लिया कि उनके समधी का बुलावा आ गया है। एक दूसरी घटना के अनुसार 15 जून को आयोजित विशाल भंडारे के दौरान घी कम पड़ गया। बाबा के आदेश पर पास की नदी का पानी कनस्तरों में भर कर प्रसाद बनाया जाने लगा। प्रसाद में डालते ही पानी अपने आप आप घी में बदल गया। इस चमत्कार से भक्त जन नतमस्तक हो गए। तभी से उनकी आस्था और विश्वास नीम करोली बाबा के प्रति बना है।

इसी तरह एक दूसरा किस्सा है वैसे तो उत्तराखंड में बाबा नीम करोरी महाराज की कई कथाएं प्रचलित हैं. लोगों के मुताबिक बाबा 1940 के आस-पास उत्तराखंड के प्रवास पर थे. भवाली से कुछ किलोमीटर आगे जाने के बाद बाबा करोरी एक छोटी सी घाटी के पास रुके और सड़क किनारे बनी पैरापट पर बैठ गए. सामने पहाड़ी पर दिखाई दिए एक आदमी को उन्होंने आवाज दी पूरन…ओ पूरन…पूरन यहां आओ. पूरन नीचे आया और कम्बल लपेटे अजनबी से अपना नाम सुनकर अचंभित रह गया. अजनबी व्यक्ति ने मुस्कराते हुए कहा ‘अचरज मत कर मैं तुझे पिछले कई जन्मों से जानता हूं. मेरा नाम बाबा नीम करोरी हैं. हमें भूख लगी है. हमारे भोजन की व्यवस्था कर’ ।
पूरन ने घर जाकर अपनी मां से बताया कि नीचे पैरापट पर बाबा नीम करोरी बैठे हैं और भोजन मांग रहे हैं. घर में दाल-रोटी बनी थी. पूरन की मां ने वही परोस दी. बाबा ने भोजन के बाद पूरन से गांव के दो-तीन लोगों को बुलाकर लाने को कहा. बाबा उन सब को लेकर नदी के पार जंगल में गये और उनसे एक जगह खोदने को कहा. बाबा ने कहा- पत्थर को खोदो, यहां गुफा है, गुफा में धूनी है. अचरज में पड़े लोगों ने जब उस जगह को खोदा तो ऐसा लगा कि जैसे गुफा में धूनी किसी ने अभी ही लगाई हो, धुनी के पास चिमटा भी गड़ा था. पूरन और गांव वाले हैरान थे कि उन्हें यहां पूरा जीवन हो गया और किसी को इस गुफा के बारे में पता नहीं था।
‘पत्थरों के नीचे गुफा, धूनी और चिमटा, हवन कुण्ड की जानकारी किसी साधारण व्यक्ति को तो हो नहीं सकती. कंबल लपेटे यह कोई आम इंसान नहीं है’ लोग यही सोच रहे थे कि बाबा बोल पड़े, कि हमारे पास कोई चमत्कार-वमत्कार नहीं है. चलो अब यहां से यहां हनुमान जी बैंठेंगे . बाबा ने नदी से पानी मंगवाया और स्थान का शुद्धिकरण किया. साथ ही वहां कुटिया नुमा जगह बना दी. कुछ दिन बाद बाबा ने पूरन को बताया कि यह सोमवारी बाबा की तपस्थली है. इसका पुनरुद्धार करना है. यही कुटिया आज कैंचीधाम के रूप में विख्यात है।







