नवी की खुशियों में आप सब शामिल होइये
क्यों और कैसे मनाई जाती है नवी
अजादारी को गिनीज बुक में दर्ज होने का रास्ता बनी नवी को जानने की जिज्ञासा
भारतीय मूल्य के दो क़रीबी विदेशी मित्रों से आज मुलाकात हुई। एक- हाॅलेंड के वरुण और दूसरी फिज़ी की मनीषा। आठवीं रबीउल अव्वल (अजादारी का आख़िरी दिन) की मसरूफिरत (व्यस्तता) के कारण इनको ज्यादा समय नहीं दे सका। मित्रों ने कल मिलने की बात की तो मैंने बताया परसों बैठा जायेगा। कल नवी का त्योहार है। नवी सुनकर दोनो ने कहा कि इस त्योहार के बारे में तरह-तरह की बाते सुनी है। बड़ी जिज्ञासा है इस त्योहार को जानने की। क्यों और कैसे मनाया जाता है?

मैने नवी के त्योहार की विस्तृत जानकारी दी। जिसके लिए मुझे मोहर्रम यानी अजादारी के बारे में बताना जरूरी था। क्योंकि जिस तरह दशहरे की जानकारी रामलीला से मिलती है। ईद का महत्व बताने के लिए रमज़ान का महत्व बताना जरूरी है, वैसे ही नवी का अर्थ मोहर्रम से जुड़ा है।
इसलिए जब मैने मोहर्रम की तफ्सील बतायी तो वो दोनो बोले कि सबसे लम्बी अवधि के धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठान अय्यामें अज़ा तो गिनीज बुक आफ रिकॉर्ड में दर्ज हो सकता है।
दर अस्ल मेरे ये दोस्त गिनीज बुक आफ रिकार्ड के रिसर्चर हैं। तमाम अद्भुत और बेमिसाल /अद्वितीय जानकारियां गिनीज बुक को दे चुके हैं।
मैंने बताया कि मुसलमानों में भी अल्पसंख्यक शिया मुसलमान मोहर्रम के ग़म में दो महीने आठ दिन तक के अनुष्ठान में समर्पित हो जाते है। इसे त्योहार तो नहीं कहेंगे लेकिन दुनिया का पहला इतनी लम्बी अवधि का धार्मिक – सांस्कृतिक अनुष्ठान है अजदारी(अय्यामें अज़ा)।साम्प्रदायिक सौहार्द, कला, साहित्य और शिल्पकारी से सजा ये संस्कृति- धार्मिक अनुष्ठान पूरी आज़ादी और सहयोग से करने का मौका दुनिया के किसी इस्लामी मुल्क में भी नहीं मिलता। केवल भारत ने ही सवा दो महीने के अजादारी के भव्य आयोजनों को मनाने की आजादी दी है। दो महीने आठ दिन तक लगातार पूरे जोश-ख़रोश के साथ भारत के कोने-कोने में ना सिर्फ अजादारी के आयोजन/जुलूस निकालने की स्वतंत्रता है बल्कि भारत में इन धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा और सम्मान भी मिलता है।
राम-कृष्ण ने सिर्फ हिन्दुओ या हिन्दुत्व के लिए असत्य के खिलाफ सत्य की लड़ाई नहीं जीती थी। ईसा और नानक ने भी ईसाइयों या सिक्खों के लिए ही कुर्बानियां नहीं दी थीं। इन सबके हर योगदान का उद्देश्य दुनिया में इंसानियत को जिन्दा रखकर इंसानों को जियो और जीने दो का मैसेज देना था।

मोहम्मद साहब के बाद इस्लाम के मूल मक़सद इन्सानियत के पैगाम को अरब का एक मुस्लिम शासक यज़ीद आतंकवाद में बदल देना चाहता था। यजीद के इस गलत इरादों को मोहम्मद साहब के नाती ईमान हुसैन पूरा नहीं होने देते। इसलिए यजीद ने दुनिया की पहली आतंकवादी घटना को अंजाम देते हुए हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 रिश्तेदारों, दोस्तों और समर्थकों को इतने दर्दनाक तरीके से शहीद किया कि जिसकी मिसाल 1400 वर्षौ में कभी भी नहीं मिली।
आतंकवाद के खिलाफ पहली सबसे ऐतिहासिक जंग में ईमाम हुसैन तमाम ज़ुल्म-ज्यादतिया सह कर शहीद होकर भी यजीदी आतंकवाद को परास्त करने में कामयाब हो गये। और इंसानियत पसंद इस्लाम को उन्होंने बचा लिया।
दुनिया के हर इंसान को आतंकवाद से निजात दिलाने के लिए कर्बला की त्रासदी को याद करने के लिए मोहर्रम (इमाम का शहादत दिवस) मनाया जाता है।

लखनऊ के नवाबों ने मोहर्रम को सवा दो महीने का विस्तार दिया। इसे धर्म तक सीमित ना रखकर इसे एक संस्कृति का रुप दिया और इससे हर धर्म समुदाय को जोड़ा।
लेकिन लम्बा शोक शियो तक ही सीमित है। 1857 के बाद से लखनऊ के शियों ने सवा दो महीने ईमान हुसेन का शोक मनाना शुरू किया। जिसके बाद इस परम्परा का देश दुनिया में विस्तार हुआ।
शोक के दौरान शिया खुश रंग कपड़े नहीं पहनते हैं। शादी विवाह, जन्म दिन जैसी खुशियों में शरीक नहीं होते हैं। मनोरंजन इत्यादि से दूर रहते है। यहां तक इतनी लम्बी अवधि तक अच्छा खानपान/पकवान भी नहीं पकाते है। इस्लामी माह मोहर्रम की एक तारीख से शुरु आठ रबीउल अव्वल को यानी सवा दो महीने बाद ये शोक खत्म होता है। अगले दिन नौ रबी उल अव्वल को नवी मनायी जाती है। इस दिन ही हुसैन और उनके साथियों पर जुल्म ज्यादतियों करके उन्हें शहीद करने वाले यजीदियों को सज़ा मिली थी।
नवी के त्योहार के दिन आतंकवाद के प्रतीक यजीद का पुतला जला कर खुशियां मनायी जाती हैं। सवा दो महीने के बाद शिया खुशरंग (लाल, पीले, भगवा) रंग के नये कपड़े पहनते हैं। घरों में पकवान पकते है। सवा दो महीने बाद कढ़ाई चढ़ती है। मनोरंजन के कार्यक्रम होते है। मेले लगते हैं और बच्चों को ईदी जी जाती है।
आतंकवाद विरोधी ये त्योहार दशहरे की तर्ज पर इस्लाम के आतंकवाद विरोधी चेहरे को पेश करता है। इसलिए इस पर्व को केवल शियों तक सीमित ना रखकर ना सिर्फ हर मसलक को बल्कि हर धर्म के हर इंसान को मनाना चाहिए है। आतंकवाद से नफरत करने वालों और इंसानियत पसंद हर इंसान का त्योहार है नवी, नाकि सिर्फ शियों का।
-नवेद शिकोह







