पृथ्वी की घटती जलधारण क्षमता को बढ़ाने के लिए जीवांश की मात्रा बढ़ाना जरूरी
बढ़ती आबादी से अधिक उत्पादन के बढ़ते दबाव के बीच नीचे गिरता जल स्तर चिंता का विषय है। यदि यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में शहर से लेकर गांव तक पानी के लिए हाहाकार मच जाएगा। सबसे पहले तो जरूरत है बारिश के बूंदों को बचाने की। इसके लिए जरूरी है कि मिट्टी में कम होती जीवांश की मात्रा को रोककर उसकी जलधारण क्षमता को बढ़ाया जाय, वरना वह दिन दूर नहीं, जब लोग बे-पानी हो जाएंगे।
ये बातें “कल के लिए जल” मिशन के राष्ट्रीय संयोजक चंद्र भूषण पांडेय ने कही। उन्होंने कहा कि मिट्टी में घटा जीवांश एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इसमें जीवांश की कमी के कारण जल धारण क्षमता घटती जा रही है। इस कारण आवश्यक है कि जैविक खेती को उसी तरह जन आंदोलन बनाया जाय, जैसे स्वच्छता को जन आंदोलन बढ़ाया गया। मिट्टी में जीवांश की मात्रा को एक निश्चित समय अवधि में पूरा करने का मिशन लागू किया जाय।
उन्होंने कहा कि गांव का गांव में, खेत का खेत में पानी रोकने की व्यवस्था जरूरी है। इससे पानी का स्तर नीचे जाने से रोका जा सकता है। चंद्र भूषण पांडेय ने हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि बढ़ती आबादी तालाबों और पोखरों के अस्तित्व को ही समाप्त प्राय कर दिया है। यह जरूरी है कि एक जन आंदोलन कर तालाबों व पोखरों का पुनरूद्धार कराया जाय।
चंद्र भूषण पांडेय ने बताया कि सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली यथा टपक एवं फव्वारा प्रणाली का अधिकतम प्रचार-प्रसार तथा विस्तार किया जाय। उन्होंने कहा कि कुल वर्षा की मात्रा बढ़ाने के लिए मैदानों में 33 प्रतिशत वनावरण तथा पहाड़ों पर 66 प्रतिशत वनावरण सुनिश्चित होना चाहिए। इसमें अष्ट पौधरोपण अभियान में शामिल पीपल, पाकड़, बरगद, गूलर, आम, नीम, इमली, महुआ के रोपण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।







