महामारी के बीच मनुष्य

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  • अंशुमाली रस्तोगी
हम एक कठिन समय के बीच आन फंसे हैं। महामारी ने हमें तोड़कर रख दिया है। हमारे कितने ही प्रिय लोग हमें छोड़कर जा चुके हैं। कब किस क्षण किसके बारे में क्या सूचना मिल जाए, कुछ नहीं कह सकते। जीवन अनिश्चित ही नहीं अप्रत्याशित भी हो गया है। धीरे-धीरे कर बहुत कुछ ऐसा है जो हमसे छूटता चला जा रहा है। अब तो दुओं में भी असर न रहा। ताकतवर ईश्वर भी फेल है। आस्थाएं निरंतर धूल-धूसरित हो रही हैं। चाहे कोई देश हो, हाल सबका एक जैसा है।
मानव-जाति पर अब तक का सबसे बड़ा संकट आया हुआ है। बल्कि यह कहना अधिक मुनासिब होगा कि मानव ने इस संकट को खुद बुलाया है। यह महामारी प्राकृतिक आपदा नहीं, मानव निर्मित है। मानव ही इससे जूझ रहा है। कहीं वैक्सीन की खोज चल रही है तो कहीं जान बचाने की जुगत। इस इंतजार में ही हर दिन फ़ना हो रहा है कि इस बीमारी से निजात किस घड़ी मिलेगी।
कहा जा रहा है कि बीमारी के निपट जाने के बाद मानव में बहुत-से बदलाव दिखाई देंगे। बहुत-सी चीजें करना वो त्यागेगा। बहुत-सी नई चीजें अपनाएगा। जीवन ही नहीं दिनचर्या भी परिवर्तित हो जाएगी। क्या लगता है मानव ऐसा कुछ कर पाएगा? खुद को वो बदलेगा?
मानव दरअसल अपने स्वभाव में इतना काइया है कि वो बदल ही नहीं सकता। वो ऊपर से बदल सकने का ढोंग कितना ही कर ले किंतु भीतर से जस-का-तस ही रहेगा। एक-दूसरे के प्रति बैर रखना, छल-कपट रखना, ऊंच-नीच का भेदभाव रखना वो कभी बंद नहीं कर सकता। शक उसके नेचर में है। स्त्री को वो कुछ मानता नहीं। गरीब को वो कुछ समझता नहीं। दलितों से भेदभाव करता है। स्वतंत्र विचार को अपने मध्य जगह दे नहीं सकता। धर्म और ईश्वर के प्रति अंधविश्वास से खुद को दूर कर नहीं सकता। कितना हास्यास्पद है कि इतनी बड़ी आपदा में भी उसे ईश्वर चाहिए।
तो फिर ऐसा क्या बदलेगा मानव के बीच जिसे मनुष्य-जाति के लिए सकारात्मक संकेत माना जाए। बल्कि आपदा के बीच चीजें मुझे और बिगड़ती हुई नजर आ रही हैं। भेदभाव और गहराया है। आपस में शक और बढ़ा है। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हम किसी के करीब जाकर उसे सहारा नहीं दे सकते। दो घड़ी उसके पास बैठ नहीं सकते। बस दूर से ही बात कर सकते हैं।
अभी यह बता पाना मुश्किल है कि ऐसा कब तक चलेगा लेकिन जब तक चलेगा तब तक मानव के पास से बहुत कुछ छूट चुका होगा।

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