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    Home»इंडिया

    मेंढ़कों को तोलना जैसी चुनौती विपक्षी गठबंधन

    ShagunBy ShagunJune 1, 2023 इंडिया No Comments5 Mins Read
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    नवेद शिकोह

    आगामी लोकसभा चुनाव में बिना मजबूत गठबंधन के भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को चुनौती देना बेहद जटिल है। देश में विपक्षी एकता के प्रयासों में तमाम बाधाएं हैं पर यूपी में विपक्षियों की एकजुटता सबसे कठिन है। यहां सबसे बड़े विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव कांग्रेस से दूरी बनाएं हैं और बसपा तो सत्तारूढ़ भाजपा से ज्यादा सपा पर हमलावर होती रहती है। बसपा को कांग्रेस भी फूटी आंख नहीं भांती। कांग्रेस सपा और भाजपा को एक नागनाथ और एक सांप नाथ कह रही है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी कह चुके हैं कि भाजपा और कांग्रेस एक जैसे हैं।

    सौतनों के बीच कटु रिश्तों वाले विपक्षी दलों की आपसी कलह के बीच इन्हें एकता के सूत्र में कैसे बांधा जाएगा? गठबंधन या महागठबंधन की बात करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार जैसे दिग्गजों के पास फिलहाल ऐसे सवाल का कोई जवाब नहीं है।

    लेकिन फिर भी कांग्रेस सहित तमाम क्षत्रप विपक्षी एकता की आशा के साथ भाजपा को धूल चटाने के बयान दे रहे हैं। दिल्ली, पश्चिम बंगाल और पंजाब सहित तमाम राज्यों में गठबंधन का तालमेल कैसे तैयार होगा?
    इन सबमें सबसे अधिक कलह अस्सी लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश के विपक्षी दलों के बीच है। यहां समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ समझौता कर दस-पंद्रह सीटों का भी त्याग करना नहीं चाहती।

    Image

    बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही कह चुकी हैं कि उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी। मायावती सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस पर आरोप भी लगा चुकीं हैं कि विपक्षी एकता का राग अलापने वाले बसपा को नजरंदाज करते रहे हैं। यहां तक कि राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षियों की लॉबिंग में उनकी पार्टी से संपर्क तक नहीं किया गया था। कुछ महीने पहले बसपा के एक प्रवक्ता ने गठबंधन में शामिल होने की एक शर्त का इशारा करते हुए कहा था कि बहन को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जाए।‌

    दरअसल लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय परिवेश में कांग्रेस की बड़ी एहमियत है लेकिन यूपी में 2022 के विधानसभा चुनाव में तकरीबन दो फीसद उसका वोट आने के बाद सपा ने कांग्रेस को कुछ ज्यादा ही नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया। कांग्रेस, सपा और बसपा की दूरियों के और भी कई बड़े कारण है।

    ये सारे दल अलग-अलग चुनावों में भाजपा को चुनौती देने के लिए गठबंधन का धर्म निभाने के बाद भी परास्त हो चुके हैं। विछले लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के बाद भी भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस का हाथ थामा फिर भी ये गठबंधन ओंधे मुंह गिरा।

    ऐसे कई प्रयोगों के खराब अनुभव के बाद हालिया यूपी निकाय चुनाव में ये तीनों दल अलग-अलग लड़े तो भाजपा विरोधी वोट ख़ासकर मुस्लिम समुदाय का वोट बुरी तरह बिखरा और भाजपा खूब फायदे में रही।

    अब अंदरखाने से आने वाली खबरों के मुताबिक सपा गठबंधन के एकमात्र सहयोग राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष जयंत चौधरी अखिलेश यादव पर कांग्रेस से गठबंधन करने का दबाव डाल रहे हैं। अनुमान ये भी लगाया जा रहा है कि अखिलेश यादव नहीं मानें तो कांग्रेस, रालोद मिलकर यूपी में गठबंधन की एक नई केमिस्ट्री तैयार कर बसपा सुप्रीमो मायावती के समक्ष प्रस्ताव रखें सकते हैं। ऐसे में मुस्लिम, जाट और दलित कॉम्बिनेशन के साथ कांग्रेस, बसपा और रलोद गठबंधन भाजपा को चुनौती देने और सपा को अलग-थलग करने की रणनीति एक नया प्रयोग हो सकती है।

    हांलांकि यहां बसपा को साथ लाने की कल्पना साकार होना बहुत मुश्किल है। इसकी वजह एक आम परसेप्शन को सच के करीब लाती है। कुछ लोगों की धारणा है कि पुराने मामलों की जांच के डर से भाजपा के खिलाफ बसपा मजबूती से लड़ने में झिझकती है। कुछ ऐसा ही डर सपा का भी है।

    हांलांकि सबसे बड़ी वजह ये है कि यूपी के क्षेत्रीय दलों को डर रहता है कि कांग्रेस को मौका देने से यदि वो उभर गई तो उसका वोटबैंक हाथ से निकल जाएगा। ख़ासकर सपा जो बीस फीसद यूपी के मुस्लिम वोट बैंक पर अपना एकक्षत्र राज समझती है वो कांग्रेस को एक बार जरा भी मजबूती देने के बाद धीरे-धीरे कांग्रेस को समर्पित हो सकता है। यही कारण है कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव चाहते हैं कि जिस तरह पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने चुनाव लड़कर भी तृणमूल कांग्रेस को वाकओवर दे दिया था ऐसे ही आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस यूपी को त्याग दे। और सपा को वाक ओवर दे। इसके बदले अमेठी-रायबरेली और दो-तीन अन्य सीटों पर सपा उसका सहयोग कर दे।

    कुल मिलाकर यूपी में ख़ासकर के विपक्षियों की एकजुटता आसान नहीं है। अभी विधानपरिषद की दो सीटों पर चुनाव में ओमप्रकाश राजभर और रघुराज प्रताप सिंह ”राजा भइया’ की पार्टियों ने भाजपा के उम्मीदवारों को वोट दिया लेकिन सपा के प्रत्याशियों का साथ रालोद के सिवा किसी ने नहीं दिया। सपा से दूरी बनाते हुए कांग्रेस और बसपा इस चुनाव से बाहर रहे। कांग्रेस ने कहा कि अखिलेश यादव ने उनके विधायकों से वोट की गुजारिश तक नहीं की। बल्कि कांग्रेस के एक प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने तो यहां तक कह दिया कि हम विधानपरिषद की दो सीटों के इस चुनाव से इसलिए दूर रहें क्योंकि लड़ने वाली दोनो पार्टियों (भाजपा और सपा) में एक नागनाथ और दूसरा सांप नाथ।

    कांग्रेस, सपा और बसपा एक दूसरे को ही धुरविरोधी मान रहे हैं। ऐसे में बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार हों, कांग्रेस हाईकमान हों, ये लोग सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत भाजपा से लड़ने के लिए विपक्षी दलों की एकता कैसे स्थापित करेंगे। हांलांकि रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी से उम्मीद की जा रही है कि वो भाजपा से लड़ने वाले अस्त-व्यस्त शस्त्रों को एक तरकश में लाने का कोई नया गुल खिला सकते हैं। हांलांकि ये प्रयास सौतों की एकता या मेंढ़कों को तोलने जैसा जटिल काम है।

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