जोश बोव्स ने उजागर किए पाकिस्तान के अत्याचार: 785 जबरन गायब, 121 हत्याएं
- प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 158वां स्थान, ईशनिंदा केस में 300% वृद्धि
- ईयू जीएसपी+ स्थिति पर खतरा, पश्तूनों के 4000 लापता
जिनेवा। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) की 60वीं सत्र की 34वीं बैठक में अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक शोधकर्ता जोश बोव्स ने पाकिस्तान में हो रहे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों और बलूचिस्तान के संकट को उजागर किया। बोव्स ने यूएन महासभा में हुई इस बैठक में पाकिस्तान की जीएसपी+ स्थिति पर यूरोपीय संघ (ईयू) की टिप्पणियों का हवाला देते हुए बलूचिस्तान में जारी अत्याचारों पर चिंता जताई।
उन्होंने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान में मानवाधिकारों के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करने और बलूचिस्तान के संकट पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है। बोव्स ने अपने संबोधन में पाकिस्तान की खराब स्थिति का जिक्र किया। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2025 में पाकिस्तान 158वें स्थान पर है, जो पत्रकारों पर दबाव और मीडिया की स्वतंत्रता पर संकट को दर्शाता है।
धार्मिक स्वतंत्रता पर यूएससीआईआरएफ की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, ईशनिंदा के आरोप में 700 से अधिक लोग जेल में हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 300 प्रतिशत की वृद्धि है।
बोव्स ने बलूचिस्तान में बलूच लोगों पर हो रहे अत्याचारों का विवरण देते हुए बताया कि बलूच नेशनल मूवमेंट की मानवाधिकार इकाई पांक ने 2025 की पहली छमाही में 785 लोगों के जबरन गायब किए जाने और 121 हत्याओं को दर्ज किया है। वहीं, पश्तून नेशनल जिरगा के अनुसार, 2025 में अभी भी 4000 से अधिक पश्तून लापता हैं।
ईयू ने पाकिस्तान की जीएसपी+ स्थिति पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि मानवाधिकार उल्लंघनों के बावजूद व्यापारिक लाभ मिल रहे हैं। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि ईयू को निगरानी मजबूत करनी चाहिए और यूएनएचआरसी को ईयू के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए।
बैठक में अन्य वक्ताओं ने भी बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सैन्य अभियानों, अतिरिक्त-न्यायिक हत्याओं और जबरन गायब करने की निंदा की।
यह मामले गंभीरता की ओर ले जाते हैं ?
वैश्विक दबाव: पाकिस्तान पर ईयू और यूएन का बढ़ता दबाव जीएसपी+ लाभ को खतरे में डाल सकता है।
आंकड़ों की भयावहता: जबरन गायब और हत्याओं के आंकड़े मानवाधिकार संकट की गहराई दिखाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: भारत सहित कई देशों ने पाकिस्तान की आलोचना की, जो क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा सकती है।
बता दें कि यह घटना पाकिस्तान के मानवाधिकार रिकॉर्ड को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेनकाब करती है। बलूच और पश्तून समुदायों के दर्द को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या ईयू और यूएन ठोस कदम उठाएंगे, या यह सिर्फ बयानबाजी साबित होगी? वैश्विक समुदाय को अब कार्रवाई की घड़ी है!







