मुंबई, 12 जुलाई : भोजपुरी सिनेमा के मशहूर सिंगर और एक्टर पवन सिंह ने महाराष्ट्र में गैर-मराठी भाषियों के साथ हो रहे विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और उसके नेता राज ठाकरे को करारा जवाब देते हुए कहा, “मैं मराठी नहीं बोलता, मुंबई में रहता हूं और यहीं काम करूंगा। क्या वे मुझे जान से मार देंगे? यह कैसा नियम है कि मराठी बोलना ही चाहिए?”
पवन सिंह ने हिंदी और भोजपुरी भाषियों के सम्मान और अधिकार की बात करते हुए कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को देश में कहीं भी रहने और काम करने की आजादी देता है। उन्होंने MNS के कथित गुंडागर्दी और धमकियों की निंदा की और अपने बयान में स्पष्ट किया, “मैं मर जाऊंगा, शहीद हो जाऊंगा, लेकिन मराठी नहीं बोलूंगा। मुंबई में काम करता रहूंगा।”
क्या है विवाद की पृष्ठभूमि :
यह विवाद महाराष्ट्र में मराठी भाषा और संस्कृति को लेकर चल रही बहस का हिस्सा है। MNS और कुछ स्थानीय संगठन लंबे समय से गैर-मराठी भाषियों, खासकर हिंदी और भोजपुरी भाषियों, पर मराठी बोलने का दबाव बनाते रहे हैं। हाल ही में, पवन सिंह के इस बयान ने सोशल मीडिया पर तूफान ला दिया है, जहां उनके समर्थक उनकी बेबाकी की तारीफ कर रहे हैं। कई X पोस्ट्स में उनके बयान को साहसिक बताते हुए लिखा गया, “मुंबई सिर्फ एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदीभाषियों के सपनों की जमीन है।”
भाषा के आधार पर किसी पर दबाव डालना गलत : पवन सिंह
पवन सिंह ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि भाषा के आधार पर किसी पर दबाव डालना गलत है। उन्होंने इसे “घमंड” करार देते हुए कहा, “मराठी हो या भोजपुरी, सभी भाषाएँ बराबर हैं।” उनके इस बयान को लेकर सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध दोनों देखने को मिल रहे हैं। कुछ लोग इसे हिंदी भाषियों के आत्मसम्मान का प्रतीक मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे मराठी संस्कृति के खिलाफ बयानबाजी बता रहे हैं।
यूजर्स ने कहा यह है बाघ का करेजा :
X पर कई यूजर्स ने पवन सिंह के बयान को साझा करते हुए इसे “बाघ का करेजा” और “हिंदी भाषियों की आवाज” बताया। एक यूजर ने लिखा, “पवन सिंह ने अपनी मातृभाषा की बात की, न कि किसी की तौहीन। MNS के गुंडे किस हक से धमकाते हैं?” वहीं, कुछ यूजर्स ने इसे भाषाई विवाद को और भड़काने वाला बयान माना।
क्या है मुद्दा?
पवन सिंह का यह बयान उस समय आया है, जब महाराष्ट्र में गैर-मराठी भाषियों के खिलाफ कथित हिंसा और धमकियों की खबरें सामने आ रही हैं। हाल ही में, मुंबई में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में लागू करने के सरकारी फैसले के खिलाफ प्रदर्शन हुए, जिसमें MNS की सक्रिय भूमिका रही। पवन सिंह का बयान इस बहस को और गर्म करने वाला साबित हो सकता है।
पवन सिंह का यह बयान भाषाई सभी भारतीयों के समान अधिकारों की बात करता है :
भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी भाषा और संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार देता है। पवन सिंह का यह बयान भाषाई स्वतंत्रता और मुंबई जैसे महानगर में सभी भारतीयों के समान अधिकारों की बात करता है। हालांकि, इस तरह के बयानों से भाषाई और क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
पवन सिंह का यह बयान न केवल उनके साहस को दर्शाता है, बल्कि यह भाषाई विविधता और एकता के सवाल को भी सामने लाता है। मुंबई, जो भारत की आर्थिक राजधानी है, हमेशा से विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं का संगम रही है। पवन सिंह का यह बयान इस बहस को नई दिशा दे सकता है कि क्या भाषा के आधार पर किसी को काम करने या रहने से रोका जा सकता है।
MNS क्यों हिंदी विरोध पर तुला है :
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS), राज ठाकरे के नेतृत्व में, मराठी भाषा और महाराष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के नाम पर हिंदी के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए है।
इसके प्रमुख कारण:
- मराठी अस्मिता: MNS का मानना है कि हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य तीसरी भाषा बनाना (NEP 2020 के तहत) मराठी को कमजोर करता है। वे हिंदी को “थोपी गई” भाषा मानते हैं।
- राजनीतिक रणनीति: हिंदी विरोध के जरिए MNS मराठी मतदाताओं को एकजुट कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करता है, खासकर स्थानीय चुनावों में।
- क्षेत्रीयता का मुद्दा: MNS हिंदी को “बाहरी” भाषा के रूप में देखता है और मराठी को महाराष्ट्र में प्राथमिकता देने की मांग करता है।
- विवादास्पद कार्रवाइयाँ: MNS कार्यकर्ताओं द्वारा हिंदी भाषियों, खासकर उत्तर भारतीय दुकानदारों, पर हमले और धमकियाँ (जैसे, मीरा-भायंदर और पुणे में) इस विरोध को और भड़काती हैं।
बता दें कि MNS का हिंदी विरोध क्षेत्रीयता और मराठी गौरव की राजनीति से प्रेरित है, लेकिन इसकी आक्रामकता भाषाई तनाव को बढ़ाती है। यह विवाद राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अस्मिता के बीच संतुलन की जरूरत को उजागर करता है।







