अब केंद्र से टकराव की नहीं, सहयोग की राजनीति: केजरीवाल

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आम आदमी पार्टी की जीत लोकतंत्र की जीत है ये साबित करती है के काम के नाम पर भी जीत हो सकती है, ये साबित करती है के अगर आप जनता के बुनियादी मुद्दों पर काम करेंगे तो जनता आपका साथ देगी। -सांसद संजय सिंह


पिछली बार अरविंद केजरीवाल ने गाना गाया था इन्सान का इनसान से हो भाईचारा, यही पैग़ाम हमारा। आज रामलीला मैदान में तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने गाया – हम होंगे कामयाब , हम चलेंगे साथ-साथ, नहीं डर किसी का आज, होगी शांति चारों ओर । संदेश साफ़ है। सुर बदले हैं, बोल बदले हैं। अब केंद्र से टकराव की नहीं, सहयोग की राजनीति। प्रधानमंत्री के प्रति आलोचना नहीं, सम्मान। बहुत मुमकिन है कि इसी सोच के तहत केजरीवाल ने अपने शपथग्रहण समारोह को नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ विपक्ष की मोर्चेबंदी का मंच नहीं बनने दिया।
दिल्ली का बेटा कहना कहीं न कहीं 2014 के मोदी के बनारस वाले बयान की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने ख़ुद को गंगा का बेटा कहा था और कहा था मुझे गंगा माँ ने बुलाया है। मानें न मानें, अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के व्यक्तिकेंद्रित राजनीति के माॅडल और पर्सनालिटी कल्ट को बारीकी से फ़ालो कर रहे हैं।
भाषण दिलचस्प था। माँ के प्यार से लेकर श्रवणकुमार तक की उपमाएँ आ गईं। अरविंद ने फ़्री की राजनीति की आलोचना करने वालों को यह कह कर दिलचस्प जवाब दिया कि प्यार फ़्री होता है।
अरविंद केजरीवाल ने इस बार अपनी राजनीति में बहुत चतुराई से कुछ तत्वों का मिश्रण किया है। एक तरफ़ तो बिजली-पानी-शिक्षा-स्वास्थ्य-महिला सुरक्षा के मुद्दों पर जनकल्याणकारी नीतियाँ अपना कर कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभाई है जो अब बाक़ी राज्यों की सरकारों के लिए भी कहीं न कहीं चुनौती बनने जा रही है।  सर्वधर्म समभाव की प्रतीकात्मक राजनीति अपना कर और अपने विपक्षियों के ख़िलाफ़ भी हिंसक बयानबाज़ी से दूर रहकर अपना काम बख़ूबी निकाला। अरविंद केजरीवाल अपनी कामयाबी और उसके बाद नये सिरे से ज़ोर मारने वाली अपनी महत्वाकांक्षा के चलते अब विपक्ष की राजनीति में बेहतर सौदेबाज़ी की पोज़ीशन में हैं और वह इसका फ़ायदा ज़रूर लेना चाहेंगे।
आपकी बात एफबी के साथ: अमिताभ श्रीवास्तव 

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