उपभोक्ता परिषद का दावा : बिजली कंपनियों की मुश्किलें बढ़ना तय
लखनऊ : दीवाली की रौनक के बीच बिजली का ‘काला चिट्ठा’ खुलने से उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन (UPPCL) और पांचों बिजली कंपनियों के मैनेजमेंट में खलबली मच गई है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक साधारण स्मार्ट प्रीपेड मीटर, जो तकनीकी क्रांति का प्रतीक होना चाहिए, गरीब उपभोक्ताओं की जेब काटने का हथियार बन जाए? उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने ठीक यही आरोप लगाते हुए विद्युत नियामक आयोग में ‘बम’ फोड़ दिया है उन्होंने कॉस्ट डाटा बुक की अवमानना का नया केस दाखिल कर दिया गया है। इसमें कंपनियों पर 3-4 करोड़ रुपये की अनधिकृत वसूली और स्मार्ट मीटर को जबरन थोपने का इल्जाम है। आयोग ने सुनवाई की तारीख तय करने का आदेश जारी कर दिया है, और अब कानूनी तीर बिजली बाबुओं की गर्दन पर अटक गया है!
क्या है यह ‘स्मार्ट घोटाला’?
अनधिकृत वसूली का खेल: कॉस्ट डाटा बुक के मुताबिक, 1 किलोवाट का नया कनेक्शन गरीब BPL उपभोक्ताओं को सिर्फ 872 रुपये में मिलना चाहिए। लेकिन कंपनियां स्मार्ट प्रीपेड मीटर के नाम पर 6,016 रुपये वसूल रही हैं – यानी 6 गुना ज्यादा! इससे हजारों परिवार दीवाली पर अंधेरे में रह गए, क्योंकि नया कनेक्शन लेना अब ‘लक्जरी’ हो गया।
जबरन कन्वर्जन का डर: 20 लाख से ज्यादा मीटरों को उपभोक्ताओं की सहमति के बिना पोस्टपेड से प्रीपेड में बदल दिया गया। नतीजा? बिल न भरने पर कनेक्शन कट जाता है, और रीस्टोर में 8-10 घंटे लग जाते हैं – जबकि वादा था 2 घंटे का!
कानून की अवहेलना: विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) साफ कहती है – उपभोक्ता को पोस्टपेड या प्रीपेड चुनने का हक है। लेकिन UPPCL ने आयोग की मंजूरी के बिना पूरे प्रदेश में ‘अनिवार्य’ कर दिया। ऊपर से, 2019 के पुराने नॉन-स्मार्ट मीटर की कीमत (6,016 रुपये) को ही स्मार्ट मीटर पर चिपका दिया, जबकि 2024 के टेंडर में ये सिर्फ 3,510 रुपये में मिले!
उपभोक्ता परिषद का धमाका: ‘शपथ-पत्र तोड़ने वालों पर कार्रवाई’
उपभोक्ता परिषद के चेयरमैन अवधेश कुमार वर्मा ने आयोग चेयरमैन अरविंद कुमार और मेंबर संजय कुमार सिंह से लंबी बैठक की। उन्होंने सुओ मोटो याचिका 62एसएम/2022 (जो पहले से लंबित है) में नया ट्विस्ट जोड़ा है सभी MDs को धारा 142 के तहत तलब करने की मांग। उन्होंने याद दिला दिया कि पहले भी इन MDs ने आयोग में हाजिर होकर शपथ-पत्र दिए थे: “डाटा बुक का उल्लंघन नहीं करेंगे!” लेकिन वादे हवा-हवाई साबित हुए। नतीजा? पिछले केस में कंपनियों ने 3-4 करोड़ रुपये चेक से लौटाए थे। अब वर्मा चेताते हैं, “इस बार भी पैसा वापस होगा, और कानूनी सजा भी! कानून से बड़ा कोई नहीं।”
श्री वर्मा ने इसे “गरीबों पर षड्यंत्र” करार दिया। ग्रामीण इलाकों में तो 24 घंटे बिजली का सपना 18 घंटे के रोस्टर पर सिमट गया, जबकि बिजली उत्पादन इकाइयां बंद पड़ी हैं। परिषद ने असंवैधानिक बताते हुए आयोग से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई और कहा मीटर अनिवार्य करने का फैसला वापस लो, और 24×7 सप्लाई सुनिश्चित करो!
उपभोक्ताओं का आक्रोश तेज उपभोक्ताओं के लिए ‘लालटेन युग लौट आया!’
प्रदेशभर में उपभोक्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा है। एक गरीब किसान ने कहा, “1032 रुपये में कनेक्शन मिलना था, अब 6,176 रुपये! दीवाली पर बत्ती कैसे जलाएं?” शहरी इलाकों में तो 6,464 रुपये की मार। परिषद का दावा है कि केंद्र की RDSO योजना के तहत 27,000 करोड़ का ‘स्मार्ट’ प्रोजेक्ट उपभोक्ताओं को ‘डार्क’ मोड में धकेल रहा है। अब तक 12 लाख मीटर लग चुके हैं, लेकिन खामियां साफ: रिमोट कंट्रोल का दावा, लेकिन काम सामान्य मीटर जैसा। आयोग ने अप्रैल 2024 के बाद की रिपोर्ट मांगी है, और हेल्पलाइन 1912 को मजबूत करने के आदेश दिए हैं।
न्याय के लिए जंग तेज
बता दें कि यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर बहस ले सकता है क्या स्मार्ट मीटर ‘सुविधा’ हैं या ‘शोषण का औजार’? परिषद ने लोक महत्व प्रस्ताव दाखिल कर OTP सिस्टम लागू करने की मांग भी की, ताकि शिकायतें 3.5 करोड़ उपभोक्ताओं की तेजी से सुलझें। UPPCL के चेयरमैन ने सफाई दी है कि “उपभोक्ता हित प्राथमिकता है”, लेकिन आयोग की फटकार के बाद कार्रवाई तय है। अब कहा जा रहा है कि क्या बिजली बाबू शपथ-पत्रों को याद रखेंगे, या फिर करोड़ों का ‘रिफंड’ दौर चलेगा? आने वाले दिनों में सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।







