जी के चक्रवर्ती
जब समाज के लोगों का व्यक्तिगत स्वार्थ अन्य लोगों के निहित स्वार्थ से अधिक महत्वपूर्ण हों जाता है जब समाज के अन्य लोगों का किसी भी तरह का उसमे स्वार्थ न हो तो यह बात एक अंतर्कलह को जन्म दे तो इसमें कोई अनोखी बात नहीं है। यह बात आज की राजनीतिक परिस्थितियों पर बिल्कुल सही बैठती है। इस तरह की बातें आज सभी राजनीतिक दलों के निजी स्वार्थ हमारे समाज और देश के हितों पर भारी पड़ने लगे हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश की सत्तासीन सरकार को उसके कर्तव्यों के प्रति सचेत करते रहने का काम वहां के विपक्ष करता है, जिसके कारण विपक्ष की बहुत बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिसमे सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार को निरंकुश होने से रोकने जैसा कार्य भी विपक्षियों द्वारा अपेक्षित रहती है इन सब के साथ ही साथ देशहित एवं जनहित के मुद्दों पर विपक्ष हमेशा सरकार का सहयोग करती है लेकिन आज मौजूदा समय में देश का दुर्भाग्य ही कहलायेगा कि ऐसा नहीं हो रहा है।आज देश की राजनीति एक विचित्र एवं कर्तव्य हीनता जैसी गैरजिम्मेदाराना अवस्था की ओर पूरी तरह मुड़ चुकी है। ऐसी दशा मे जनहित एवं राष्ट्रहित के मुद्दे बिलकुल पीछे छूट गए हैं। सत्तासीन पार्टी का विरोध करते करते विपक्षी दल अपने ही लोकतंत्र के ही विरोध में खड़े नजर आने लगे हैं। मौजूदा समय में हमारे देश का विपक्ष बहुत कमजोर है, ऐसे में यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि आजादी के बाद से अब तक देश में रहे विपक्ष कभी भी इतना दुर्बल एवं निष्प्रभावी नहीं रहा जितना कि आज के समय में नजर आ रहा है। देश के विपक्ष को सही अर्थों में यही नहीं पता है कि वह कैसे और क्या चाहते है? सत्ता में आना सभी विपक्षीयों की संघर्ष एवं इच्छा हो सकती है जिसके लिए उनका प्रयासरत रहना भी उचित है। किसीं भी पार्टी को सत्ता हासिल करने के लिए उन्हें जनता के मध्य जाना होगा साथ ही साथ उन्हें जनता को यह भी समझना पड़ेगा कि वे क्या और कियूं सत्ता हासिल करना चाहते हैं? यदि हम अभी हाल ही देश में हुए चुनाव की बात करें तो विपक्षियों को दो चार नहीं पूरे पंद्रह राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है। वर्ष 2017 में मोदी सरकार द्वारा लागु की गई हुई नोटबंदी के देश के लोगों को कहते सुना गया कि बस अब मोदी युग खत्म हुआ उसके बाद जब देश में जीएसटी लागू हुई तो उस वक्त भी लोगों ने ऐसा कहते सुना गया कि अब लोग भाजपा को उखाड़ फेंकेंगे। यदि आज हम उन्ही लोगों से पूंछे कि देश की जनता ने किसे उखाड़ फेंका, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।

अभी विपक्ष के सांसदों ने संसद क्यों नहीं चलने दिया यह प्रश्न उन लोगों से पूछा जाना चाहिए। इसका उन लोगों के पास न तो कोई समुचित कारण या तर्क उनके पास नही है। अक्सर ऐसा देखने में आया है कि देश की जवलंत मुद्दों पर सत्तासीन सरकार बहस करने से कतराती है, लेकिन वर्त्तमान समय की स्थिति विल्कुल इसके उलट यहाँ तो स्वमं ही विपक्ष बहस न होने देने पर आमादा था। आज मौजूदा समय में देश की राजनीति एवं राजनीतिज्ञ एवं राजनिती दोनों की दशा एवं दिशा दुर्दशा के कगार पर खड़ी हुई है। जिसका सबसे ताजा उदाहरण स्वरुप अनुसूचित जाति दलितों का आरक्षण का मुद्दा उनके हित एवं सुरक्षा जैसे मुद्दा का राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक अखाडा बन गया था। इस संबंध में आज देश के केंद्र एवं राज्यों में सत्तासीन हुए सभी सरकारों द्वारा दलितों के पक्ष में अभी तक उठाये गए ज्यादातर कदमों से इन वर्ग के लोगों से अधिक उन्होंने अपने राजनीतिक हितों को ही साधा हैं।
वर्ष 1990 में इस कानून में संशोधन किया गया था। नए संशोधन के द्वारा यह व्यवस्था की गई कि शिकायत दर्ज होते ही किसी की भी गिरफ्तारी नहीं किया जा सकती है। उस वक्त विश्वनाथ प्रताप सिंह की नजरें देश के दलित वोटों पर टिकी हुई थी। जिसके लिए वे कांग्रेस एवं भाजपा के जनाधार को उनसे छिन कर जनता दल के लिए एक नया रजनैतिक समीकरण बनाने के लिए प्रयास रत थे। जो काम कांग्रेस ने आजादी के बाद के 43 वर्षों तक के समय में नहीं कर पाई थी वह काम वीपी सिंह ने कर दिखाया जिसका विरोध उस समय किसी ने भी नहीं किया। इसकी एक मात्र कारण यह रहा कि इसके विरोध में खड़े होने वाले राजनीतिक नुकसान का जोखिम उस वक्त कोई भी पार्टी मोल नहीं लेना चाहती थी। जिसके फलस्वरू मायावती वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश की पूर्ण बहुमत से मुख्यमंत्री बनीं। उस वक्त उन्होंने यह कहते हुए इस कानून में संशोधन करवाया था कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 20 मार्च के आदेश में यही कहा कि प्रथम दृष्टया में मामला बनने के पश्चात ही गिरफ्तारी की जायेगी। अदालत ने एससी-एसटी कानून के किसी भी प्रावधान में कोई बदलाव नहीं किया है, फिर भी देश में बवाल क्यों हुआ? इस सवाल के जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि जो लोग सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं शायद उन्होंने अदालत का फैसला ही नहीं पढ़ा है। उन्हें बरगलाया गया होगा। न्यायाधीशों द्वारा की गई इस तरह की टिप्पणी राजनीति करने वाले मुख्यतः इस मुद्दे पर विपक्ष की राजनीति का काला स्याह पक्ष ही उजागर करती है।
भारत बंद के दौरान सड़क पर हिंसा का परोक्ष समर्थन करने वालों के मन में दलितों के लिए कोई प्रेम नहीं है। उन्हें अपने वोट बैंक की चिंता है। इसी राजनीति के लिए दलितों का इस्तेमाल करने जुगत लगाईं जा रही है। दलितों के लिए इनकी चिंता का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस मुद्दे पर एक दस से भी अधिक लोगों की जाने चली गई हो उस पर संसद में चर्चा के लिए इन राजनीतिक दलों को न तो फुरसत है और नहीं वेदना। अब यहाँ यह प्रश्न उठना लाजमी ही कि देश संविधान, अदालत एवं संसद से चलता है या फिर हिंसा के सहारे तोड़-फोड़ उत्पात करके?
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







