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    मायावती की विरासत पर सावित्री की नजर

    By April 2, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
    भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले नए तेवर में दिखाई दी। लखनऊ रैली में उनके मंच का रूप, रंग और स्वर अपने में बहुत कुछ कहने वाला था। इसमें वह प्रतीक भी शामिल थे, जिनपर मायावती अपना एकाधिकार समझती है। यहां तक कि कांशीराम के परिजनों को भी उनसे अंत तक दूर रखा गया था।
    भाषण में भी वही आक्रामकता। यह दिखाने की कोशिश की गई जैसे न जाने कौन सा तूफान आने को है। इसे केवल  सावित्रीबाई ही रोक  सकती है। रैली का नामकरण भी उतना ही आक्रामक था। बैनर था- ‘संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली’। यही तेवर मायावती शुरुआती दौर में अपनाती थी। सावित्री भी इसी का उद्घोष कर रही थी।
    जबकि संविधान इतना कमजोर नहीं कि उसे कोई खत्म कर देगा, और सावित्री ही उसे बचा लेंगी। वस्तुतः यह शब्दावली संविधान निर्माता के प्रति असम्मान को दर्शाता है। संविधान बचाओ का निहितार्थ यह है कि डॉ आंबेडकर ने कमजोर संविधान बनाया है। इसी लिए सावित्री जैसी नेता को उसे बचाने की हुंकार भरनी पड़ रही है। यही बात आरक्षण पर लागू है। कोई भी सरकार इसे समाप्त करने का साहस नहीं कर सकती। इस समय देश के प्रधानमंत्री पिछड़ा वर्ग के है।
    भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है। उसे यह हैसियत किसी एक वर्ग के कारण नहीं मिली। इसमें दलित, पिछड़ा, सहित सभी वर्गों का योगदान है। वही बसपा जैसे दलों का अस्तित्व दांव पर लगा है। संविधान और आरक्षण पर झूठे खतरे बताए गए।
    लेकिन अति दलित और अति पिछड़ा वर्ग की आरक्षण में उपेक्षा की कोई चर्चा नही हुई। इसकी बात होते ही कहा जाता है कि आरक्षण खत्म किया जा रहा है। संविधान और आरक्षण बचाने को जान देने की बात कही गई। कहा गया कि सांसद रहें चाहे न रहे, संविधान और आरक्षण बचाएंगे।
    ये ऐसी बात है जैसे कोई आसमान के गिरने का भय दिखाए, फिर यह कहे कि हम ही तुम सबको बचा सकते है। कुछ लोग गलत हो सकते है। लेकिन संविधान के खत्म होने की बात करना बेमानी है। दुनिया मे इतने अच्छे ढंग से कोई संविधान नहीं चल रहा है।
    इस आधार पर कहा जा सकता है कि उनकी नजर बसपा प्रमुख मायावती की विरासत पर है। यह सोचना गलत है कि वह बसपा में शामिल होंगी। बसपा में शामिल होने की इच्छा रखने का स्वर इतना तेज नहीं हो सकता। क्योंकि इतना बोलने वालों को बसपा में जगह मिलना मुश्किल होता है। दलितों के मुद्दे उठाने में भी वहां एकाधिकार होता है। वह बसपा में शामिल हो भी गई, तो उन्हें मौन ही रहना होगा। ऐसे में यही लगता है कि सावित्री ने सुनियोजित ढंग से बसपा के प्रतीकों को सुशोभित किया है। उनके मंच पर कांशीराम के चित्र से यह स्पष्ट है। सावित्री कितना सफल होंगी, इस बारे में फिलहाल कुछ भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन अनेक दलित नेता मायावती की लगातार कमजोर होती स्थिति का फायदा उठाना चाहते है। उन्हें लगता है कि सपा से समझौता करना दलित समुदाय के साथ ठीक नही है। पच्चीस वर्षों में उन्होंने जो मंजर देखा है, उसे भूलना आसान नहीं है। यह सही है कि सावित्री बाई का कदम स्थानीय कारणों से भी प्रभावित है। संभव है कि इसे उन्होंने बड़े रूप में उजागर करने का प्रयास किया है।
    वह सावित्री बाई फुले अपने राजनीतिक जीवन मे इतनी मुखर पहले कभी नहीं हुई थी। यह चमत्कार अप्रत्याशित है। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्हें नरेंद्र  मोदी के करिश्में का भरपूर लाभ मिला था। वह कम उम्र में निर्वाचित होकर लोकसभा पहुंच गई थी। लेकिन इस दायित्व में उनकी चर्चा कभी सुनाई नहीं दी।
    लेकिन आमचुनाव से कुछ महीने पहले उनके तेवर में गजब की तेजी आ गई है। दलितों के प्रति उनकी पीड़ा उमड़ पड़ी है।
    सावित्री बाई फुले जनसेवा के अपने किसी विचार या कार्यो को लेकर चर्चित होतीं, तो कोई बात नहीं थी। यह माना जाता कि उन्होंने दलितों के लिए बहुत संघर्ष किया है। लेकिन आजिज आकर उन्हें यह मार्ग चुनना पड़ा। लेकिन यह सब अप्रत्याशित है, इस लिए कयास भी लग रहे है।
    सावित्री के इस रूप पर अटकलें लगना स्वभाविक है। इसके कारण भी तलाशे जा रहे है। बताया जा रहा है कि उनके  इस कदम का तात्कालिक और दीर्घकालिक कारण है। पहली बात तो यह कि उन्हें अपने पुनः निर्वाचंन कि चिंता सताने लगी है। बताया जाता है कि बतौर सांसद उनका रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं रहा है। इसके अलावा अपने निर्वाचंन क्षेत्र में भी लोग उनसे खुश नहीं है। भाजपा हाईकमान को इन बातों की जानकारी है। सावित्री को इसका अंदेशा है कि दुबारा टिकट मिल भी गई तो, स्थानीय लोगों की नाराजगी दूर करना आसान नहीं होगा। वह नरेंद्र मोदी के नाम से पिछली बार जीती थी। इस बार भी वह इसकी उम्मीद कर सकती है, लेकिन इसके लिए टिकट मिलना जरूरी है। ऐसे में सावित्री दबाब की राजनीति कर रही है। लेकिन सावित्री की महत्वकांक्षा यही तक सीमित नहीं लगती। इसी बहाने वह मायावती को भी चुनौती देना चाहती है।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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