डॉ दिलीप अग्निहोत्री
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के नेताओं को गठबन्धन धर्म के पालन की सीख दी है। दूसरी तरफ कुछ दिन पहले मायावती ने अपनी पार्टी के लोगों को सपा नेताओं से न मिलने की सीख दी थी। शीर्ष स्तर की इन दोनों सीख को सामान्य नहीं माना जा सकता। अखिलेश जानते है कि उनके समर्थक बसपा के कई मुद्दों से सहमत नहीं है। मायावती जानती है कि उनके समर्थक सपा के संपर्क में जायेगे तो उन्हें विरोध के स्वर सुनने को मिल सकते है। कहीं न कहीं ऐसा जरूर है, जिसके चलते यह सीख देने की जरूरत पड़ी। वैसा कहा गया कि भाजपा नहीं चाहती कि यह गठबन्धन कायम रहे। इसलिए सावधान रहने को कहा जा रहा है। लेकिन बात इतनी सरल भी नहीं है। दो पार्टियो का गठबन्धन कोई बच्चों का खेल नहीं होता, जिसे विरोधी पार्टी बिगाड़ देगी। वस्तुतः यह सपा- बसपा के समर्थकों के बीच की असहजता है, जिसके चलते इस प्रकार के निर्देश देने पड़ रहे है।मायावती जिस प्रकार एकतरफा मुद्दे उठा रही है, उनसे सपा समर्थक खुश नहीं है। क्योंकि दशकों से वह इनका विरोध करते रहे है। शायद यही कारण है कि अखिलेश को नसीहत देनी पड़ी। उन्होंने सोशल इंजियनरिंग की पाठशाला नाम से आयोजित बैठक में यह बात कही। अपने कार्यकर्ताओं को समझाया कि भाजपा से सावधान रहें। सपा बसपा के परस्पर सहयोग को षड्यंत्र बताया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में गठबन्धन को सफलता दिलाने में सभी एक जुट होकर काम करें।
यहां प्रश्न यह है कि अखिलेश को इस प्रकार सीख देने की आवश्यकता क्यों पड़ी। इसका मतलब है कि जमीनी स्तर पर स्थिति उतनी सहज नहीं है। बसपा प्रमुख मायावती जिस एजेंडे पर चल रही है, उससे सपा समर्थकों के बीच कतिपय चिंता के स्वर भी उठे है। मायावती अपने पुराने एजेंडे पर लौट आई है। उनके लिए ऐसा करना स्वभाविक भी है। जब वजूद पर बन आई हो, तब पुराने आधार की ओर लौटने के अलावा अन्य कोई विकल्प भी नहीं था। इसके तहत मायावती आरक्षण को समाप्त करने का राग अलाप रही है, प्रमोशन में आरक्षण और एससीएसटी एक्ट भी उनके एजेंडे के शीर्ष पर है। इन मुद्दों के आधार पर मायावती दलित राजनीति को आगे बढाने का प्रयास कर रही है।इस प्रकार सपा से गठबन्धन के बाबजूद मायावती ने अपना अलग एजेंडा निर्धारित कर लिया है। वह एक सीमा से अधिक गठबन्धन की बात भी नहीं करती। मायावती अपने अंदाज में यह एहसास भी कराना चाहती है कि गठजोड़ की जरूरत अकेले उनको नहीं है। सपा भी अकेले भाजपा के मुकाबले की स्थिति में नहीं है।
मायावती ने साथ मिलने की बात की, फिर इस विषय को ज्यादा तरजीह देना बंद कर दिया। उन्होंने इस बात पर भी गौर नहीं किया कि कौन सा मुद्दा सपा को असहज बनाएगा। वह अपनी धुन में प्रमोशन में आरक्षण और एससी एसटी का मुद्दा उठा रही है।
जबकि पिछड़ा वर्ग का इन मुद्दों पर अलग रुख रहा है। बताया जाता है कि एससी एसटी एक्ट के सर्वाधिक मुकदमें इसी वर्ग के खिलाफ है। ऐसे में वह इसमें सुधार को अनुचित कैसे कह सकता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पिछड़ा वर्ग को राहत मिली है। अब जो दोषी है, वही पकड़े जायेगे। जो निर्दोष है, उन्हें फसाना मुश्किल होगा। सवर्ण और पिछड़ा वर्ग यही चाहता था।
मायावती जब सर्वजन के फार्मूले से लाभान्वित होकर मुख्यमंत्री बनी थी, उस समय उन्होंने भी एससीएसटी एक्ट में ऐसा ही सुधार किया था। तब उनका कहना था कि इस एक्ट के दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। केवल हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में गिरफ्तारी हुई चाहिए। मामूली आरोप में तहकीकात के बाद हो कार्यवाई होनी चाहिए। लेकिन वह बसपा का सर्वजन दौर था। वह बहुमत से सत्ता में पहुंची थी। आज वजूद पर संकट का दौर है। इसलिए उस निर्णय पर हंगामा हो रहा है, जैसा कभी उन्होंने भी करने का पर्यास किया था।
जाहिर है कि मायावती ने आमचुनाव के मद्देनजर अपना एजेंडा तय कर लिया है। सपा समर्थकों पर क्या बीत रही है, मायावती को इससे कोई मतलब नही है। वह अपने एजेंडे पर आगे बढ़ रही है। संसद और विधानसभा में उनकी सदस्य संख्या कम है। लेकिन वह अपने को सपा से कम नहीं दिखना चाहती। उनके तेवर से यही जाहिर है। दूसरी ओर अखिलेश बिल्कुल उसी अंदाज में गठबन्धन की तारीफ कर रहे है, जैसी कांग्रेस से गठजोड़ के समय करते थे। तब वह सपा और कांग्रेस की दोस्ती को सबसे अच्छा बता रहे थे। कहा गया कि उत्तर प्रदेश को यह साथ पसन्द है। भाजपा इस गठबन्धन को तोड़ना चाहती है। लेकिन न उत्तर प्रदेश को साथ पसन्द आया, न उनकी दोस्ती भाजपा की वजह से टूटी।
आज अखिलेश कह रहे है कि कांग्रेस को बदलना होगा। इस समय उसी तरह सपा गठबन्धन की तारीफ चल रही है। जिस प्रकार मायावती ने अपना एजेंडा बना लिया है, वैसा अखिलेश के पास नहीं है। बल्कि विधानसभा चुनाव तक उनका दावा था कि देश मे इतना विकास आज तक नहीं हुआ, जितना उनकी सरकार ने कर दिया। विकास की गंगाबहा दी। अब वही अखिलेश कह रहे है कि बहुत गरीबी है, किसान बेहाल है, बड़ी आबादी के पास खाने को नहीं है, ऐसे में समरसता नही हो सकती। मतलब अखिलेश ने अपना मुद्दा छोड़ा है, मायावती ने अपना मुद्दा बनाया है। ये बात अलग है कि मायावती मानती है कि दलित समाज आज भी उनकी प्रत्येक बात पर विश्वास कर लेगा। वह कहेगी की आरक्षण समाप्त किया जा रहा है और लोग मान लेंगे। जबकि आरक्षण समाप्ति की बात करना बेमानी है।
इसके अलावा यह भी स्पष्ट हुआ कि मायावती को उन दलितों की चिंता नही, जिन्होंने सत्तर वर्षों में यह नहीं जाना कि आरक्षण होता क्या है। इसके अलावा एससीएसटी एक्ट मुद्दे पर भी मायावती लोगों को भृमित कर रही है। इसमे वही सुधार सुप्रीम कोर्ट ने किया है, जिसकी कल्पना मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने की थी। दोहरे मापदंड की समझ आमजन को भी होती है। मायावती को सपा समर्थकों से यह भी पूछना चाहिए कि क्या वह प्रमोशन में आरक्षण में समर्थन करते है। ये सभी मसले मायावती ने एकतरफा रूप में उठाये है। अखिलेश के सामने उनके समर्थन के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा।अखिलेश ऐसा कर भी रहे है। लेकिन जमीनी स्तर पर दोस्ती के इन पैगाम को ले जाना मुश्किल हो रहा है।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार







