डॉ दिलीप अग्निहोत्री
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कभी अपने मौन के लिए प्रसिद्ध हुआ करते थे। अब अक्सर वर्तमान प्रधानमंत्री पर हमला बोलने के लिए मुखर दिखाई देते। है। वह यहीं नहीं रुके। लिखने के कारण भी चर्चा में आ गए है, इस बार वह मौन या बोलने के लिए चर्चा में नहीं है। बल्कि राष्ट्रपति को लिखा गया उनका पत्र चर्चा में है। इसमें भी नरेंद्र मोदी के प्रति नाराजगी बयान की गई है। वही कांग्रेस के दिग्गजों के समय समय पर दिए गए बयानों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। मनमोहन सिंह यह भूल गए कि नरेंद्र मोदी की तरफ एक उंगली उठाने से चार उंगली अपनी ही तरफ ही है। वैसे इस बात पर यकीन करना मुश्किल है कि मनमोहन सिंह ने अपनी मर्जी से राष्ट्रपति को पत्र लिखा होगा। देश को उनके बारे में कोई गलतफहमी नहीं है।बिडंबना यह है कि कांग्रेस ने अब भी उन्हें आगे करने से तौबा नहीं की है। यूपीए सरकार में उन्हें आगे रखा गया था। फिर बहुत कुछ हुआ। जिसके दाग आज भी कांग्रेस के दमन पर है। फिर नोटबन्दी पर उन्हें आगे किया गया। जैसे तैसे वह राज्यसभा में नरेंद्र मोदी पर बरसे। अब मनमोहन फिर मोर्चे पर है। इस बार उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है। प्रथम दृष्टया लगता है कि कांग्रेस बहुत डरी सहमी है, नरेंद्र मोदी धमकी दे रहे है, वह राष्ट्रपति से बचाव की गुहार लगा रही है। पत्र का मूल भाव दयनीय स्थिति को दर्शाता है। जैसे कांग्रेस अपना मनोबल खो चुकी है। सब तरफ से हारने के बाद उसे देश के सर्वोच्च आसन से गुहार लगानी पड़ी है। राष्ट्रपति को उनकी ताकत का अहसास कराया गया। लिखा गया कि भारत के प्रमुख होने के कारण राष्ट्रपति की बड़ी जिम्मेदारी होती है। वह प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट को सलाह और मार्गदर्शन दें।
उन्होंने कहा कि येदियुरप्पा जी अदालतों का सामना किया है। मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए आगे कहा कि कांग्रेस के नेता कान खोलकर सुन लीजिए, अगर सीमाओं को पार करोगे तो ये मोदी है लेने के देने पड़ जाएंगे। जाहिर है कि यह कांग्रेस द्वारा लगाए जा रहे आरोप का राजनीतिक जबाब था। आरोप लगाने वाली कांग्रेस में इतना सुनने का धैर्य होना चाहिए। लेकिन मनमोहन सिंह ने लिखा प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस को धमकाने का काम कर रहे हैं। इस चिट्ठी में मनमोहन सिंह के अलावा कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें ए के एंटोनी, गुलाम नवी आजाद, पी. चिदंबरम,मल्लिकार्जुन खड़गे, दिग्विजय सिंह, आनन्द शर्मा, कर्ण सिंह, अंबिका सोनी, अशोक गहलोत, मोतीलाल बोरा, अहमद पटेल, मुकुल वासनिक शामिल हैं। इनमें कई नाम तो ऐसे है जिन्हें इस प्रकार के मजमून पर हस्ताक्षर करने ही नहीं चाहिए थे।

यह लोग भाषण वीर के रूप में ही विख्यात है। खासतौर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर इन्होंने अनगिनत बार अमर्यादित टिप्पणी की है। लेकिन तब एक बार भी मनमोहन सिंह को मर्यादा का ध्यान नहीं आया। उन्हें वह दिन भी याद होगा जब उनकी हाईकमान सोनिया गांधी ने नरेंद्र सिंह को मौत का सौदागर कहा था। यह भी मनमोहन सिंह को खराब नहीं लगा। यह वह दौर था जब मनमोहन सिंह को मौन मोहन कहा जाता था। लेकिन नोटबन्दी के समय तो मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी पर जम कर हमला बोला था। उन्हें अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने वाला बताया था।
मनमोहन सिंह को अपने उन नेता के बयानों पर भी विचार कर लेना चाहिए जिनके हस्ताक्षर इस पत्र में नहीं है। राहुल गांधी पिछले चार वर्षों से जिस प्रकार के बयान दे रहे है, उनसे मनमोहन अनभिज्ञ नहीं होंगे। नरेंद्र मोदी पर हमला बोलने में उन्हें किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं होता। अनेक बार वह मर्यादा का उल्लंघन करते है। लेकिन क्या मजाल जो कभी मनमोहन सिंह ने उन्हें कोई सलाह दी हो।
मनमोहन सिंह के पत्र में एक बात गौर करने वाली है। इसकी भाषा लगभग वैसी ही है, जिसका प्रयोग राहुल गांधी करते है। कुछ वाक्यों में दिलचस्प समानता है। राहुल कहते रहे है कि नरेंद्र मोदी धमकी देते है, डराना चाहते है। विपक्ष की आवाज दबाना चाहते है । लेकिन वह दबाब के सामने झुकेंगे नहीं।
मनमोहन के पत्र के शब्द और मूल भाव यही है कि नरेंद्र मोदी धमकी देकर विरोध की आवाज दबाना चाहते है।
कांग्रेस का कोई नेता यह बताने की स्थिति में नहीं है कि नरेंद्र मोदी ने उनकी आवाज को कब दबाया है। कब उन्हें बोलने से रोका गया है। बल्कि देश के राजनीतिक इतिहास में सर्वाधिक हमले नरेंद्र मोदी पर ही हुए है। यह क्रम उनके गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर आज तक जारी है।
दो दशकों से चल रहे विरोधियों के हमले से परेशान तो नरेंद्र मोदी को होना चाहिए। विपक्ष के अदना प्रवक्ता से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक सब नरेंद्र मोदी पर हमलावर रहते है। लेकिन नरेंद्र मोदी आज तक इससे विचलित नहीं हुए। कई बार तो ऐसा लगता है, जैसे उन्हें इन दुर्भावनापूर्ण हमलों से आगे बढ़ने की ऊर्जा और प्रेरणा मिलती है। नरेंद्र मोदी ने जबाब दिया तो मनमोहन सिंह और कांग्रेस के कुछ नेता राष्ट्रपति से गुहार लगाने लगे। कांग्रेस को क्या लगता है कि वह दूसरों पर घोटालों के आरोप लगाकर बेदाग हो जाएगी।
मोदी ने तो केवल इसी का जबाब दिया है। इसमें धमकी जैसी कोई बात नहीं है। क्या यह सच नहीं कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी नेशनल हेराल्ड घोटाले में पेरोल पर है। मोदी का यही कहना था, कानून अपना काम कर रहा है। कांग्रेस को दूसरों पर कीचड़ उछालने से बचना चाहिए।







