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    Home»राजनीति

    कर्नाटक में दलों की नहीं, राज्यपाल की होगी आखरी कसौटी!

    ShagunBy ShagunMay 16, 2018Updated:May 16, 2018 राजनीति No Comments4 Mins Read
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    imaging: shagunnewsindia.com
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    मोदी का जादू : खुल जा सिम सिम….

    कर्नाटक, 16 मई। कर्नाटक में आखिर वही हुवा जो होना था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ऐसा जादू चला की खुल जा सिम सिम….की तरह भाजपा के लिए दक्षिण भारत में प्रवेश के लिए द्वार खुला लेकिन खिड़की नहीं खुली। हालांकि द्वार के साथ खिड़की खुलना भी अनिवार्य है। कर्नाटक में बीजेपी सब से बड़ी पार्टी बनके उभर आयी लेकिन सरकार बनाने जितनी सीटों में कुछ कमी रह गई। कर्नाटक में बीजेपी सत्ता में नहीं थी।

    नुकशान कोंग्रेस को हुआ और फायदा बीजेपी को। जनादेश कुछ इस तरह से आया की सभी जिम्मेवारी अब राज्यपाल के सर पर आ गई। राज्यपाल वजुभाई वाला है जो की पहले गुजरात में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में वित्त मंत्री थे और 2009 में वाला ने ही मोदी के लिए अपनी राजकोट की सिट खाली की थी। लेकिन राज्यपाल आखिर राज्यपाल होता है। इस पद पर बैठने के बाद वह किसी दल के नहीं होते। उन्हें संविधान के तहत काम करना होता है। वे एक मंजे हुए खिलाड़ी है। उनका फैंसला एक मिसाल बनने वाला है।

    कर्नाटक के परिणाम और किसी एक दल को बहुमत न मिलना तथा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर बीजेपी को सरकार बनाने के लिए राजभवन द्वारा आमंत्रित करना या न करना, इतना ही नहीं इससे पहले गोवा, मेघालय और मणिपुर में राज्यपालों ने कोंग्रेस सब से बड़ी पार्टी होने के बावाहुद उन्हें सरकार बनाने के लिए न बुलाना ये सब बाते अब एक ऐसी बन कर सामने आ रही है की बीजेपी के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं। कर्नाटक में अब बीजेपी से ज्यादा राज्यपाल की कसौटी है। उनकी विश्वसनियता की कसौटी है। वे परिपाटी पे चलकर सबसे पड़ी पार्टी के तौर पर बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते है या गोवा, मणिपुर के राज्यपालो के नक्शेकदम चलते हुए गठबंधन वाली पार्टियो को सरकार बनाने के लिए बुलाते है?

    गोवा, मेघालय और मणिपुर में राज्यपालों ने जो किया अब उसकी मिसाल दी जा रही है। उस वक्त यदि सब से बड़ी पार्टी के तौर पर कोंग्रेस को सरकार बनाने के लिए बुलाई जाती तो आज कर्नाटक में तुरंत ही बीजेपी को भी सब से बड़ी पार्टी के तौर पर सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में राज्यपाल वाला को एक मिनिट भी नहीं लगती और उनके फैंसले को सही माना जाता। लेकिन वे भी भलीभांति जानते ही होंगे की गोवा, मेघालय और मणिपुर के राज्यपालों ने क्या किया। अब उनकी बारी आई है तब उनके सामने यह सब उदाहरण भी है ऐसे में उन्हें फैंसला करना है।

    क्या इतिहास का पुनरावृति होता है? लेकिन इतना जल्दी पुनरावृति होगी यह तो शायद बीजेपी को भी मालूम नहीं होंगा। गोवा, मेघालय और मणिपुर के राज भवन के फैंसले अब किसी के लिए बुरे बन गए तो किसी के लिए अच्छे दिन की तरह। कर्नाटक में किस के अच्छे दिन आयेंगे यह तय होंगा राज्यपाल वजुभाई वाला के हाथो। बस इन्तजार है सभी को वाला के निर्णय का।

    आरएसएस के साथ 57 वर्षों तक जुड़े रहे हैं वजुभाई

    ऐसे में कहा जा रहा है कि वे वफादारी निभाते हुए भाजपा को बुलाते हैं या फिर कांग्रेस+जनता दल (सेक्युलर) को. 2014 में कर्नाटक का राज्यपाल बनने से पहले वजुभाई गुजरात में लगातार सात चुनाव जीत चुके थे। उन्होंने रेकॉर्ड 18 बार गुजरात सरकार का बजट पेश किया था। वजुभाई जनसंघ के संस्थापकों में से एक हैं। आरएसएस के साथ 57 वर्षों तक जुड़े रहे हैं। बताया गया है कि इमर्जेंसी के दौरान वह 11 महीने तक जेल में रहे। कांग्रेस ने जेडीएस के कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री प्रॉजेक्ट करके सरकार बनाने का प्रबल दावा पेश किया है। दूसरी तरफ सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने भी बहुमत से आठ सीटें कम पाने के बावजूद सरकार बनाने का दावा पेश किया है। ऐसे में राज्यपाल के सामने भी अच्छी-खासी चुनौती उत्पन्न हो गयी है।

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