जी के चक्रवर्ती
हम 21 वीं शदी की बातें करतें है पर हमारे देश के एक प्रगतिशील राज्य महाराष्ट्र में एक प्रायोजित जातीय हिंसा से 21वीं सदी से सीधे 18वीं शताब्दी में पहुंचा हुआ दिखाई दे गया, इस जातीय हिंसा के कारण देश के कई राज्यों के साथ देश की आर्थिक राजधानी मुंबई भी हिंसा की चपेट से अछूती नहीं रही। इस जातीय हिंसा को ‘बाहरी लोगों ने प्रदेश की जनता को भड़काकर माहौल को बिगाड़ाने का काम किया। यह प्रश्न उठता है कि आखिर वह बाहरी लोग कौन थे? इस सवाल के जवाब के पीछे चाहे जो भी बात हो, लेकिन एक बात तो बहुत ही स्पष्ट दिखाई देती है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने जिग्नेश मेवाणी जैसा वामपंथी साथी का उपयोग ठीक उसी तरह करने की चेष्टा की है, जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पंजाब में अकालियों का राजनीतिक प्रभाव कम करने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले का उपयोग किया था। भिंडरावाले एवं कांग्रेस दोने की जुगलबंदी से क्या परिणाम निकले, इस बात से हम सभी परिचित तो हैं ही साथ ही साथ यह वाक्या देश के राजनितिक इतिहास की काली सूची में दर्ज हो गया।
अंग्रेजों ने अपने जिस साम्राज्यवादी नीतियों के जरिये भारत में दलितों एवं मुस्लिम अलगाववाद को भड़काया और ईसाई मिशनरियों और चर्चों के माध्यम से सामाजिक भेदभाव एवं द्वेष के शिकार लोगों का मतांतरण कर उन्हे शेष समाज के विरुद्ध खड़ा किया था ठीक उसी नीति के तदानुसार स्वतंत्र भारत में कुछ तत्व करने के प्रयास में लगे हुए हैैं। इन लोगों की मंशा दलित कल्याण एवं उनके हितो की रक्षा करने के वजाय वे उन लोगों का इस्तेमाल केवल अपने अघोषित विभाजनकारी उद्देश्यों के लिए कर रहे है। मौजूदा समय में महाराष्ट्र में हुए जातीय हिंसा को लेकर ऐसे लोगों ने सार्वजनिक चर्चाओं में ‘दलित समुदाय के लोगों एवं शेष हिंदू समाज’ की दूषित विचारधाराओं को पुन: जागृत करने जैसा ही काम किया है।भीमा कोरेगांव में एक जनवरी 1818 को हुए युद्ध में अंग्रेजों की सैन्य टुकड़ी में महारों (दलित) के अलावा अन्य समुदाय के लोग भी शामिल थे। यह एक अलग बात है कि उस समय के अंग्रेजी सेना में अन्य लोगों की संख्या बहुत कम थी। वही पर पेशवाओं की पैदल सेना में भी कथित निम्न जाति के लोग थे। इस लड़ाई में दोनों पक्षों की कई सैनिकों की मौतें अवश्य हुई। लेकिन जो युद्ध भारत एवं ईस्ट इंडिया कंपनी के मध्य लड़ा गया, वह दलित बनाम मराठों के बीच लड़ा गया युद्ध कैसे हो गया? यह मुद्दा विल्कुल अलग है कि उस समय यहाँ के अंग्रेजी सेना में इसी प्रदेश के दलित लोगों की संख्या अधिक थी यह तो अंग्रेजों की नीति रही है कि यहीं के लोगों को यहाँ के लोगों के विरुद्ध लड़ा कर अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाये।
यदि हम ‘दलित बनाम मराठों’ के बीच के सिद्धांत को सही माना भी लेते है तो वर्ष 1919 में बैसाखी के दिन हुए जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए वामपंथी और स्वघोषित सेक्युलरिस्ट में से हम किसे दोषी ठहराएंगे? जबकि उस दिन जिसने गोली चलाने का आदेश दिया था या फिर उन गोरखा सैनिकों की जो उस टुकड़ी में शामिल थे जिन लोगों ने डायर के आदेश पर अपने ही देश के उन निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियों की बौछार कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था?
इस तरह यदि हम भारत के इतिहास में झांकें तो पाएंगे कि देश के आजादी के समय अंग्रेजों से टक्कर ले कर उनके विरुद्ध युद्ध करने वाले लोगों में बहुत से लोग उच्च वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले लोग थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी उनमे से एक मंगल पांडे पर जिन्होंने 29 मार्च 1857 को कोलकाता के बैरकपुर छावनी में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंका था। कई ‘सेक्युलर’ बु्द्धिजीवियों ने कोरेगांव के युद्ध को दलित अस्मिता की विजय से जोड़ दिया है। जिसका एक लंबा इतिहास है जो यह दर्शाता है कि देश में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भी मराठा सैन्य बल में महार जाती के लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे। इस समुदाय के लोगों की एक विशेषता थी कि इस जाती के सैनिक निर्भीक, बहादुर और निष्ठावान हुआ करते थे जिन्होंने मराठा साम्राज्य संस्थापना में महान योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके पुत्र संभाजी को शक्ति प्रदान की थी।
अंग्रेजों ने भारत के जातीवादी और वर्गों के आधार में बांटे हुए भारतीय समाज के लोगों का बहुत सरलता से फायदा उठाया इसलिए अंग्रेजों ने वस्तुत: यहाँ पर जातिभेद पर अधिक बल दिया। 1857 की क्रांति से भयभीत होकर अंग्रेजों ने कुख्यात ‘लड़ाकू-जाति’ सिद्धांत पर काम करना शरु कर दिया था। इतिहास में जिन महार सैनिकों के बल पर अंग्रेजों ने कोरेगांव में मराठाओं को परास्त करने में सफलता पाई थी उन्ही लोगों को उनकी सेना में भर्ती पर वर्ष 1892 में यह कहकर रोक लगा दी कि ‘महार लड़ाकू नस्ल नहीं हैं, अपितु निम्न-जाति के अछूत हैं।’ वहीं पर प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने उन्ही महार जाती के लोगों को अपनी सेना से निकाल दिया था फिर इन्ही अंग्रेजों ने प्रथम विश्व युद्ध के समय अपनी सेना में महारों की पुनः भर्ती बहाल की, किंतु युद्ध समाप्त होते ही महारों को सेना से फिर से निकाल दिया। 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अंग्रेज सैन्य बेड़े में महारों को भर्ती किए जाने का प्रयास किया जिसका वीर सावरकर जैसो ने समर्थन भी किया था। वर्ष 1931 में रत्नागिरी में आयोजित महार लोगों के सम्मलेन की अध्यक्षता भी सावरकर द्वारा ही किया गया था।
यह बात सर्वविदित है कि भारत देश विश्वासघात की वजह से कई बार अपनी स्वतंत्रता खोई थी। अंबेडकर के
अनुसार, ‘यह बहुत ही परेशान करने वाला तथ्य है कि भारत ने अपने ही लोगों के विश्वासघात के कारण कई बार अपनी स्वतंत्रता खोई है। जब सिंध पर मोहम्मद बिन कासिम ने हमला किया था उस समय राजा दाहिर के सेनापति ने कासिम के साथियों से घूस लेकर अपने ही राजा के पक्ष में युद्ध करने से मना कर दिया था।
ऐसे ही जब शिवाजी हिंदुओं की मुक्ति के लिए लड़ रहे थे उस वक्त अन्य मराठों राजवंशों और राजपूतों ने मुगलों का ही साथ दिया था। इसी तरह जिस समय अंग्रेज सिख शासक गुलाब सिंह को पराजित करने की कोशिश कर रहे थे उस वक्त उनके प्रमुख सेनापति चुप्पी साधे रहे। वाही पर इतिहास इस बात का गवाह है कि जब 1857 में जब भारत के एक बड़े हिस्से ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई छेड़ा तब सिखों का एक समूह इसमें मूकदर्शक बना रहा। क्या इतिहास अपने आपकी पुनरावर्त्ति करेगा?
यह बहुत ही चिंताजनक एवं सोचनीय विचार है, क्योंकि आने वाले कल को भारतीय समाज के इस शत्रु रूपी जातियों एवं धर्म, संप्रदाय में विभाजित हमारे देश भारत में अनेको राजनीतिक दल होंगे और यह तो निश्चित बात है कि यदि राजनीतिक दल देश के ऊपर पंथ को प्राथमिकता देते रहेंगे तो भविष्य में हमारी स्वतंत्रता पर न केवल संकट मंडराने लगेंगे, वल्कि हम उसे सदैव के लिए खो सकते है। हमें अपने खून के एक – एक अंतिम बूँद तक देश की स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी।







