क्या गठबंधन की राजनीति में नहीं बची वामदलों की अहमियत?
नई दिल्ली, 31 मार्च। एक तरफ सोनिया गांधी महागठबंधन बनाने की तैयारी में लगी हुई हैं, दूसरी ओर ममता बनर्जी तीसरा मोर्चा बनाने की तैयारी में लग गई हैं। लेकिन खास बात यह है कि इन दोनों ही महागठबंधनों से वामदल बाहर हैं। उनकी बात न सोनिया गांधी कर रही हैं और न ममता।
त्रिपुरा में मिली हार के बाद वामदल गठबंधन की राजनीति से आउट होते दिख रहे हैं। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्स के प्रोफेसर एके वर्मा का कहना है कि सही बात तो यह है कि लेफ्ट में राजनीतिक गिरावट आनी शुरु हो गई है। ममता तो बंगाल के हालातों को देखते हुए कभी भी लेफ्ट से हाथ नहीं मिलाएंगी। दूसरी ओर कांग्रेस बेशक अभी लेफ्ट का नाम नहीं ले रही है, लेकिन दोनों एक ही कश्ती के सवार हैं। कांग्रेस अभी सिर्फ लेफ्ट को उसके कमजोर होने का अहसास करा रही है, जिससे वह महागठबंधन के लिए शर्त रखने की स्थिति में न रहे और कांग्रेस लेफ्ट को अपनी शर्तों के मुताबिक महागठबंधन में शामिल कर सके।
अगर हम वामदलों की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर निगाह डालें तो वह अब सिर्फ केरल में बचे हैं। अगर लोकसभा में भी देखें तो सीपीआई की एक और सीपीएम की नौ सीट हैं। जानकारों की मानें तो वर्ष 2004 से लेफ्ट में राजनीतिक गिरावट आनी शुरु हुई है। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय के सियासी नतीजों ने भी गिरावट के ही संकेत दिए हैं। पिछले 10 साल की बात करें तो 2004 से 2014 के लोकसभा चुनावों में लेफ्ट का वोट प्रतिशत लगातार गिरा है। लोकसभा सीटों की संख्या भी कम हुई है।







